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RIYA PARASHAR

Inspirational

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RIYA PARASHAR

Inspirational

प्रथा मुँह छिपाने की

प्रथा मुँह छिपाने की

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हमारे समाज में बहुत सारी विसंगतियाँ विद्यमान है। और उन विसंगतियों का अधिकतर सामना महिलाओं को ही करना पड़ता है। जैसे कि सती प्रथा, अग्नि परीक्षा, शिक्षा संबंधी समस्या, स्वतंत्रता संबंधी समस्या, समान अधिकार संबंधी समस्या, रोजगार संबंधी समस्या, बाल विवाह, विधवा जीवन के कठोर नियम इत्यादि का सामना हर क्षेत्र में नारी को ही करना पड़ा है। दीपाली सोचती है कि आखिर ऐसा क्यों ?

दीपाली इन समस्याओं पर विचार कर ही रही होती है। तभी उसकी दृष्टि माँ, चाची और भाभी पर पड़ती है। वह देखती है कि उसकी मां उसके दादाजी से मुंह छिपाती है, उसकी चाची उसके पिता और दादा तथा उसकी भाभी दादा, पिता और उसके चाचा तीनों से मुंह छिपाती है। दिपाली को ये चीजें समझ में नहीं आती आखिर वे ऐसा क्यों करती है? दिपाली के मन में बहुत से सवाल होते हैं जिन्हें वह रोक नहीं पाती और अपनी मां से कह बैठती है कि आखिर वे घर के लोगों से मुंह क्यों छिपाती है ? दिपाली की मां उसकी बात सुनकर हँस पड़ती है। वह दिपाली को ' दिया ' कहकर बुलाती है। वह दिपाली से कहती है कि 'दिया ' जिसे तुम मुंह छिपाना कह रही हो, उसे मुँह छिपाना नहीं, पर्दा करना कहते है। ऐसा करने से बडे बुजुर्गों का सम्मान होता है। और जो महिलाएं ऐसा करती है उन्हें समाज में सम्मान मिलता है और जो महिलाएं ऐसा नहीं करती उनकी घर समाज सब जगह निंदा होती है।

माँ की बात को बीच में काटते हुए दिपाली कहती है कि माँ सम्मान को किसी भी प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है। वह तो व्यक्ति की भावना पर निर्भर करता है। उसके लिए मुँह छिपाने की आवश्यकता नहीं है। फिर दिपाली कुछ क्षण और सोचती है। इतने में उसकी माँ कपड़ों की तह लगा देती है। तब दिपाली फिर से कहती है कि माँ मैं भी तो पिता जी का सम्मान करती हूँ परन्तु मैं तो पिता जी मुँह नहीं छिपाती और न ही बाकि सदस्यों से। तब उसकी माँ कहती है कि ये सब तो घर की बहुएँ करती है बेटियां नहीं। दिपाली थोड़ी जिज्ञासु प्रवृत्ति की है। उसके मन में फिर एक सवाल आता है कि जब बहुओं को बेटी बनाकर लाया जाता है तो उन्हें बेटी बनाकर रखा क्यों नहीं जाता।

