प्रेमांजली- एक भूली दास्ताँ

प्रेमांजली- एक भूली दास्ताँ

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"ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन"

मोबाइल की घन्टी से प्रेम कुछ चौंक सा गया। लम्बे अरसे के बाद मनोज का आया था।

"हेलो..मैं मनोज"

"हाँ भाई ! क्या हाल है ?बड़े दिनों के बाद याद किया !"

हमारी खैर ख़बर बाद में लेना, पहले तुम्हारी गर्लफ्रैंड से बात कराता हूँ" कहकर उसने फोन किसी और को थमा दिया।

प्रेम कुछ देर चुप रहा, उधर से जानी पहचानी सी मीठी आवाज आयी-"हेलो ! पहचाना !."

प्रेम इस आवाज को भला कैसे भूल सकता था।उसके खुशी का ठिकाना न रहा।फिर भी थोड़ा अनजान सा बनकर बोला

"कौन ?"

"मुझे पहचाना नहीं ? मैं -मैं अंजलि।"

अब प्रेम को थोड़ी शरारत सूझी "कौन अंजलि ?"

"अरे यार ! तुम भूल गए मुझे। मैं तुम्हारी दोस्त कॉलेज की।"

"ओ अंजलि ! "प्रेम को अधिक देर परेशान करना ठीक नहींं।लगा।आखिर उसे भी तो बात करने की बैचेनी थी।

"बताओ कैसी हो ? कहाँ थी इतने दिनों तक ? तूमन कभी याद ही नहींं किया।अब जाके.."

"अरे .रे रे बस -बस कितने सवाल एक साथ पूछ बैठे ? तुम्हारी आदत नहींं बदली है।किसी को बोलने ही नहींं देते हो।

अंजलि ने शिकायती लहजे में उल्टे सवाल दाग दिया 

" तुम...तुम तो जैसे रोज याद कर रहे थे मुझे ! कभी खैर ख़बर भी ली मेरी की मैं कहाँ हूँ ?क्या कर रही हूँ ?"

प्रेम उसे क्या कहता ? ऐसा कौन सा दिन था जब उसकी याद न आयी हो ? अरे वो तो साँसों में बसी थी।कोई भला अपनी धड़कन को भूल सकता है ?

अंजलि से मिलकर पहली बार ही प्रेम के दिल ने कहा" हाँ यही तो है ! भोली-सी सूरत आँखों मे शरारत।उसकी बातें,उसका हँसना।गालों का डिम्पल..प्रेम बस उसे देखता ही रह गया। फिर पढ़ाई शुरू हुई और अंजलि घर चली गयी। वो बहुत दूर से आती थी इसलिए हर दिन कॉलेज आना सम्भव नहींं होता था । फिर भी प्रेम हर रोज कॉलेज में उसका इंतजार करता और मायूस होकर घर लौट जाता। जिस दिन अंजलि आती प्रेम खुशी से झूम उठता। पढ़ाई के बाद खाली वक्त कॉलेज के बाहर मैदान में दोनों साथ बैठते लेकिन बातें सिर्फ पढ़ाई-लिखाई की होती थी। प्यार-इश्क़ और मुहब्बत की बातें न तो अंजलि को समझ मे आती थी और न ही प्रेम को इसका मतलब पता था। वो तो बस उसके साथ बैठना, बातें करना और बिना स्वार्थ के उसकी मदद करना अच्छा लगता था। वो खुद नोट्स बनाता और एक कॉपी अंजलि को दे देता। कॉलेज से बस स्टैंड की दूरी करीब दो किलोमीटर थी दोनो पैदल ही साथ-साथ आते फिर अजंलि गाड़ी में बैठकर अपने गांव चली जाती और प्रेम उसकी राह देखता रहता।

  प्रेम को अजंलि के बिना मन नहीं लगने लगा था। वो हर पल अपने पास देखना चाहता था। खूब बातें करना चाहता लेकिन कोई साधन नहींं था। 

 एक दिन कॉलेज से दोनों एक रिक्शे पर बस स्टेंड जा रहे थे। प्रेम ने बड़ी मासूमियत से कहा- 

"अंजू ! (प्रेम के लिए अजंलि अंजू बन चुकी थी) तुम अपना एक फोटो दो न !"

"क्यूँ ? क्या करोगे ?"

"बस यूं ही ! अपने पास रखूंगा और क्या ?"

"नहींं, बिल्कुल नहीं !"

दोनो में इसी बात को लेकर बहस होने लगी। प्रेम को फ़ोटो चाहिए थी और अजंलि देने को तैयार नहींं थी। 

प्रेम भी कहाँ माननेवाला था।अंजू की पर्स खोली और फ़ोटो निकाल जेब में रख लिया। 

"अब बोलो क्या करोगी ?"

"प्लीज..प्लीज मेरा फ़ोटो दे दो"

"अरे तुम इतना डर क्यों रही हो। मैं तुम्हारी तस्वीर खा तो नहींं जाऊंगा। बहुत संभाल कर रखूंगा"

"नहीं--नहींं, मेरा फ़ोटो वापस कर दो"

इसी झगड़े में दोनों बस स्टैंड पंहुंच गए और अंजू अपने गांव चली गयी। प्रेम की तो जैसे लॉटरी लग गयी और वह खुशी से झूम उठा। प्रेम को पेंटिंग का भी शौक था। उसने पूरी रात जगकर अंजू की बड़ी तस्वीर बनायी।

