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Prashant Subhashchandra Salunke

Fantasy Inspirational Others

4.5  

Prashant Subhashchandra Salunke

Fantasy Inspirational Others

पहला दिन, आख़िरी सीमा

पहला दिन, आख़िरी सीमा

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वड़ोदरा की सुबह हमेशा की तरह शोर भरी थी, लेकिन आज आदित्य के लिए हवा में एक अलग ही खिंचाव था। वह शहर के सबसे प्रतिष्ठित ‘ग्लोबल टेक पार्क’ की उस विशाल काँच की इमारत के सामने खड़ा था, जो सूरज की रोशनी में किसी आईने की तरह चमक रही थी। आदित्य ने काँच में अपना धुंधला अक्स देखा। शर्ट की कॉलर थोड़ी कस रही थी, माथे पर घबराहट की वजह से पसीने की बारीक बूंदें और आँखों में अजीब सी व्याकुलता थीं। यह डर था, या शायद खुद को साबित करने की वह बेताब उम्मीद, जिसे उसने महीनों की मेहनत के बाद पाया था।

उसने गहरी सांस ली और खुद से कहा, ‘आदित्य, यह एक नई शुरुआत है। आज से सब कुछ बदल जाएगा।’

अंदर कदम रखते ही एक कृत्रिम ठंडक ने उसके बदन को छू लिया। रिसेप्शन पर बैठी महिला ने बिना अपना सिर उठाए ही पूछा, "पहला दिन है?" उसकी आवाज़ में एक नीरसता थी, जो अक्सर उन लोगों में होती है जो रोज़ हज़ारों चेहरों को आते-जाते देखते हैं। आदित्य ने सिर्फ सिर हिलाया। उसे एक ‘विज़िटर पास’ थमाया गया और सुरक्षा गार्ड ने पाँचवीं मंजिल का इशारा किया।

लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते ही उसका दिल जैसे गले में आ गया था। काँच के उस छोटे से बक्से में उसे अपनी धड़कनें सुनाई दे रही थीं। मन में विचारों का एक बवंडर था, ‘सबको प्रभावित करना हैकोई गलती नहीं होनी चाहिएएक छोटी सी चूक भी भारी पड़ सकती है। अगर पहले दिन संभल गयातो आगे की राह आसान होगी।’

पाँचवीं मंजिल पर पहुँचते ही जो मंज़र उसने देखा, वह किसी पुरानी फिल्म के दृश्य जैसा था। एक विशाल हॉल, जहाँ सैकड़ों लोग बिना एक-दूसरे से बात किए कंप्यूटरों की स्क्रीन में गड़े हुए थे। कहीं कॉफी मशीन की गूँज थी, तो कहीं कीबोर्ड की खटपट। उसे किसी ने नोटिस नहीं किया। फिर अचानक, एक व्यक्ति तेजी से उसकी तरफ बढ़ा। करीब पैंतीस साल का वह शख्स, आँखों में भारी चश्मा और चेहरे पर एक ऐसा गंभीर भाव जो कह रहा था कि उसके पास समय की कमी है।

"आदित्य?" "जी, मैं आदित्य," उसने थोड़ा संभलते हुए कहा। "मैं रोहन हूँ, तुम्हारा टीम लीडर। चलो मेरे साथ।"

रोहन की चाल तेज़ थी और आदित्य के लिए उसके साथ कदमताल करना मुश्किल हो रहा था। उसे एक मेज दिखाई गई, जो शायद एक खाली पड़े डेस्क को साफ करके तैयार की गई थी। रोहन ने लैपटॉप की ओर इशारा किया, "आदित्य, आज काम का दबाव ज्यादा है। शाम तक एक बड़ी क्लाइंट मीटिंग है। मुझे एक प्रेजेंटेशन तैयार करनी है। तुम बस इसे देखो, समझो और हो सके तो हाथ बटाओ।"