दिपाली की बातों से परेशान होकर उसकी मां बाहर काम देखने चली जाती है। माँ सोचती है कि अभी 9वीं कक्षा में है, थोड़ी छोटी है, बड़ी होगी तब समझ आ जाएगी। परन्तु दिपाली की शंका अभी दूर नहीं हुई थी। दिपाली अपनी भाभी से जाकर पूछती है कि आखिर उन्हें पर्दा करना कैसा लगता है? भाभी पढ़ी - लिखी थी वह घर के मामलों में ज्यादा बात नहीं करती थी। क्योंकि एक तो उनकी शादी को दो ही साल हुए थे और दूसरा उनके विचार घरवालों से मेत नहीं खाते थे। भाभी को लगता था कि अब समय बदल रहा है, हमें इन घिसी-पिटी रीति - रिवाजों को छोड़ देना चाहिए। परन्तु घरवालों को लगता था कि उसकी बातें घर के माहौल को खराब कर देंगी और घर की स्त्रियों को अगर ज्यादा आजादी मिल गई तो वह पुरुषों क बराबर में बैठने लगेंगी। इसलिए अधिकतर लोगों के द्वारा उनकी निंदा की जाती थी। दिपाली के एक बार पूछने पर तो उसकी भाभी चुप ही रही। परन्तु जब दिपाली जिद करने लगी तो भाभी कहती है कि पर्दा करना उन्हें अच्छा नहीं लगता। परन्तु परिवार और आपके भाई की वजह से मुझे पर्दा करना पड़ता है। उसकी भाभी यह भी कहती है कि अगर मैं पर्दा नहीं करती हूँ तो मेरे साथ - साथ मेरे मायके और उनके संस्कारों पर उंगली उठाई जाएगी। भाभी कहती है कि पर्दा करने से किसी का मान-सम्मान,इज्जत इत्यादि बढ़ता या कम नहीं होता। इससे तो केवल स्त्रियों को आगे बढ़ने से रोका जाता है, उनका मानसिक विकास ना हो ऐसी कोशिश की जाती है। तथा वे अपने अधिकार न माँगने लगे और पुरुषों के साथ कंधे - से -कंधा मिलाकर न चलने लगे ऐसी कोशिश की जाती है। और बाद में उन्हीं पुरुषों के द्वारा यह कह दिया जाता है कि अधिकतर महिलाओं में दिमाग नहीं होता और जो महिलाएँ पर्दा करती है उन्हें ही समाज में सम्मान प्राप्त होता है ताकि अन्य महिलाएं भी ऐसा बनने का प्रयास करें।

दिपाली को भाभी की बातों में दम लगने लगा। और उसे स्वयं ही यह अहसास होने लगा कि जो भाभी कह रही है वह काफी मात्रा में सच ही है। और घर में भाभी की जो निंदा की जाती है वह सही नहीं है।

दिपाली समाज में फैली अनेक विसंगतियों पर नजर रखती है। ऐसे ही समय बीतता चला जाता है। अब दिपाल 12वी कक्षा में है। उसकी माँ सोचती थी कि समय के साथ उसके दृष्टिकोण में बदलाव आ जाएगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ बल्कि दीपाली अपने विचारों के प्रति और भी मजबूत हो गई। दीपाली की मां अब उसके लिए चिंता में थी कि पता नहीं इसका क्या होगा ?

तभी उनके घर में कुछ लोग आए, जो दीपाली की बहन रूपाली का रिश्ता लेकर आए थे। ये लोग दिखने में घरवालों की अपेक्षा काफी सभ्य लग रहे थे और थोड़े मॉडर्न भी। थोडे समय की बातचीत के बाद रूपाली का रिश्ता पक्का हो गया और कुछ दिन बाद रूपाली की शादी भी हो गई। जहाँ रूपाली की शादी हुई वहाँ कोई भी महिला पर्दा नहीं करती और रूपाली को भी वहाँ पर्दा नहीं करना पड़ता। इस बात से घरवाले काफी खुश थे कि वह जैसा चाहे वैसा जीवन जी सकती है। ये बातें सुनकर दीपाली के मन में अनेक प्रश्न कौंध जाते है। और वह कह उठती हैं कि रूपाली दीदी घर में किसी से पर्दा न करके घरवालों का अपमान कर रही है। वह उनका सम्मान नहीं कर रही है। दीपाली की बातों को सुनकर उसकी माँ गुस्से में भरकर बोलती है कि वे लोग सभ्य है और जानते है कि पर्दा करने या न करने से किसी का सम्मान नहीं होता। तभी दीपाली कह उठती है कि आप लोग सभ्य क्यों नहीं हो ? क्यों किसी से पर्दा करते हो? तथा लोगों को पर्दा करने के लिए मजबूर करते हो और जब खुद की बेटी की बात आई तो उसके ससुराल वाले सभ्य है, मॉडर्न है। यह कहकर दीपाली गुस्से में चली जाती है।

