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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Crime Thriller

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Crime Thriller

पहेली : भाग 13

पहेली : भाग 13

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पहेली : भाग 13 

गतांक से आगे 


तारा की मौत से विनोद सदमे में आ गया । उसे दया ने संभाला । मां की मौत का सदमा झेलना कोई आसान काम नहीं है और वह भी तब जब कोई अपने बहनोई की मौत का सदमा अभी हाल ही में झेल चुका हो और उस मौत का कारण उसकी बहन बताई जा रही हो । विनोद टूट सा गया था । ऐसे में उसके सिर पर हाथ रखने वाला कोई होना चाहिए था । लेकिन यहां विनोद का कौन था ? ले देकर राधा का पड़ौसी दया ही उसके साथ था । 

यद्यपि दया विनोद का रिश्तेदार नहीं था लेकिन उसका साथ विनोद की सबसे बड़ी लाठी बन गया था । दया विनोद के आंसू पोंछ रहा था , उसे सांत्वना दें रहा था और उसकी हिम्मत बढ़ा रहा था । कहते हैं कि‌ संकट के समय पड़ौसी ही काम आते हैं इसलिए पड़ौसियों से अच्छे संबंध रखने चाहिए । वैसे भी यह कहा गया है कि जो व्यक्ति दुख में साथ देता है वही व्यक्ति सबसे खास होता है । फिर वह चाहे अपना खून हो, मित्र , रिश्तेदार या पड़ौसी । कुछ ही पलों में दया विनोद का अभिन्न मित्र बन गया था । 

दया तारा के शव को ले जाने का इंतजाम करने लगा । इतनी देर में वहां वार्ड ब्वाय आ गया । उसके साथ में ड्यूटी डॉक्टर भी था । डॉक्टर विनोद से बोला 

"सॉरी मिस्टर विनोद ! मैंने आपको पहले ही कह दिया था कि इनका बचना नामुमकिन है इसीलिए हम आपको इनका ऑपरेशन करवाने की सलाह दे रहे थे । यदि इनका ऑपरेशन हो जाता तो ये बच सकती थीं । हम यह चाह रहे थे कि ये अपने घर सही सलामत पहुंच जायें लेकिन ईश्वर को शायद यह मंजूर नहीं था । जो होना था वह हो गया । आप थोड़ी हिम्मत रखिये और अपनी मां को घर ले जाकर इनका अंतिम संस्कार कीजिए" । 

फिर वह वार्ड ब्वाय की तरफ देखकर बोला 

"हम इंसान हैं । हम में अभी तक संवेदनाऐं जिंदा हैं । जब हम इनकी मां को नहीं बचा सके तो हमें इनसे पैसे लेने का कोई अधिकार नहीं है । ऐसा करो, जो पैसा इनसे लिया है उसे वापस लौटा दो" । 


डॉक्टर के ये शब्द सुनकर विनोद गदगद हो गया । "वास्तव में ये लोग कितने अच्छे हैं" विनोद सोचने लगा । वार्ड ब्वाय ने विनोद के हाथ पर 10,000 रुपए रख दिये । उनकी इंसानियत देखकर उसके अंदर जो थोड़ी बहुत कड़वाहट थी, वह भी जाती रही । 

जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के पश्चात तारा का पार्थिव शरीर विनोद को सौंप दिया गया । दया विनोद को ढांढस बंधाने लगा । विनोद दया के सीने में सिर छुपा कर रोने लगा । 


दीनबंधु चैरिटेबल अस्पताल ने विनोद पर दया दिखाते हुए तारा की लाश को अपनी एम्बुलेंस से उनके घर छुड़वाने का जब मंतव्य प्रकट किया तब विनोद को ऐसा लगा जैसे उनकी मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई हो । विनोद और दया दोनों ने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया । एम्बुलेंस में तारा की लाश रख दी गई और एम्बुलेंस राधा के घर की ओर चल पड़ी । 

विनोद पर एक साथ विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था । पहले किशन की मौत , फिर राधा का हत्यारिन रूप देखना , उसका पुलिस हिरासत में होना , राधा का ड्रग्स का धंधा और इसके बाद तारा की मौत ! एक के बाद एक घटनाऐं इतनों तेजी से घट रही थीं कि विनोद संभल ही नहीं पाया था । तारा के अंतिम संस्कार की सारी व्यवस्था दया को करनी पड़ी थीं । 


उधर पुलिस थाने में मातादीन राधा को पाने का प्लान बनाने लगा । उसने राधा को खूब धमका लिया , डरा लिया लेकिन राधा किसी भी दशा में उसे स्वीकार नहीं कर रही थी । राधा की ना सुनकर मातादीन पागल हुआ जा रहा था । उसने साम , दान, दंड, भेद हर तरीके से राधा को पटाने के प्रयास कर लिये लेकिन राधा के दृढ़ निश्चय के सामने वे सब बेकार साबित हुए । खिसिया कर मातादीन थाने में ही शराब पीने बैठ गया । 