युवावर्ग में वेलेंटाइन डे नामक एक नया त्यौहार ट्रेंड कर रहा था। हर कोई अपने प्रेमी को अपने -अपने तरीकों से खुश रखने की कोशिश कर रहा था। प्रपोज के लिए तो इससे बढ़िया मौका हो ही नहींं सकता था. इसको लेकर भी समाज धड़ों में बंटा हुआ दिख रहा था। कुछ लोग इसे पाश्चात्य संस्कृति की देन और भारतीय संस्कृति पर प्रहार बताकर विरोध करने में लगे थे तो अधिकांश कॉलेज गोइंग युवा इसे एक उत्सव के रूप में देख रहे थे। आखिर दिल का जो मामला था। विरोध और समर्थन के बीच जोरदार बहस चल रही थी। बजरंग दल,आरएसएस और विद्यार्थी परिषद इसके विरोध में बलवा काटने को तैयार रहते। 14 फरवरी के दिन इनका हुजूम पार्कों में अपनी शक्ति प्रदर्शन या यूं कहें प्रेमियों के लिए विलेन बनकर सामने खड़े होने लगे। पार्क में जो भी मिलता उसे मारते-पीटते ,बेइज्जत करते ,जबरन शादी करवाते या फिर खूब परेशान करते। हालांकि इस आड़ में कुछ लड़के छेड़खानी में भी हाथ आजमा लेते। पुलिस प्रशासन भी इनका साथ दे रही थी। आलम यह कि 14 फरवरी के दिन पार्कों में विशेष एहतियात बरती जाती । लोग यहां जाने से कतराने लगे ,एक भय का माहौल बन रहा था। हालांकि इसके लिए लड़के-लड़कियां ही जिम्मेदार थे। दरअसल वेलेंटाइन के नामपर कुछ लड़के लड़कियां सारी हदें पारकर पार्कों में खुलेआम अश्लील हरकतें करने लगे। शहर के किसी भी पार्क में आप चले जाइये, स्कूल-कॉलेज की ड्रेस में स्टूडेंट्स सारी मर्यादा लांघकर अश्लीलता करते दिख जाते जिसका कहीं न कहीं समाज मे दुष्प्रभाव भी पड़ने लगा। लोगों का परिवार के साथ पार्कों में जाना मुहाल हो गया। लोगों ने पुलिस-प्रशासन से शिकायत शुरू कर दी। खैर, तमाम विरोध के वावजूद बाजार ने वेलेंटाइन डे को भारत को बरगद की तरह स्थापित कर ही दिया। महंगे गिफ्ट, कार्ड और आयोजनों से इसका क्रेज बढ़ता ही गया। 

प्रेम भी अपनी अंजलि को प्रपोज़ करने का मौका ढूंढ रहा था, ऐसे में वेलेंटाइन डूबते को तिनके का सहारा बनकर आया। अपनी अंजू के लिए उसने आर्चीज का बढ़िया कार्ड खरीदा और अपनी कलाकारी भी दिखायी। बड़ी हिम्मत और उमंग के साथ निकल पड़ा अपनी अंजू को प्यार का इजहार करने। रास्ते भर ख़्वाब बुनता रहा,आखिर मुलाकात के दो साल बाद लव एट फर्स्ट साइट का इजहार करने जा रहा था। उसे तो पता ही नहींं था कि अंजू के दिल मे क्या है ? सिर्फ दोस्ती या उससे अधिक। आज कदम लड़खड़ा रहे थे, अजीब सी बैचेनी हो रही थी।

" कहीं अंजलि ने इनकार कर दिया तो ! नहींं नहींं वो भला कैसे इनकार सकती है ? कितना ख्याल रखती है मेरा। हरपल मेरे बारे में सोचती है।"

मन मे अजीब सी उधेड़बुन चल रही थी, जैसे-जैसे उसका घर नजदीक आ रहा था प्रेम का दिल घबराने लगा था। 

उसके घर के पास पहुंचकर तो दिल और जोर जोर से धड़कने लगा। साँसे फूलने लगी थी जैसे कोई पहाड़ चढ़ रहा हो। घर के बाहर काफी देर खुद को शांत किया फिर दरवाजा खटखटाया, सामने अंजू थी। नजरों ने आपस मे बात की और लबो में मुस्कुराहट बिखर गई।

" अंदर आओ ! कहकर वो घर के भीतर चली गयी। 

प्रेम कुर्सी पर बैठकर इंतजार करने लगा। कार्ड को छुपा रखा था। निकालने की हिम्मत नहींं कर पा रहा था। उसने चुपचाप कार्ड को ड्राइंग टेबल के नीचे छिपा कर रख दिया। 

तभी अंजलि चाय लेकर कमरे में आ गयी और उसने शायद प्रेम को कार्ड छूपाते हुए देख लिया था। 

"क्या छुपा रहे हों वहाँ ?" अंजू की आवाज सुनकर प्रेम घबरा गया।

"कुछ नहींं तो"

"झूठ मत बोलो, कुछ तो रखा है तुमने टेबल के नीचे,दिखाओ मुझे।" 

प्रेम ने कार्ड को छूपाते हुए कहा " एक गिफ्ट है तुम्हारे लिए वेलेंटाइन का ।लेकिन अभी मत देखना। मेरे जाने के बाद देखना।"

अरे, क्या गिफ्ट है ? और मुझे वेलेंटाइन -टेलेन्टाइन समझ मे नहींं आता । फालतू का सब पगलाते रहता है ।"

"इसमे बुरा क्या है ? जैसे बाकी पर्व त्यौहार मनाते हैं वैसे ही वेलेंटाइन भी है। अच्छा है न कम से कम प्रेमियों को प्यार जताने के अवसर तो मिल जाता है।" प्रेम ने अंजू के दिल को टटोलना चाहा। लेकिन अंजू को इन बातों से जैसे कोई मतलब ही नहीं था। 

"अरे बकवास है, ई सब पश्चिमी सभ्यता की देन है जो हमारे देश को बर्बाद कर रही है।" 

"कोई जरूरी तो नहींं कि हर पश्चिमी सभ्यता गलत ही हो। देखो हर चीज का दो पक्ष होता है। हम अच्छे का अनुसरण करते हैं या बुरे का यह तो हमपर निर्भर करता है न।"

" कुछ भी हो लेकिन मुझे ये पसन्द नहींं है और तुम भी ज्यादा पक्षदारी मत कर दो वेलेंटाइन-फेलेन्टाइन का। समझे !"

"ठीक है बाबा। हम भी कहाँ कहीं घूमने जा रहे हैं । तुम्हारे घर ही तो आये हैं और छोड़ो, जाने दो । वेलेंटाइन नहींं बस यूं ही मेरा गिफ्ट है समझो। लेकिन अभी नहींं ,मेरे जाने के बाद ही देखना ।तुम्हे मेरी कसम। "

"अच्छा ठीक है ,नहींं देखेंगे बस। लो चाय पीयो और सुनाओ कॉलेज का हाल।"

प्रेम को गुस्सा भी आ रहा की आज भी कोई कॉलेज और पढ़ाई की बात करता है भला। लेकिन जाहिर नहींं होने दिया। चाय सुड़कते हुए बोला

" क्या खाक रहेगा कॉलेज का हाल, न तो स्टूडेंट को आना है और न ही टीचर को"

"तुम मेरी खिंचाई कर रहे ?"