    

दीपाली की बातों को घर के सभी लोग सुन रहे थे अब सबको लगने लगा कि दीपाली की शादी कर देनी चाहिए नहीं तो वह और बिगड़ जाएगी। घरवालों ने दीपाली के लिए रिश्ता ढूंढ़ना शुरू कर दिया। दीपाली के लिए योग्य वर ढूँढ़ने में दो वर्ष का समय लगा। दीपाली अब ग्रेजुएशन कर रही है। वह अब अंतिम वर्ष में प्रवेश ले चुकी है। परन्तु वह शादी नहीं करना चाहती और न ही रुढ़ियों को अपनाना चाहती है। वह आगे पढ़कर नौकरी करना चाहती है। वह इस बात को अपने ससुराल वालों तक पहुंचवा देती है। दीपाली के ससुराल वाले उसकी शिक्षा के तो पक्ष में है परन्तु वे यह नहीं चाहते कि दीपाली उनके रीति - रिवाजों की आने वाले समय में अवहेलना करें। कुछ सहमति और कुछ असहमति से दीपाली की शादी रुहेलखंड में हो जाती है। दीपाली को शादी के बाद ससुर, जेठ, और बाहर से आने वाले किसी भी व्यक्ति से पर्दा करना पड़ता है। हालांकि घर में होने वाले शादी जैसे कार्यक्रमों में दीपाली को पर्दा नहीं करना पड़ता। दीपाली मन ही मन सोचती है कि मुझे कम - से - कम कार्यक्रमों में तो पर्दा नहीं करना पड़ता। परन्तु भाभी को तो पूरे समय पर्दे में रहना पड़ता है उन्हें कितनी घुटन महसूस होती होगी ? दीपाली इस विषय में अपने पति मयंक से बात करती है तो मयंक उससे कहता है कि चाहो तो तुम पर्दा मत करो, परन्तु तुम्हें घर में होने वाली आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ सकता है क्योंकि यहाँ लोग तुम्हारी भावनाओं का सम्मान नहीं करेंगे। तभी दीपाली मन ही मन संकल्प लेती है कि वह घर की सारी औरतों का पर्दा हटवाकर रहेंगी और यह काम घर के लोगों की स्वीकृति से होगा। इसी दौरान दीपाली की पोस्टग्रेजुएशन पूरी होने वाली होती है और तभी वह 'नेट' के 'एक्जॉम ' का फॉर्म भर देती है तथा चार महीने की कड़ी मेहनत करके प्रथम प्रयास में परीक्षा पास कर लेती है। तथा एक वर्ष के अंदर - अंदर एक कॉलेज लेक्चचर का पद प्राप्त करने में सफल हो जाती है। दीपाली की सफलता के लिए गांव में एक सभा का आयोजन किया जात है। क्योंकि गाँव में कोई भी महिला इतनी पढ़ी नहीं थी। उस सभा में दीपाली अपने विचार प्रस्तुत करती है और कहती है कि हमें केवल बहुओं को बेटी बनाकर लाना नहीं हैं अपितु उन्हें बेटी बनाकर रखनी भी चाहिए तथा पर्दा प्रथा जैसी कुप्रथाओं का त्याग करना चाहिए क्योंकि ये कुप्रथाएँ नारी के विकास में बाधक है। उसने अपने मां -पिता से भी आग्रह किया कि भाभियों से पर्दा न कराएं , उनकी निंदा न करें। वे भी आपकी ही बेटियाँ है। इन विचारों को सुनने के पश्चात् गांव के बड़े बुजुर्गो में यह सहमति बनी कि समय बदल रहा है और हमें समय के साथ चलना चाहिए तथा घर की बहू - बेटियों को पर्दा न करने की छूट दे देनी चाहिए। इस निर्णय के पश्चात गाँव की सभी महिलाओं ने जोरदार तालियों से दीपाली का धन्यवाद किया।


साहित्याला गुण द्या
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