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Prashant Subhashchandra Salunke

Children Stories Fantasy Inspirational

4.5  

Prashant Subhashchandra Salunke

Children Stories Fantasy Inspirational

एक नया आकाश

एक नया आकाश

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6

पेरेंटिंग के सफर में हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हमारे बच्चे हमारी बात नहीं सुन रहे हैं, लेकिन हकीकत यह होती है कि हम उन्हें सुन ही नहीं रहे होते। हम अपनी उम्मीदों, अपने तनाव और अपने पुराने संस्कारों के शोर में उनकी फुसफुसाहटों को अनसुना कर देते हैं। मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वह था, जब मुझे यह समझ में आया कि मेरे नौ साल के बेटे, आरव का "विस्फोट" दरअसल उसका "संवाद" था।

आरव एक ऊर्जावान और संवेदनशील बच्चा है। वह छोटी-छोटी चीजों में अर्थ खोजता है। पिछले कुछ महीनों से, हमारे घर में अक्सर तनाव का माहौल रहने लगा था। होमवर्क, कमरे की सफाई, स्क्रीन टाइम; हर बात पर आरव का रिएक्शन बहुत तीव्र होता था। उसका चेहरा लाल हो जाना, अपनी मुट्ठियाँ भिंच लेना और फिर चिल्लाना, जैसे कोई ज्वालामुखी फटने वाला हो। मुझे लगता था कि वह बिगड़ रहा है, लेकिन मैं गलत था।

वह शनिवार की दोपहर थी, बाहर हल्की बारिश हो रही थी। आरव अपनी पुरानी डायरी में कुछ लिख रहा था। वह उसे किसी को नहीं दिखाता था, यहाँ तक कि मुझे भी नहीं। तभी, घर में मेहमान आए... दूर के रिश्तेदार, जिनके साथ हंसी-मजाक का दौर चल रहा था। उनमें से एक ने अनजाने में आरव की मेज पर रखा पानी का गिलास गिरा दिया। पानी का वह बहाव सीधा आरव की डायरी के पन्नों पर जा गिरा।

अगले ही पल, कमरे में सन्नाटा छा गया। आरव चिल्लाया, "आप लोग मेरी चीजें क्यों छूते हैं? मुझे नफरत है इस घर से!" वह भागा और अपने कमरे का दरवाजा जोर से पटक लिया।

अंदर से उसके रोने और सामान फेंकने की आवाज़ें आ रही थीं। मेरा पहला इंस्टिंक्ट वही पुराना था, ‘गुस्सा।‘ मुझे लगा कि मेहमानों के सामने मेरी बेइज्जती हुई है। मैं झपटकर अंदर गया और चिल्लाया, "आरव! यह कैसा व्यवहार है? मेहमानों के सामने ऐसे चिल्लाते हो? क्या तुम्हें तमीज नहीं है? यह सिर्फ एक डायरी ही तो थी!"

लेकिन उस दिन अविनाश परिहार की किताब 'आहाना एंड द टू ब्रेन्स' के कुछ पन्ने मेरी आंखों के सामने तैर गए। किताब में लिखा था: 'जब आपका बच्चा विस्फोट करता है, तो वह बुरा नहीं होता, वह केवल बहुत ज़्यादा महसूस कर रहा होता है। उसका लॉजिकल ब्रेन अभी सो रहा है और इमोशनल ब्रेन पूरी तरह सक्रिय है। उस समय उसे उपदेश की नहीं, आपके साथ की जरूरत है।'

मैं दरवाजे पर रुक गया। मेरा हाथ मुट्ठी में बँधा था, लेकिन मैंने उसे खोल दिया। मैंने गहरी सांस ली। मेरा अहंकार कह रहा था कि मुझे उसे अनुशासन सिखाना चाहिए, लेकिन मेरी अंतरात्मा कह रही थी कि उसे इस समय सुरक्षा की जरूरत है। मैंने दरवाजा धीरे से खटखटाया। अंदर से कोई जवाब नहीं आया। मैंने धीरे से दरवाजा खोला। आरव कोने में बैठा अपनी गीली डायरी को सुखाने की कोशिश कर रहा था। उसके आंसू उसकी कॉपी पर गिर रहे थे।

मैं उसके पास गया, लेकिन पास नहीं बैठा। मैं फर्श पर थोड़ी दूरी पर बैठ गया।

"आरव," मैंने बहुत ही धीमी और स्थिर आवाज में कहा, "मैं देख रहा हूँ कि तुम बहुत दुखी हो। वह डायरी तुम्हारे लिए बहुत खास थी, है ना?"