"ना-ना -ना , मेरी इतनी जुर्रत"

"हा हा हा" दोनों का ठहाका गूँज पड़ा। 

काफी देर तक दोनों इधर-उधर की बाते करते रहे। फिर प्रेम जाने को उठा। "अच्छा तो अब हम चलते हैं। तुम कॉलेज आओगी न !"

"देखते हैं ,अभी तो कुछ दिन नहींं जा सकते है। घर में इतना काम है कि निकलना मुश्किल हो रहा है। "

"ओके बाय !"

"बाय-बाय"

बाहर निकल कर प्रेम ने गाड़ी पकड़ी और घर के लिए निकल पड़ा। पूरे शरीर में अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी। तीर तो छोड़ दिया था लेकिन निशाने को देखने की हिम्मत नहींं हो रही थी। 

" पता नहींं कार्ड देखकर अंजू का क्या रिएक्शन होगा ?" सोच-सोचकर सर में दर्द होने लगा। घर पहुंचकर निढाल हो सो गया। 

कॉलेज में छुट्टियां चल रही थी सो कई दिनों तक दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी और न ही कोई बातचीत हुई। 

प्रेम की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। अब और इंतजार करना मुश्किल हो रहा था। मन मे डर बैठ गया कि "पता नहींं कार्ड देखकर अंजू नाराज़ तो नहींं हो गयी ?"

"कहीं प्यार के चक्कर में अच्छी-खासी दोस्ती न खत्म हो जाय।" मन मे तरह -तरह के उलूल-जुलूल सवाल उठ रहे थे। 

अब प्रेम ने ठान लिया कि " चाहे जो हो घर जाकर पता कर ही लेंगे"

अगले दिन अंजू के घर जाने की हिम्मत जुटाकर निकल पड़ा। 

अगले दिन कॉलेज पहुंचते ही अंजू प्रेमके साथ उलझ पड़ी और अपनी तस्वीर माँगने लगी। प्रेम ने बड़े बुझे मन से उसकी तस्वीर लौटा दी। साथ ही जिस फ़ोटो को रातभर जग कर बनाया था उसे भी भेंट कर दी। 

"ये लो अपनी फ़ोटो। कितना छोटा दिल है तुम्हारा एक फोटो के लिए इतना हायतौबा मचा रखी है। मेरे दिल में जो तस्वीर छप गयी है उसे कैसे लोगी ?"

शायद अंजू ने ध्यान नहींं दिया और अनमयस्क सी क्लास के अंदर चली गयी। 

प्रेम पढ़ाई के साथ -साथ अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाता था। सेमिनार, वर्कशॉप तथा अन्य कार्यक्रमों में अंजू उसके हर कदम में साथ होती थी। धीरे-धीरे प्रेम अंजू के करीब आता गया और सहपाठी कब उसकी प्रेमिका बन गयी पता ही नहींं चला। 

अब तो प्रेम हर वक्त अंजू की यादों में ही खोया रहता। मिलना चाहता,बातें करना चाहता लेकिन वो रहती इतनी दूर थी कि हर रोज मिलना मुमकिन नहींं था। कोई बातचीत का भी साधन नहींं। 

एक रोज बड़ी हिम्मत कर वह अंजू के घर पहुंच गया।

"ठक-ठक-ठक-ठक" दरवाजा खटखटाया।

दरवाजा खुला तो बस स्तब्ध सा एकटक देखता रह गया। 

"अरे तुम ! यहाँ..कैसे ? " सामने अंजू ही थी। 

"मैं....मैं बस यहाँ अमित से मिलने आया था सोच तुमसे भी मिल लूँ। बहुत दिन हो गए तुम कॉलेज आयी नहींं ?"प्रेम चाहकर भी सीधे सीधे बता नहीं पाया कि वो तो सिर्फ अंजू से ही मिलने इतनी दूर आया था।

"अरे हाँ आओ..अंदर भी आओ.. बैठो। "

कहकर अंदर चली गयी। प्रेम ने कुर्सी पर बैठते ही सरसरी निगाह से पूरे कमरे का मुआयना कर लिया।बहुत तामझाम नहींं ,साधारण सा खपड़ैल घर लेकिन सबकुछ बहुत करीने से सजा हुआ कमरा। सबकुछ व्यवस्थित और सुंदर। 

कुछ ही देर में अंजू चाय लेकर आयी और सामने की कुर्सी पर बैठ गयी। प्रेम उसे ही एकटक देखे जा रहा था। 

"और बताओ कॉलेज का हाल। क्लास रेगुलर चल रहा है न ?"

"हाँ लेकिन तुम्हारे बिना अधूरी लगती है"

"हा-हा-हा-हा"

फिर देर तक क्लास, पढ़ाई-लिखाई,घर-परिवार की बातें होती रही। अंजू के घर में उसके साथ माँ और भैया रहते थे। पापा बहुत पहले गुजर गए थे। उनकी एक तस्वीर दीवार में लगी हुई उनकी कमी का अहसास दिला रही थी। 

थोड़ी देर में उसके भैया और माँ से भी परिचय हो गया। बातों का सिलसिला इस कदर चला की कब शाम ढल गयी इसका पता ही नहींं चला। 

"अच्छा अब मैं चलता हूँ। " प्रेम का मन जाने को तो नहींं कर रहा था लेकिन अनमने से उठकर चलने को हुआ।

"जाओगे" अंजू ने ऐसे कहा तो प्रेम को लगा कि वह वहीं रुक जाय।

"अच्छा ! अब तो घर देख लिया आते रहना। " अंजू उसे बाहर तक छोड़ने आयी। एक प्यारी सी मुस्कान के साथ विदा किया। प्रेम इस हसीन पल को सदा के लिए दिल मे बसा लेना चाहता था। सड़क पर आते ही गाड़ी मिल गयी और वह अंजू की यादों का पिटारा लेकर चल पड़ा अपने घर की ओर।.......

प्रेम आज बहुत खुश था। घर लौटते वक्त पूरे रास्ते अंजू के ख्यालों में ही खोया रहा। ख्वाबों के पंख लगने लगे और हसीन सपने बुनने लगा। घर आकर उसकी बैचेनी और बढ़ गयी। सारी रात बिस्तर पे करवटें बदलता रहा उसे इंतजार था सुबह का ताकि अंजू से कॉलेज में मुलाकात हो सके। 

सुबह जल्दी तैयार होकर वक्त से पहले कॉलेज पहुंच गया और अंजू का इंतजार करने लगा। वह ख्यालों में ही खोया था और उसे पता ही नहींं चला की अंजू उसके पीछे आकर खड़ी है। 

"अरे ! क्लास नहींं चल रहा है क्या ? बाहर क्यों खड़े हो ?" अंजू की आवाज सुनकर प्रेम चौंक सा गया।

"अरे ! तुम कब आयी ? मैं तो तुम्हारी ही राह देख रहा था, तुम्हारा इंतजार कर रहा था। "

"इंतजार ? मेरा किसलिए इंतजार कर रहे थे ?"

