मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Inspirational


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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Inspirational


परी (कहानी)

परी (कहानी)

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निर्मला ने बचपन से ही परियों की अनेक कहानियाँ सुन रखीं थीं। उसके मन में एक जिज्ञासा घर कर गई थी। ये परियाँ कौन होतीं है? कहाँ से आती हैं?

आज उसने अपनी माँ से पूछ ही लिया। 

- माँ, कहते हैं परियाँ बहुत सुन्दर होतीं हैं। जिस पर मेहरबान हो जाएँ, उसे मालामाल कर देतीं हैं। मैं भी परी बनूँगी। मैं भी आप लोगों को मालामाल कर दूँगी। 

- आप बताइये न, ये परियाँ कौन होती हैं, कहाँ से आतीं हैं?

- बेटी, किसी ने देखा तो नहीं, कहाँ से आतीं हैं। लेकिन ऐसी धारणा है कि देवलोक से आतीं हैं। प्रकृति ने इन्हे अपने जंगलों, वृक्षों, फूलों, नदियों और झरनों की देखभाल का जिम्मा सौंपा है। वे पृथ्वी के सौंदर्य की रक्षा करने वाली ऐसी शक्ति हैं, जो हमें दिखाई नहीं देती।

- तो क्या माँ, मैं तो दिखाई भी दे सकतीं हूँ और प्रकृति की रक्षा भी कर सकती हूँ। और परी भी बन सकतीं हूँ। 

- हाँ क्यों नहीं, बेटी । 

बस फिर क्या था निर्मला को अपने आदिवासी गाँव की कल-कल करती नदी की निर्मल धारा से प्रेम हो गया। पेड़, फूल, पत्ती इस की रक्षा करना तो जैसे उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी बन गए। इस संस्कृति से जुड़ी हर वस्तु उसको बहुत प्यारी लगती। आईने के सामने घंटों खड़े होकर परी के रूप में सजना-संवारना तो जैसे उसका रोज़ का काम था। जब आसमान को चीरकर निकलते हुए हवाई जहाज़ देखती तो माँ से पूछ बैठती।

- क्या माँ, परियाँ हवाई जहाज़ पर भी बैठती हैं?

- अरे बेटी, हवाई जहाज़ पर तो इंसान बैठते हैं। एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए। 

- माँ, हवाई जहाज़ दूर देश भी जाते हैं? 

- हाँ बेटी, जाते हैं।

- तो फिर देखना माँ, मैं भी जब हवाई जहाज़ में बैठकर दूसरे देश जाऊँगी न तो वहाँ सब लोग मुझे देख कर कहेंगे। अरे देखो... "ये हिन्दुस्तान की परी आई है।"

- अरे, तू बड़ी तो हो जा पहले। हम आदिवासी इन जंगलों के लिए ही पैदा हुए हैं। यही है हमारा जीवन। और इसी मिट्टी में मिलना है हमें। 

- देखना माँ, ये जो परियाँ आती हैं। ये एक दिन मेरे भी सपने पूरे करेंगी। 

वक़्त गुज़र रहा था निर्मला के सपने भी वास्तविकता की भट्टी में तपने लगे। अब वह नौवीं क्लास में पहुँच चुकी थी। उसके स्कूल में फेन्सी ड्रेस कॉम्पटीशन था। 

- माँ कल फेन्सी ड्रेस कॉम्पटीशन है। मैं परी बनूँगी। 

- लेकिन बेटे हमारे पास तो परियों जैसे कपड़े नहीं हैं। उसके लिए तो बहुत सुन्दर ड्रेस चाहिए होगी। हम मध्यम परिवार के लोग कहाँ से लाएँगे फिर भी मैं तेरे पिता जी से बात करती हूँ। 

- नहीं माँ, मैं तो बनूँगी ही, तू अपने कपड़े पहना दे, न।

निर्मला की ज़िद के आगे। सब झुक गए। पिता जी ने शहर से एक सुन्दर सी सफ़ेद ड्रेस मंगा दी। जिसे पहन कर वह बिल्कुल परी जैसी लग रही थी। अपनी माँ की परी।

माँ ने थर्मोकोल के पंख बना दिए। 

लेकिन जैसे ही निर्मला स्टेज पर चढ़ी, सारे बच्चों ने एक साथ आवाज़ निकाली। 

काली परी , काली पारी, काली परी ... . 

निर्मला का विश्वास स्टेज की सीढ़ियां चढ़ने से पहले ही डोल गया। उसे लगा वापस चली जाऊँ। लेकिन स्टेज पर पहुँचना तो था। 

तो क्या, परी काली नहीं हो सकती? ये रंग किसने बनाए हैं? ये कौन बताता है कि कौन काला है और कौन गोरा है? 

जैसे-जैसे बड़ी होती जा रही थी वैसे-वैसे अनेक प्रश्नों खड़े होते जा रहे थे। जब कोई कपड़े पहनती। कभी भाई को एतराज होता कभी पिता जी को। 

भाई अक्सर कहता- "तू ये कपड़े पहन कर जाएगी तो चार लोग क्या कहेंगे?"

भिड़ जाती, भाई से कहती- "तू उन चार लोगों को लाकर दिखा। कौन है वो। मैं भी तो देखूँ।"

कॉलेज में पहुँचते-पहुँचते उसे फैशन की दुनिया का भी आभास होने लगा। इंस्टाग्राम पर फैशन शो को फॉलो करने लगी। अब उसका सपना मॉडल बनना था। लेकिन पोर्टफोलियो बनवाने के लिए पैसे नहीं थे। ग्रेजुएशन के बाद दिल्ली चली गई नौकरी की तलाश में। ताकि कुछ पैसों का जुगाड़ किया जा सके।  

जब पोर्टफोलियो बन कर तैयार हुआ तो फोटोग्राफर ने बताया- "तुम्हारी तस्वीर और लुक तो हॉलीवुड सिंगर निम्मी से मिलती है।" मैं तुम्हें प्रोजेक्ट करूँगा।.... "इंडियन निम्मी"

ये बात सही है कि अगर किसी चीज़ को सिद्दत से चाहो तो सारी कायनात उसे मिलाने के लिए जुट जाती है। देखते ही देखते निर्मला हिन्दुस्तान की मशहूर मॉडल बन गई थी। उसके डस्की कलर के लोग दीवाने बन गए थे। ग्लैमरस की दुनिया उसका स्वागत करने के लिए बेताब थी। जहाँ भी जाती योंग्सटर्स, ऑटो ग्राफ प्लीज, ऑटो ग्राफ प्लीज की सदाएं लगाते।  

अब उसका चयन पेरिस में अपने देश के फैशन वस्त्रों और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने के लिए हो गया था। 

आज वही जंगलों की परी हवाई जहाज़ में बैठकर अपने देश की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने जा रही थीं।

"काली परी" के नाम से विख्यात निम्मी ने साबित कर दिया था। जहाँ चाह है। वहाँ राह है। रंग, रूप, और उम्र कोई मायने नहीं रखते। 



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