आरव ने मेरी तरफ नहीं देखा, लेकिन उसके कंधे कांप रहे थे। "ये सिर्फ डायरी नहीं थी, पापा! इसमें मैंने पिछले एक साल की अपनी सारी परेशानियाँ लिखी थीं। मेरा हर वो डर जो मैं किसी से कह नहीं पाता, वो सब धुल गया। मुझे लगता था कि अगर मैं अपनी भावनाएँ कहीं लिख दूँ, तो मेरा मन हल्का हो जाएगा। अब... अब सब कुछ मिट गया है।"

उसकी बात सुनकर मेरे सीने में एक टीस उठी। वह सिर्फ कागज नहीं खो रहा था, वह अपना वह 'सुरक्षित कोना' खो रहा था जहाँ वह खुद को अभिव्यक्त करता था।

उस क्षण, मैंने उसे उसकी आँखों से दुनिया देखी। मुझे याद आया कि कैसे बचपन में मेरा भी एक रहस्यमयी डिब्बा था, जिसमें मैंने अपने खिलौने छुपाए थे, और जिसे मेरी माँ ने सफाई के नाम पर फेंक दिया था। मुझे उस दिन जैसा लगा था, वही आज आरव महसूस कर रहा था। मैं अब तक उसे सिर्फ एक 'जिद्दी बच्चा' मान रहा था, जबकि वह एक 'असुरक्षित बच्चा' था जिसे समझ की दरकार थी।

मैंने उसे छुआ नहीं, बस उसके पास बैठा रहा। "मुझे बहुत खेद है, आरव। मैं समझ सकता हूँ कि तुम्हारी अपनी जगह, तुम्हारी अपनी चीज़ें तुम्हारे लिए कितनी मायने रखती हैं। काश मैं उस पानी को रोक पाता। क्या हम इसे सुखाने में मदद कर सकते हैं?"

आरव थोड़ा झुका और मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया। उसकी सिसकियाँ कम होने लगीं।

"पापा, मुझे समझ नहीं आता कि जब मैं गुस्सा होता हूँ, तो मेरा हाथ अपने आप चलने क्यों लगता है? मुझे लगता है कि जैसे कोई और मेरे अंदर से चिल्ला रहा हो।"

"इसे हम 'इमोशनल ब्रेन' कहते हैं, बेटा," मैंने उसे समझाना शुरू किया। "जब भी हमें बहुत डर या दुख होता है, तो हमारा दिमाग 'फाइट या फ्लाइट' मोड में चला जाता है। उसे लगता है कि कोई खतरा है, तो वह बचाव में चिल्लाने या सामान फेंकने लगता है। लेकिन, हम उस 'विस्फोट' से पहले रुक सकते हैं।"

"कैसे?" उसने पूछा।

"अगली बार, जब तुम्हें लगे कि तुम्हारी सीने में आग लग रही है, तो बस एक काम करना, अपनी मुट्ठियों को जोर से भींचना और फिर धीरे से छोड़ देना। तब तक कुछ मत कहना। बस तीन बार गहरी सांस लेना। वह तीन सांसें तुम्हें समय देंगी कि तुम सोच सको कि तुम क्या कहना चाहते हो। उसे 'पॉज' करना कहते हैं।"

आरव मेरी बात ध्यान से सुन रहा था। उस पल, मुझे अहसास हुआ कि हम माता-पिता के रूप में हमेशा 'सिखाने' की जल्दी में रहते हैं, हम 'सुनने' की कला भूल गए हैं। उस दिन, उस गीली डायरी के पास बैठकर, हम एक-दूसरे के करीब आए। मैंने उसे एक 'सुधारने वाले' की तरह नहीं, बल्कि एक 'दोस्त' की तरह सुना।