प्रेम चुपचाप उसे देखता रहा ,कहे भी तो क्या ? कितना चाहने लगा है उसे।

क्लास खत्म कर दोनों कुछ देर बाहर बैठे रहे। इधर-उधर की बातें होती रही और फिर दोनों घर की ओर चल पड़े। दोनो चुपचाप। 

"सुनो न ! मैं अब कॉलेज नहींं आ सकती।" अंजू की बातों ने खामोशी तोड़ी।

"क्या ? क्या ? क्यों ? क्यों नहींं आ सकती ? वैसे भी तुम अति ही कितनी हो।"

"नहींं ,बहुत दूर है न । इसलिए रोज आना सम्भव नहींं है। तुम नोट्स बनाकर मुझे दे देना न।प्लीज !"

"वो तो मैं कर हो दूँगा। लेकिन कॉलेज नहींं आओगी ये बात ठीक नहींं। मेरा मन नहींं लगेगा।" प्रेम ने बड़ी मासूमियत के साथ कही। 

अच्छा ! तुम मेरे लिए कॉलेज आते हो क्या ?" अंजू की मासूमियत पर प्रेम मुस्कुरा भर दिया। 

"नहींं ऐसी बात नहींं। देखो कितनी सारी लड़कियां है कमी है क्या ?"

"तो फिर जाओ ! उन्हीं के साथ बैठो" अंजू थोड़ी नाराज सी हो गयी। 

"अरे यार ! नाराज मत हो। तुम मेरी बेस्ट फ्रेंड हो ।तुम्हारे बिना मन नहींं लगता न ।"

"ठीक है चलो।" 

दोनों आज पैदल ही घर के लिए निकल पड़े और कब स्टेण्ड पहुंच गए इसका पता ही नहीं चला। अंजू गाड़ी में बैठकर अपने गाँव चली गयी। 

अब तो प्रेम का हर लम्हा अंजू की यादों में हो गुजरने लगा। एक पल की भी जुदाई बर्दाश्त नहींं हो रही थी। दीवानगी की हद ऐसी की अपने घर के पास सड़क पर खड़ा होकर अंजू की गाड़ी के गुजरने का इंतजार करता। उसकी एक झलक पाकर खुश हो लेता। 

इस दरम्यान वह कई दफा अंजू के घर जा चुका था। मानो उसके घर का एक सदस्य सा बन गया था। हर पर्व त्यौहार में जाता और अंजू के परिजनों के साथ खुशियां बाँटता। प्रेम पर इश्क़ का रंग गहराने लगा था। उसकी तस्वीर बनाता,डायरी में उसके बारे में लिखते-लिखते कहानी-कविताएं गढ़ने लगा।

बता कैसे ?

दिल में ही रहती हो तुम मेरे

दूर तुझसे रहूँ मैं, बता कैसे ?


दिल में धड़कती हो तुम मेरे

रोक लूं साँसे मैं, बता कैसे ?


ख्वाबों में आती हो तुम मेरे

रात सो जाऊं मैं, बता कैसे ?


आँखों में यूँ छुपे रहते तुम मेरे

चिलमन गिराऊं मैं, बता कैसे ?


यादों में यूँ बसे हो तुम मेरे

खुद को भुलाऊँ मैं, बता कैसे ?


जान ! जिंदगी बन गए हो मेरे

मौत को बुलाऊँ मैं, बता कैसे ?

अब तो कॉलेज में भी दोनों के चर्चे होने लगे। प्रेम और मनोज अच्छे दोस्त थे। शाम के वक्त दोनो अक्सर बैठकर उसकी बातें करते। कभी -कभी मनोज चुटकी भी लेता की "क्या प्रेम ! तुम्हारी तो बातें आ अंजु पर ही आकर सिमट जाती है।"

प्रेम चुपचाप मुस्कुराता रहता। वक्त गुजरता गया। प्रेम अंजू के इश्क़ में डूबता चला गया। लेकिन कभी पूछने की हिम्मत नहींं जुटा सका की अंजू के दिल मे क्या है ?.उसकी हंसी, बातें करना, साथ रहना, सबकुछ तो दिल को भाता था। वह अपने दिल को समझाता "अरे उससे क्या पूछना ? वो जरूर प्यार करती है मुझे तभी तो इतना ख्याल रखती है। "

आज प्रेम बहुत बैचेन था,अंजू से बात करना चाहता था लेकि न बात करने का कोई साधन नहींं।अंजू के चाचा के घर टेलीफोन था। प्रेम ने पब्लिक बूथ जाकर फोन लगा दिया-

"हैलो ! कौन ?

उधर से एके महिला की आवाज आयी.

प्रेम की साँसे भट्ठी की धौंकनी की तरह तेज चलने लगी। क्या कहे- "जी मुझे अंजू से बात करनी है।" 

"आप कौन बोल रहे हैं ? महिला की आवाज सुनकर प्रेम की धड़कन और तेज हो गयी। खामोश हो गया क्या कहे। फिर हिम्मत जुटाकर कहा।

"जी मैं प्रेम। अंजू के क्लास में पढ़ता हूँ। दोस्त हूँ।नोट्स के बारे में बात करनी है " 

"ठीक है। 5 मिनट फिर फोन कीजिये तब तक बुलवाती हूँ।" कहकर फोन काट दिया। उनदिनों बहुत कम लोगों के घर टेलीफोन हुआ करता था। काल रेट भी इतना महँगा की लोग नापतौल कर ही बातें किया करते थे। खैर ! मैं भी इंतजार करने लगा। 5 मिंट का इंतजार पहाड़ जैसा लग रहा था। धडकनें तेज थी। क्या बात करूँगा। बुरा तो नहींं मानेगी। मन में सैकड़ों तरह के ख्याल आ रहै थे। कहतें हैं न खाली मन शैतान का घर। कॉलेज में तो खूब सारी बातें कर लेता  शरारत भी कर लेता था लेकिन पहली बार टेलीफोन पर क्या बात करूँगा ? सोच-सोचकर प्रेम परेशान हो रहा था।

ठीक 5 मिनट में दुबारा डायल कर दिया- "हैलो ! प्रेम बोल रहा हूँ। अंजू आयी ?"