यही वह परीक्षा थी। आदित्य का मन दो हिस्सों में बँटा हुआ था। महत्वाकांक्षा कह रही थी,  ‘पकड़ लो इस मौके कोदिखा दो कि तुम भी काबिल हो।’  लेकिन एक डर था जो बार-बार टोक रहा था. ‘अगर गलती हुई तोपहले दिन ही बुरा प्रभाव पड़ जाएगा। उसने एक लंबी सांस ली और बोला, "जी, मैं पूरी मदद करने की कोशिश करूँगा।’

कंप्यूटर खोलते ही उसे अहसास हुआ कि यह कॉलेज की पढ़ाई जैसा नहीं था। फाइलों के ढेर, पेचीदा एक्सेल शीट्स और ऊपर से समय का भारी दबाव। ग्यारह बज चुके थे। पास की मेज पर बैठी नेहा ने अचानक उसे देखा और मुस्कुराई, "पहला दिन है ना?"

आदित्य ने राहत की एक सांस ली, "हाँ, क्या यहाँ हमेशा ऐसा ही काम का माहौल रहता है?" नेहा ने कंधा उचकाते हुए कहा, "यहाँ काम ही सब कुछ है। घबराओ मत, सब सीख जाते हैं।"

आदित्य ने हिम्मत जुटाई और नेहा की तरफ मुड़कर पूछा, "क्या आप... क्या आप इस टेबल को समझने में मेरी मदद कर सकती हैं?"

नेहा कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसने चारों तरफ देखा, जैसे वह यह सुनिश्चित कर रही हो कि कोई सुन तो नहीं रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "मदद कर दूँगी, लेकिन एक सलाह दूँ? यहाँ लोग बहुत जल्दी राय बना लेते हैं। अगर तुम मदद माँगोगे, तो वे तुम्हें 'कमजोर' समझेंगे। यहाँ खुद को साबित करने का मतलब है कि तुम सब कुछ जानते हो।"

आदित्य फिर एक बार मानसिक द्वंद्व में फँस गया। ‘मदद माँगना कमजोरी है या समझदारीक्या अपनी सीमाओं को स्वीकार करना गलत है?’ उसने फैसला किया कि सीखने के लिए जोखिम लेना ज़रूरी है। "फिर भी, मैं सीखना चाहता हूँ। कृपया मदद करें।"

अगले दो घंटों तक नेहा ने उसे शॉर्टकट्स और डेटा को व्यवस्थित करने के तरीके समझाए। काम अब बोझ नहीं, बल्कि एक चुनौती लगने लगा था। तभी रोहन वापस लौटा।

"कितना हुआ काम?" उसने आदित्य की स्क्रीन पर नज़र डाली।

आदित्य ने आत्मविश्वास के साथ काम दिखाया। रोहन ने भौंहें चढ़ाईं और कहा, "यह ठीक नहीं है। बहुत ज़्यादा डेटा है। मुझे साफ और संक्षिप्त जानकारी चाहिए और याद रहे, चार बजे तक फाइनल वर्जन मीटिंग रूम में चाहिए। पहला प्रभाव ही अंतिम प्रभाव होता है, आदित्य।"

रोहन के जाने के बाद कमरा और भी ठंडा लग रहा था। दोपहर के साढ़े बारह बज रहे थे। आसपास के लोग लंच पर गए, लेकिन आदित्य अपनी सीट से हिल भी नहीं सका। उसके हाथ काँप रहे थे। क्या मैं वाकई यहाँ फिट हूँक्या मैं यह कर पाऊँगा?

नेहा ने उसे देखते हुए कहा, "घबराओ मत, तुम कर सकते हो।" लेकिन आदित्य के मन में अब एक और सवाल जन्म ले रहा था। ‘क्या हर बात पर हाँ कहना ही सफलता है? क्या अपनी सीमाएं तय करना करियर के लिए घातक होगा?’

