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Kumar Vikrant

Drama

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Kumar Vikrant

Drama

पीला घुड़सवार

पीला घुड़सवार

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"ना बहु ना, ये समय घर से बाहर निकलने का नहीं है। रात का पहला पहर बीत चुका है, घटा छाई है। मोहन नादान नहीं है वो रात ढलती देख, जंगल के पार कस्बे में ठहर गया होगा, सुबह होते ही आ जायेगा।"

मीरा ने सास की एक न सुनी। दो बरस की छवि को उसकी गोद में डाल कर चल पड़ी घर से बाहर। ग्राम की सीमा पार होते-होते मूसलाधार बारिस पड़ने लगी। पर वो कहाँ रुकने वाली थी, उसे पूर्ण विश्वास था की उसका मोहन कही जंगल में है, कदाचित किसी भारी विपदा में।

जंगल की कंटीली धरती पर वो नंगे पांव दौड़े चले जा रही थी और पुकार रही थी मोहन को। उसकी पतली काया काँटों से छलनी हुई जाती थी, तन के वस्त्र तार- तार हुए जाते थे पर उसे कोई परवाह न थी, उसके प्राण तो मोहन में बसते है। वो अपने प्राणो को ही तो ढूंढने जा रही थी।

जंगल के मध्य वो पीला घुड़सवार भी तो बसता है, जो सदियों से प्राण हर रहा है रात में उसके जंगल से गुजरने वालो के। उसी नृसंस हत्यारे से तो बचाना है उसे अपने मोहन को।

घोड़े के दौड़ने की ध्वनि हवाओं में गूंज उठी और तूफ़ान की भांति पीला घुड़सवार उसके पास से निकला, पीले प्रकाश पुंज में उसने उस विकराल घुड़सवार को देखा। पर उसके घोड़े की पीठ पर एक अचेत मानव शरीर भी तो था। कही ये उसका मोहन तो नहीं सोचते हुए वो चिल्ला पड़ी "रुक जा।"

पर उस घुड़सवार ने अपनी गति कम न की और उस अचेत शरीर को लिए घने जंगल में प्रवेश कर गया।

मीरा में ना जाने कहाँ से ताक़त आ गयी, उसने तेजी से दौड़कर उसके घोड़े की काठी थाम ली और चिल्लाई "मेरे प्राण ले-ले राक्षसमेरे मोहन को छोड़ दे।"

उसकी दारुण पुकार का उस पर कोई फर्क न पड़ा और वो जोर जोर से हंसा।

घोड़े की काठी मीरा के हाथ से छूट गई और वो गीली धरती पर जा गिरी। 

तभी मोहन की आवाज उसके कानो में गूँज उठी

"उठो मीरा उठो।"

वो हड़बड़ा कर उठ बैठी। उसके मुलायम बिस्तर के एक कोने पर बैठा मोहन जोर-जोर से हंस रहा था। छवि उसकी गोद में थी।

"क्या हुआ मीरा कोई सपना देखा क्या?" मोहन ने मुस्कराते हुए पुछा।

"तुम जंगल में खो गए थे, तुम्हे वो राक्षस उठाये ले जा रहा था।" मीरा ने आँसू भरी आँखों से मोहन को देखते हुए कहा।

"अरे बाबा यहाँ तो मीलो दूर तक सिर्फ कंक्रीट के जंगल हैये जंगल, राक्षस सब तुम्हारी किताबो में बसते है, जिनमे तुम ज्यादातर बसी रहती हो।" मोहन ने मुस्करा कर कहा।

"मजाक उड़ा रहे हो मेरा?" मीरा चिढ़ते हुए बोली।

"ना बाबा नाइतनी हिम्मत नहीं है मेरी कि राक्षसो से लड़ने वाली की मजाक उड़ा सकू।" मोहन हँसते हुए बोला।

"अच्छा फिर मजाक उड़ाया, इसकी सजा मिलेगी तुम्हे। लाओ छवि को मुझे दो और किचन में जाकर चाय बनाओ।" मीरा ने छवि को लेते हुआ कहा।

"ये भी सही है, राक्षसो से लड़ने वाली चाय क्यों बनाये, चलो हम ही बनाते है।" कहते हुए मोहन किचन की तरफ बढ़ गया।


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