उधर से उसी महिला की आवाज सुनायी पड़ी-

"अंजली तो घर पर है नहींं। किसी सहेली के घर गयी है। कुछ कहना है तो बोलिये ।कह देंगे।"

"नहींं.... कुछ खास नहीं। कभी बात कर लूंगा। "

प्रेम ने अपने पड़ोसी का नम्बर दे रखा था। अगले दिन अंजू ने फोन किया तो मैं अपने घर पर नहींं था। बात नहींं हो पायी। घर आया तो पापा ने बताया कि "रमेश अंकल के घर किसी अजंलि का फोन तुम्हारे लिए आया था"।

कभी उसके तो कभी मेरे घर से बाहर जाने के वक्त को कोसने के सिवा कोई और चारा नहींं था। काफी कोशिशों के बाद भी हमारी फोन पर बातचीत नहींं हो सकी। 

वेलेंटाइन डे मनाने का दौर शुरू हुआ था। कोलेजिया कैम्पस में यह अपना पैर पसारने लगा था। करीब महीना भर पहले से लड़के-लड़कियां इस दिन का इंतजार करने लगते। प्रेम को भी वेलेंटाइन डे का बेसब्री से इंतजार था। अंजू को प्रपोज़ करने का इससे बढ़िया मौका नहींं हो सकता था। उसे भी अंजू के दिल का हाल जानने की बैचेनी थी लेकिन अस्वीकार का भी डर कहीं न कहीं दिल के एक कोने में बैठा बैचेन कर देता। खैर प्रेम ने वेलेंटाइन की तैयारियां शुरू कर दी...

युवावर्ग में वेलेंटाइन डे नामक एक नया त्यौहार ट्रेंड कर रहा था। हर कोई अपने प्रेमी को अपने -अपने तरीकों से खुश रखने की कोशिश कर रहा था। प्रपोज के लिए तो इससे बढ़िया मौका हो ही नहींं सकता था. इसको लेकर भी समाज धड़ों में बंटा हुआ दिख रहा था। कुछ लोग इसे पाश्चात्य संस्कृति की देन और भारतीय संस्कृति पर प्रहार बताकर विरोध करने में लगे थे तो अधिकांश कॉलेज गोइंग युवा इसे एक उत्सव के रूप में देख रहे थे। आखिर दिल का जो मामला था। विरोध और समर्थन के बीच जोरदार बहस चल रही थी। बजरंग दल,आरएसएस और विद्यार्थी परिषद इसके विरोध में बलवा काटने को तैयार रहते। 14 फरवरी के दिन इनका हुजूम पार्कों में अपनी शक्ति प्रदर्शन या यूं कहें प्रेमियों के लिए विलेन बनकर सामने खड़े होने लगे। पार्क में जो भी मिलता उसे मारते-पीटते ,बेइज्जत करते ,जबरन शादी करवाते या फिर खूब परेशान करते। हालांकि इस आड़ में कुछ लड़के छेड़खानी में भी हाथ आजमा लेते। पुलिस प्रशासन भी इनका साथ दे रही थी। आलम यह कि 14 फरवरी के दिन पार्कों में विशेष एहतियात बरती जाती । लोग यहां जाने से कतराने लगे ,एक भय का माहौल बन रहा था। हालांकि इसके लिए लड़के-लड़कियां ही जिम्मेदार थे। दरअसल वेलेंटाइन के नामपर कुछ लड़के लड़कियां सारी हदें पारकर पार्कों में खुलेआम अश्लील हरकतें करने लगे। शहर के किसी भी पार्क में आप चले जाइये, स्कूल-कॉलेज की ड्रेस में स्टूडेंट्स सारी मर्यादा लांघकर अश्लीलता करते दिख जाते जिसका कहीं न कहीं समाज मे दुष्प्रभाव भी पड़ने लगा। लोगों का परिवार के साथ पार्कों में जाना मुहाल हो गया। लोगों ने पुलिस-प्रशासन से शिकायत शुरू कर दी। खैर, तमाम विरोध के वावजूद बाजार ने वेलेंटाइन डे को भारत को बरगद की तरह स्थापित कर ही दिया। महंगे गिफ्ट, कार्ड और आयोजनों से इसका क्रेज बढ़ता ही गया। 

प्रेम भी अपनी अंजलि को प्रपोज़ करने का मौका ढूंढ रहा था, ऐसे में वेलेंटाइन डूबते को तिनके का सहारा बनकर आया। अपनी अंजू के लिए उसने आर्चीज का बढ़िया कार्ड खरीदा और अपनी कलाकारी भी दिखायी। बड़ी हिम्मत और उमंग के साथ निकल पड़ा अपनी अंजू को प्यार का इजहार करने। रास्ते भर ख़्वाब बुनता रहा,आखिर मुलाकात के दो साल बाद लव एट फर्स्ट साइट का इजहार करने जा रहा था। उसे तो पता ही नहींं था कि अंजू के दिल मे क्या है ? सिर्फ दोस्ती या उससे अधिक। आज कदम लड़खड़ा रहे थे, अजीब सी बैचेनी हो रही थी।

" कहीं अंजलि ने इनकार कर दिया तो ! नहींं नहींं वो भला कैसे इनकार सकती है ? कितना ख्याल रखती है मेरा। हरपल मेरे बारे में सोचती है।"

मन मे अजीब सी उधेड़बुन चल रही थी, जैसे-जैसे उसका घर नजदीक आ रहा था प्रेम का दिल घबराने लगा था। 

उसके घर के पास पहुंचकर तो दिल और जोर जोर से धड़कने लगा। साँसे फूलने लगी थी जैसे कोई पहाड़ चढ़ रहा हो। घर के बाहर काफी देर खुद को शांत किया फिर दरवाजा खटखटाया, सामने अंजू थी। नजरों ने आपस मे बात की और लबो में मुस्कुराहट बिखर गई।

" अंदर आओ ! कहकर वो घर के भीतर चली गयी। 

प्रेम कुर्सी पर बैठकर इंतजार करने लगा। कार्ड को छुपा रखा था। निकालने की हिम्मत नहींं कर पा रहा था। उसने चुपचाप कार्ड को ड्राइंग टेबल के नीचे छिपा कर रख दिया। 

तभी अंजलि चाय लेकर कमरे में आ गयी और उसने शायद प्रेम को कार्ड छूपाते हुए देख लिया था। 