तीन बजे तक उसने अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी। आँखें सूज रही थीं, सिर भारी था, लेकिन उसने प्रेजेंटेशन को एक मुकाम पर पहुँचा दिया था। चार बजते ही मीटिंग शुरू हुई। कॉन्फ्रेंस रूम का माहौल भारी था। रोहन ने सबके सामने आदित्य की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यह प्रेजेंटेशन हमारे नए साथी आदित्य ने तैयार की है।"

सबकी आँखें आदित्य की तरफ थीं। उसने बोलना शुरू किया, आवाज़ शुरू में लड़खड़ाई, लेकिन धीरे-धीरे उसने लय पकड़ ली। तभी एक सीनियर मैनेजर ने अचानक बीच में टोका, "ये जो पेज नंबर चार पर आँकड़े हैं, ये कहाँ से लिए गए हैं? मुझे ये कुछ गड़बड़ लग रहे हैं।"

आदित्य के पैर तले ज़मीन खिसक गई। ये वही आँकड़े थे जिनमें नेहा ने मदद की थी, लेकिन आदित्य ने खुद क्रॉस-चेक नहीं किया था। कमरे में सन्नाटा था। यह उसके करियर का पहला बड़ा फैसला था। क्या वह झूठ बोले? क्या वह नेहा का नाम ले? या क्या वह सच स्वीकार करे?

उसने अपनी आँखें बंद कीं और सच चुना। "सर, यह मेरी गलती है। मैंने इन आँकड़ों की पूरी जाँच नहीं की थी। मैं इसे अभी ठीक कर सकता हूँ, लेकिन अभी ये पूरी तरह सही नहीं हैं।"

रोहन का चेहरा गुस्से से सख्त हो गया था, लेकिन वह मैनेजर मुस्कुराया, "अच्छा लगा कि आपने अपनी गलती को छिपाया नहीं। इसे आज ही ठीक करके मेल कर दीजिए।"

मीटिंग के बाद बाहर आते ही रोहन ने आदित्य को कोने में बुलाया और दहाड़ा, "पहले ही दिन ऐसी फजीहत? तुम्हें पता है इसका असर मेरे और टीम पर क्या पड़ेगा?"

आदित्य ने सिर झुकाया, लेकिन इस बार वह डरा हुआ नहीं था। उसने रोहन की आँखों में देखा और कहा, "सर, मैं गलती सुधारूँगा। लेकिन मैं रात देर तक यहाँ नहीं रुक पाऊँगा। मैं आज अपना काम पूरा कर दूँगा, लेकिन मैं शुरू से ही अपनी सीमा तय करना चाहता हूँ। अगर मैं आज ही खुद को पूरी तरह निचोड़ दूँगा, तो अगले दिन मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं बचेगा।"

रोहन दंग रह गया। उसने शायद उम्मीद नहीं की थी कि कोई नया कर्मचारी इतने आत्मविश्वास से अपनी सीमाएं तय करेगा। कुछ पल सन्नाटा रहा, फिर रोहन ने बस इतना कहा, "ठीक है, काम समय पर पूरा हो जाना चाहिए।"

रात के आठ बज रहे थे। आदित्य ने अपनी प्रेजेंटेशन भेजी, कंप्यूटर बंद किया और बाहर निकल आया। नेहा उसके पास आई, "आज तुमने जो किया, वो मैंने कभी नहीं किया। तुमने सच बोलकर अपनी जगह बना ली है।"

अगले दिन आदित्य के डेस्क पर रोहन का एक छोटा सा नोट था । उसमें लिखा था: दबाव में तुम्हारी ईमानदारी और अपनी सीमाओं को पहचानने की क्षमता सराहनीय है। लंबे समय तक वही टिकता है जो खुद को संतुलित रखता है।

आदित्य ने खिड़की के बाहर देखा। आज उसका दूसरा दिन था। उसे समझ आ गया था कि सफलता सिर्फ दूसरों को प्रभावित करने में नहीं, बल्कि खुद के साथ ईमानदार रहने में है। वह अब बस 'टिके रहने' के लिए नहीं, बल्कि अपने तरीके से आगे बढ़ने के लिए तैयार था।


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