अगले कुछ हफ्तों में, चीजें धीरे-धीरे बदलने लगीं। आरव अभी भी बच्चा था, और कभी-कभी वह आपा खो देता था, लेकिन अब उसने तीन गहरी सांस लेने का अभ्यास शुरू कर दिया था। कभी-कभी वह कहता, "पापा, मुझे अभी बहुत गुस्सा आ रहा है, मुझे थोड़ी देर अकेला छोड़ दीजिए," और मैं उसे वह जगह देता। वह समझ गया था कि उसे कोई डांट नहीं रहा, बल्कि वह खुद को बेहतर बनाना सीख रहा है।

एक दिन, स्कूल से आते ही उसने अपना बैग फेंक दिया और बहुत चिड़चिड़ा दिख रहा था। उसने मुझे देखा और कुछ बोलने ही वाला था कि वह रुका। उसने अपनी आँखें बंद कीं, तीन गहरी सांसें लीं और बोला, "पापा, आज स्कूल में मेरी टीचर ने मुझे डांटा, जबकि मेरी गलती नहीं थी। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है, पर मैं चिल्लाना नहीं चाहता।"

मेरा दिल गर्व से भर गया। वह क्षण... जब उसने अपनी भावनाओं को खुद पहचाना और सही रास्ता चुना। मेरे लिए मेरी पेरेंटिंग की सबसे बड़ी जीत थी। वह विस्फोट नहीं हुआ, वह एक शांतिपूर्ण बातचीत बन गया।

हम उस मेज पर बैठे जहाँ महीनों पहले वह डायरी गीली हुई थी। मैंने उसके साथ बैठकर बात की। हमने एक नया नियम बनाया: 'द पॉज बटन'। जब भी हममें से किसी को भी गुस्सा आए, हम एक-दूसरे को 'पॉज' का इशारा करेंगे। यह इशारा हमें याद दिलाएगा कि भावनाओं के पीछे एक इंसान है जिसे प्यार और समझ की जरूरत है।

मैंने सीखा है कि बच्चा जब चिल्लाता है, तो वह आपसे यह नहीं कह रहा होता कि "मुझे सुधारो।" वह आपसे यह कह रहा होता है, "मुझे देखो, मैं यहाँ हूँ और मैं अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पा रहा हूँ।" अब, आरव की भावनाओं का विस्फोट कम हो गया है। वह अपनी बात कहने के लिए शब्दों का चुनाव करता है। उसकी डायरी में अब नए पन्ने जुड़ गए हैं, जिनमें उसने लिखा है, 'आज मुझे बहुत गुस्सा आया, पर मैंने गहरी सांस ली और सब ठीक हो गया।'

यह यात्रा आसान नहीं थी। यह धैर्य की परीक्षा थी। लेकिन उस एक पल ने, जब मैंने उसे डांटने के बजाय उसे समझने का चुनाव किया। हमें हमेशा के लिए बदल दिया। मुझे समझ आया कि जब हम अपने बच्चे की भावनाओं को वैधता देते हैं, तो हम उनके भीतर एक ऐसा शांत समुद्र पैदा कर देते हैं जो किसी भी तूफान को झेल सकता है।

अक्सर हमें लगता है कि बच्चे को सिखाने का मतलब उसे कठोर अनुशासन देना है, लेकिन सच्चाई यह है कि बच्चे को सिखाने का सबसे शक्तिशाली तरीका है। उसे समझना और उसे खुद के प्रति जागरूक करना। आज जब मैं आरव को देखता हूँ, तो मुझे एक छोटा बच्चा नहीं, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति दिखता है जो अपनी भावनाओं के समुद्र में तैरना सीख रहा है।

पेरेंटिंग केवल नियमों का पालन करना नहीं है, बल्कि एक-दूसरे की दुनिया को समझने की निरंतर कोशिश है। और मैं खुश हूँ कि अब, मैं आरव की दुनिया का सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि उसका सहयोगी हूँ। उस दिन की वो गीली डायरी आज हमारे बीच एक सेतु बन गई है। यह कहानी उसी सेतु की है जो हर उस माता-पिता के लिए है जो अपने बच्चे के साथ मिलकर एक नया आकाश खोजना चाहते हैं। क्योंकि अंत में, हम सब बस यही चाहते हैं की एक-दूसरे को सुनना, समझना और साथ में बढ़ना।


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