"क्या छुपा रहे हों वहाँ ?" अंजू की आवाज सुनकर प्रेम घबरा गया।

"कुछ नहींं तो"

"झूठ मत बोलो, कुछ तो रखा है तुमने टेबल के नीचे,दिखाओ मुझे।" 

प्रेम ने कार्ड को छूपाते हुए कहा " एक गिफ्ट है तुम्हारे लिए वेलेंटाइन का ।लेकिन अभी मत देखना। मेरे जाने के बाद देखना।

"अरे, क्या गिफ्ट है ? और मुझे वेलेंटाइन -टेलेन्टाइन समझ मे नहींं आता । फालतू का सब पगलाते रहता है ।"

"इसमे बुरा क्या है ? जैसे बाकी पर्व त्यौहार मनाते हैं वैसे ही वेलेंटाइन भी है। अच्छा है न कम से कम प्रेमियों को प्यार जताने के अवसर तो मिल जाता है।" प्रेम ने अंजू के दिल को टटोलना चाहा। लेकिन अंजू को इन बातों से जैसे कोई मतलब ही नहीं था। 

"अरे बकवास है, ई सब पश्चिमी सभ्यता की देन है जो हमारे देश को बर्बाद कर रही है।" 

"कोई जरूरी तो नहींं कि हर पश्चिमी सभ्यता गलत ही हो। देखो हर चीज का दो पक्ष होता है। हम अच्छे का अनुसरण करते हैं या बुरे का यह तो हमपर निर्भर करता है न।"

" कुछ भी हो लेकिन मुझे ये पसन्द नहींं है और तुम भी ज्यादा पक्षदारी मत कर दो वेलेंटाइन-फेलेन्टाइन का। समझे !"

"ठीक है बाबा। हम भी कहाँ कहीं घूमने जा रहे हैं । तुम्हारे घर ही तो आये हैं और छोड़ो, जाने दो । वेलेंटाइन नहींं बस यूं ही मेरा गिफ्ट है समझो। लेकिन अभी नहींं ,मेरे जाने के बाद ही देखना ।तुम्हे मेरी कसम। "

"अच्छा ठीक है ,नहींं देखेंगे बस। लो चाय पीयो और सुनाओ कॉलेज का हाल।"

प्रेम को गुस्सा भी आ रहा की आज भी कोई कॉलेज और पढ़ाई की बात करता है भला। लेकिन जाहिर नहींं होने दिया। चाय सुड़कते हुए बोला

" क्या खाक रहेगा कॉलेज का हाल, न तो स्टूडेंट को आना है और न ही टीचर को"

"तुम मेरी खिंचाई कर रहे ?"

"ना-ना -ना , मेरी इतनी जुर्रत"

"हा हा हा" दोनों का ठहाका गूँज पड़ा। 

काफी देर तक दोनों इधर-उधर की बाते करते रहे। फिर प्रेम जाने को उठा। "अच्छा तो अब हम चलते हैं। तुम कॉलेज आओगी न !"

"देखते हैं ,अभी तो कुछ दिन नहींं जा सकते है। घर में इतना काम है कि निकलना मुश्किल हो रहा है। "

"ओके बाय !"

"बाय-बाय"

बाहर निकल कर प्रेम ने गाड़ी पकड़ी और घर के लिए निकल पड़ा। पूरे शरीर में अजीब सी सिहरन दौड़ रही थी। तीर तो छोड़ दिया था लेकिन निशाने को देखने की हिम्मत नहींं हो रही थी। 

" पता नहींं कार्ड देखकर अंजू का क्या रिएक्शन होगा ?" सोच-सोचकर सर में दर्द होने लगा। घर पहुंचकर निढाल हो सो गया। 

कॉलेज में छुट्टियां चल रही थी सो कई दिनों तक दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी और न ही कोई बातचीत हुई। 

प्रेम की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। अब और इंतजार करना मुश्किल हो रहा था। मन मे डर बैठ गया कि "पता नहींं कार्ड देखकर अंजू नाराज़ तो नहींं हो गयी ?"

"कहीं प्यार के चक्कर में अच्छी-खासी दोस्ती न खत्म हो जाय।" मन मे तरह -तरह के उलूल-जुलूल सवाल उठ रहे थे। 

अब प्रेम ने ठान लिया कि " चाहे जो हो घर जाकर पता कर ही लेंगे"

अगले दिन अंजू के घर जाने की हिम्मत जुटाकर निकल पड़ा। 

जैसे-जैसे अंजलि का घर नजदीक आ रहा था धड़कन बढ़ती जा रही थी। आग की भट्टी में चल रही धौंकनी के समान दिल धड़क रहा था।

" पता नहींं क्या रियेक्सन होगा अंजलि का ?"

कॉलेज बन्द होने की वजह से मुलाकात भी नहींं हुई थी और न ही कोई बातचीत। घबराहट बढ़ रही थी कि पता नहींं क्या होगा ? डर भी लग रहा था कि कहीं अंजलि नाराज़ न हो जाये और अपनी दोस्ती भी खत्म हो जाय।

उधेड़बुन में फंसा कब अंजलि के दरवाजे तक पहुंच गया इसका पता भी नहीं चला। दरवाजा नॉक करने की हिम्मत नहींं हो रही थी। 

ठक....ठक ..ठक.. ठक

आज दरवाजा को भी खुलने में देरी हो रही थी जिससे बैचेनी बढ़ती जा रही थी। इज़हार और इक़रार के बीच इंतजार की पराकाष्ठा हावी होने लगी। 

खडाक से किवाड़ खुली और सामने अंजलि की माँ...

"अरे प्रेम ! आओ बैठो, कैसे हो ?"

"ठीक हूँ आँटी वो मैं इधर आया तो सोचा अंजली...."

"हाँ.. हाँ बैठो न । अंजू अभी कुछ काम कर रही है अभी भेजती हूँ। "  

कहकर माता जी अंदर चली गयी। 

मेरी तो धड़कन और तेज होने लगी । मन तो कर रहा था बाहर भाग जाए। क्या जवाब होगा यह सोचकर दिल घबराने लगा। 

थोड़ी देर में अंजू चाय लेकर आयी और चुपचाप दूसरे चेयर पर बैठ गयी। उसका चेहरा देखकर ही समझ गया कि बादल बड़े जोरों से बरसने वाला है।

"कैसी हो ?"

? ? ? ? ? ?

कोई जवाब नहींं

मैंने चाय की कप उठायी और धीरे धीरे सुड़कने लगा । नजर तिरछी कर देखा कि अंजलि बस मुझे देखे जा रही थी बिल्कुल चुपचाप। 

"क्या बात है ? काहे कुछ बोल नहींं रही हो। तबियत ठीक हैं न !"

मैं स्थिति को सामान्य करने की चेस्टा में लग गया। वो चुपचाप उठी और अंदर चली गयी। यह पहला मौका था जब उसका व्यवहार अजीब लगा। मैं अपने ही सवालों में उलझा था कि वो बाहर आयी और मेरा ही दिया हुआ कार्ड हमारे हाथ में थमा दिया। 

"ये क्या है ? "

"यही तो हम भी पूछ रहे हैं कि ये क्या है ?" अंजू ने तो जवाबी हमला कर दिया। 

"तुमने पढ़ लिया !" 

"हाँ पढ़ लिया। लेकिन हमको ये सब पसन्द नहींं है।" कहते हुए वो अंदर जाने लगी। 

"अरे...अरे सुनो तो ! बैठो !" 

"हमको और कुछ नहींं कहना है जो कहना था कह दिए हमको यह सब ठीक नहींं लगता है।" 

"अरे तो इसमें गलत तो कुछ लिखा नहींं वेलेंटाइन कार्ड है !"

"हमको कुछ नहीं सुनना है ये लो अपना कार्ड "

मैं अवाक ! ! निःशब्द हो गया कुछ कहने सुनने को रह भी क्या गया था। वो कुछ सुनने समझने को तैयार ही नहींं थी। 

चाय आधे में छोड़कर कप को रख दिया । आंखे भर आयी ..गले के अंदर मानो कोई बड़ी चीज अटक गई हो। बस इतना ही कह पाया 

" आखिर क्यूँ ? ? ? ?"

? ? ? ? ? ? ? ? ?

वो चुपचाप रही कोई जवाब नहींं। 

" कोई बात नहींं। हम अच्छे दोस्त थे और मेरी जब जरूरत हो बेझिझक कह देना" कहकर मैं सीधे बाहर निकल गया। 

एक पल में लगा सबकुछ खत्म हो गया जो ख्वाब देखे थे तिनकों की मानिंद बिखर गए। बेपनाह मुहब्बत के सपने शीशे की तरह चकनाचूर हो गए। मन कर रहा था दहाड़ मार कर रोएं लेकिन मन को बड़ी मुश्किल से काबू में किया। लड़कों को दर्द दिखाने का हक नहींं उसे तो अंदर ही अंदर रो लेना होता है। औरतें तो आँसू बहाकर अपने गम को धो लेती है लेकिन मर्दो के लिए यह भी आसान नहींं। 

"इतने दिनों का जो इंतजार था इजहार के जवाब का उसका यही सिला मिला ?" उसके घर से बाहर निकल कर उस कार्ड को वहीं फाड़कर फेंक दिया। लगा जैसे दिल के हजार टुकड़े कर खुद बिखेर दिया। जिसे सजाने सँवारने में पूरा एक हप्ता लगाया था। अपने दिल को ही तो परोस कर रलह दिया था उस कार्ड में लेकिन अब सबकुछ तो खत्म हो गया था। अब बचा ही क्या था इतने वर्षों का साथ एक पल में मानो छूट गया। 

कदम इस कदर बोझिल हो गए थे कि एक एक डग पहाड़ से लग रहे थे। खुद के अंदर ही गड़ा जा रहा था।

"ये क्या हो गया ? हे भगवान ! आखिर मेरी खता क्या है ? तो क्या उसका हँसना-बोलना ,मेरी हरवक्त फिक्र करना, घण्टो बैठकर बातें करना सब कुछ दिखावा था ?" मैं अपनी ही धुन में चला जा रहा कितनी दूर पैदल ही निकल गया फिर पीछे से एक गाड़ी आ रही थी जिसमें बैठ गया। उसमें गाना बज रहा था- 

परदेसी -परदेसी जाना नहींं मुझे छोड़ के...हाँ मुझे छोड़ के

मानो मेरे दुखते रग को किसी ने छेड़ दिया हो। आँखे बंद कर चुपचाप उन पलों में खो गया ।

न जाने क्या-क्या ख्वाब बन रखा था। अपने प्यार के किस्से होंगे,शादी होगी। हनीमून पे जाएंगे। अपना घर अपना खूबसूरत संसार होगा। प्यार भरे संसार का सपना यकायक रेत के महल सा भरभरा कर गिर गया और मैं मूकदर्शक बना रह गया।

लबों पे खामोशी थी लेकिन दिल के भीतर तूफान मचा हुआ था।' 

"अब क्या ? ?...अब तो सबकुछ खत्म हो गया । कितना चाहा था तुझे । अपना हर दिन हर पल तुझपर कुर्बान किया। तुम्हारे हर गम को मैंने अपनाया । तुम्हारे हरपल को मैंने खुशियों से भर दिया था ! तुम जब नहींं आती थी तो मैं कितना बैचेन रहता था। याद है तुम्हें ? कॉलेज के बाहर खड़ा तेरा किस कदर इंतजार किया करता था. ?"

अंजलि के घर से निकलने के बाद प्रेम बिल्कुल टूट सा गया था। अंदर ही अंदर तूफान मचा हुआ था, समझ में नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करे ?

"कितना चाहा था तुम्हें, अपने दिल मे जगह दी और तुमने...तुमने तो मेरे दिल को तोड़ कर रख दिया। तुम्हारे हर दिन हर पल को खुशनुमा और यादगार बनाने की पुरजोर कोशिश करता। " प्रेम खुद से खुद बड़बड़ाने लगा।

"तुम जब नहींं आती थी तो कितना बैचेन हो जाता था ? याद है तुम्हें ! कॉलेज के बाहर खड़ा किस कदर इंतजार करता था तुम्हारा ?"

फाइनल ईयर का एग्जाम था,सेंटर पर सभी अपनी सीट पर बैठ चुके थे। वार्निंग बेल भी बज चुका था लेकिन मैं बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।

मनोज बारबार आवाज लगा रहा था- प्रेम ! ! जल्दी आओ क्वेश्चन पेपर बंटने वाला है।"

"आ रहा हूँ,रुको न ! प्रेम की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। आखिर क्या हो गया जो अबतक नहींं आयी ! कितनी लापरवाह है !"

प्रेम को मन ही मन बहुत गुस्सा आ रहा था। तभी अंजलि सीढ़ी चढ़ती दिखाई पड़ी।

"ये क्या मज़ाक है ? कहाँ थी तुम ? एग्जाम शुरू होने वाला है। प्रेम ने मानो सवालों की गोली स्टेनगन से दाग दी।

"हो गयी लेट ! तुम्हे क्या ? तुम यहाँ खड़े क्या कर रहे हो ? परीक्षा नहींं देना है क्या ?" अंजलि ने भी झल्लाते हुए कहा।

"लो मैं तो तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था और खुद लेट होकर उल्टे हमपर बरस रही हो !"

"अच्छा ! लड़ाई छोड़ो, चलो जल्दी पहले ही काफी लेट चुकी है।" 

दोनों लड़ते झगड़ते क्लास रूम में चले गए और फिर परीक्षा दी। 

आज आखिरी पेपर था, प्रेम बहुत उदास था। एग्जाम के बाद वह अंजलि से ढेरो बातें करना चाहता था।लेकिन परीक्षा के तुरंत बाद उसे लेने भैया आ गए और फिर गैर बातचीत के ही वह अपने घर चली गई। 

कुछ रोज बाद प्रेक्टिकल की परीक्षा शुरू हुई जिसका सेंटर शहर से दूर जिला मुख्यालय में स्थित बड़े कॉलेज में पड़ा था। आखिरी पेपर के बाद दोनों की सीज प्रेक्टिकल में ही मुलाकात हुई। अंजलि कॉलेज बहुत कम आती थी सो अधिकांश प्रेक्टिकल प्रेम ही कर दिया करता था। परीक्षा से पहले उसने सबकुछ आ अंजलि को समझा दिया और प्रेक्टिकल दोनों ने एक साथ दिया। 

प्रेक्टिकल के अंतिम दिन कुछ पल मिला साथ बैठने को। इधर-उधर की बातें होती रही। तब भविष्य को लेकर बातें होती रही। 

"सुनो ! तुम पढ़ने में तो बहुत तेज हो ।तुम आइएएस की तैयारी करो" अंजलि ने प्रेम को उत्साहित करते हुए कहा। 

"हम्म !" प्रेम ने अनमने ढंग से जवाब दिया। उसके दिल मे तो और ही बातें चल रही थी। लेकिन कहने की हिम्मत नहींं कर पा रहा था। 

"तुम कुछ बोल क्यों नहींं रहे हो ?कोई प्रॉब्लम है क्या ? अंजलि ने शायद मन की बात पढ़ ली थी।

"नहींं तो !"

प्रेम अचकचा सा गया। 

"कुछ नहींं ! आज हमलोगों का कॉलेज में आखिरी दिन है न ! इसलिए अच्छा नहींं लग रहा है।"

"अरे ! तो इसमें उदास होने की क्या बात है ? "

"हम फिर मिल नहीं पाएंगे न !तुम कहाँ और हम खान ?"

"घर का पता तो है न , जब मन करे आ जाना। कॉलेज खत्म हुआ है हमारी दोस्ती तो नहींं न ! "

अंजलि की बात सुनकर प्रेम का मन उछल सा पड़ा था।

दोनों वापस अपने अपने घर चले गए। घर लौटते वक्त प्रेम के कानों में अंजलि की बात गूंज रही थी

" तुम्हें तो आईएएस बनना है। लौटते वक्त रास्ते में किताब की दूकान से यूपीएससी की तैयारियों से जुड़ी सारी पुस्तकें खरीद ली। 

अब वह अंजलि के सपने को पूरा करने की मुहिम में जुट गया। पढ़ाई के साथ-साथ प्रेम और अंजलि की दोस्ती बढ़ती गयी। उसके घर कई बार गया। घण्टों बैठकर बातचीत करता। पूरे परिवार में घुलमिल गया था । वह अब और इंतजार नहींं करना चाहता था। वेलेंटाइन का दिन था तो सोचा चलो "इससे बेहतर और क्या अवसर मिल सकता है अपने दिल की बात कहने को ?"

लेकिन......

लेकिन..ये क्या ?

क्या सोचा था और क्या हो गया ?

आख़िर.. आख़िर तुमने ऐसा क्यूँ किया ? 

तो क्या वो सारी बातें.. वो मुलाकातें सब झूठी थी ? सब क्या दिखावा था ? साथ हँसना, बैठना संग-संग हर घड़ी हर पल साथ चलना क्या सबकुछ तुम्हारा फरेब थ ?

घर लौटकर प्रेम आज बहुत रोया था। उसकी उम्मीद टूट गयी,उसका प्यार लूट गया था। जीने की ख्वाहिश मिट गई थी। सारे ख़्वाब.. सारे अरमान रेत के घरौंदे की तरह भरभरा कर गिर पड़े थे।

"हेलो ! हेलो ! अरे, कहाँ खो गए तुम ? 

फोन पर अंजलि की आवाज़ सुनकर प्रेम की तन्द्रा भंग हुई। पुरानी यादों से उसका गला भर आया था,आँखे नम हो गयी थी। कुछ बोलने की स्थिति में नहींं था। फिर भी कोशिश की-

"हाँ ! बोलो, कैसी हो ?,क्या कर रही हो ? और....

"ठीक हूँ, यहीं हूँ जहाँ छोड़कर गए थे। जॉब कर रही हूँ। कभी आओ तो मिलना। ?

"क्या ? तुम अपने घर पे ही हो ? शादी...बच्चे. ?

प्रेम ने उत्सुकता पूर्वक पूछ लिया हालांकि उसे तो अजय ने बहुत पहले ही बताया था कि ग्रेड्यूएशन के तुरन्त बाद ही उसकी शादी हो गयी थी और अपने ससुराल में रहती है। 

"मुझे तो पता ही नहींं था कि तुम वहीं रह रही हो !"

"हाँ, शादी तो बहुत पहले हो गयी और मेरे बच्चे भी काफी बड़े हो गए। जॉब इसी शहर में लगी तो यहीं रहने लगी । अब जॉब घर और फैमिली सब संभालती हूँ."

बढ़िया हैं." प्रेम थोड़ा शांत हो गया।

"और तुम सुनाओ। तुम्हारी शादी वादी हुई या नहींं और अभी कर क्या रहे हो ?"

"हाँ मेरी भी शादी हो गयी है और मेरे भी छोटे-छोटे बच्चे हैं."

"चलो ! कभी फुरसत निकाल कर आओ तो बैठकर बातें करेंगे।" कहकर अंजलि ने फोन काट दिया। 


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