तभी थाने में एक फोन आया "एक कार और मोटरसाइकिल का एक्सीडेंट हो गया है , वहां पर भीड़ इकट्ठी हो गई है और मौके पर जोर का लड़ाई झगड़ा हो रहा है" । 

जैसे ही एक सिपाही ने यह समाचार मातादीन को सुनाया , वह झल्लाकर बोला "सारा मूड खराब कर दिया सालों ने । चल , जल्दी से गाड़ी लगा और पांच सात जवानों को बैठाओ गाड़ी में" । बुझे मन से मातादीन रवाना हुआ । 


पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां पर दो लोग लड़ते हुए पाये गये । दोनों एक दूसरे को गंदी गंदी गालियां निकाल रहे थे । शुक्र था कि दोनों में हाथापाई नहीं हुई । वहां पर सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी । मातादीन ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए अपने जवानों को लाठी चार्ज करने का आदेश दे दिया । पुलिस दनादन लाठियां चलाने लगी । पुलिस की लाठियां खाकर लोग गिरते पड़ते भाग गये । अब मौके पर तीन चार लोग ही बचे थे । पुलिस उन्हें पकड़कर थाने ले आई । 

"क्यों लड़ रहे थे तुम लोग" ? मातादीन ने रौब से पूछा 

"हुजूर मैं नहीं लड़ रहा था , ये लड़ रहा था । एक तो इसने अपनी कार से मेरी बाइक कुचल दी , ऊपर से मुझे गाली भी निकालने लगा" । एक काले कलूटे आदमी ने कहा 

"क्या नाम है तेरा" ? मातादीन ने उससे घूरकर पूछा 

"जी, जावेद नाम है मेरा" । काले कलूटे आदमी ने कहा 

"चल अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिखा" ? 

जावेद चुप हो गया । उसे चुप देखकर मातादीन का पारा गर्म हो गया । डांटते हुए वह बोला 

"चुप क्यों हैं बे , तेरे मुंह में जबान नहीं है क्या" ? 

जावेद फिर भी खामोश रहा । तब मातादीन ने एक जोर का थप्पड़ जावेद के गाल पर रसीद कर दिया । 

"साले, वहां तो तू चपड़ चपड़ कर रहा था । अब तेरी बोलती बंद क्यों हो गई" ? 

"हुजूर ! ड्राइविंग लाइसेंस घर पर रखा है" 

"जब मोटरसाइकिल लेकर चलता है तो ड्राइविंग लाइसेंस साथ लेकर क्यों नहीं चलता है" ? 

"आगे से ध्यान रखूंगा" । 

"आगे से का क्या मतलब है ? तेरे पास अभी नहीं है इसलिए तुझे हिरासत में रहना होगा" ! फिर उसने एक सिपाही से कहा 

"बहुत गर्मी है साले में । एक रात हवालात की हवा खिला दे इसको, सब गर्मी उतर जायेगी इसकी" । 

इसके बाद एक सिपाही जावेद को डंडे से मारता हुआ थाने के अंदर ले गया और उसे लॉक अप में बंद कर दिया । फिर वह कार वाले की ओर देखकर बोला 

"देखकर क्यों नहीं चलता है बे ? तू कार वाला हो गया तो क्या सड़क तेरे बाप की हो गई" ? मातादीन का कार्यक्रम चलता रहा । 

"मैं तो किनारे से ही चल रहा था , उसी ने अपनी मोटरसाइकिल मेरी गाड़ी में ठोक दी , इसमें मेरा क्या दोष" ? तल्ख आवाज में बोला कार वाला । 

ऊंची आवाज सुनकर मातादीन का सिर भन्ना गया । एक तो वह पहले से ही उखड़ा हुआ था , उस पर इनके झगड़े ने उसके रंग में भंग डाल दिया था इसलिए वह बुरी तरह से चिढ़ गया था । 

"एक तो गाड़ी देखकर नहीं चलाता है , छोटे लोगों को कार से कुचलने की कोशिश करता है । दूसरे अपने पैसों की अकड़ दिखाता है" । दो डंडे मारते हुए वह फिर बोला "तेरी सारी अकड़ मैं आज ढ़ीली कर दूंगा" । और मातादीन उस कार वाले पर पिल पड़ा । कार वाला पिटते पिटते जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया । तब दो सिपाहियों ने मातादीन को रोकते हुए कहा 

"ये क्या कर रहे हो साहब ! मर जायेगा वो ! बेहोश तो हो ही चुका है । यदि यह मर गया तो फिर पता नहीं क्या होगा ? इतनी पिटाई ही बहुत है इसके लिए । अरे साहब , ये लोग मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं । इन्हें पिटने का कोई तजुर्बा नहीं है इसलिए अब बस कीजिए नहीं तो वर्दी उतरने में देर नहीं लगेगी" । 

दोनों सिपाहियों ने मातादीन को जबरन वहां से हटाया और उसके कमरे में ले जाकर बैठा दिया । फिर उन्होंने मातादीन के सामने दारु की एक बोतल रख दी । मातादीन का सारा नशा उतर गया था इसलिए उसने लपक कर बोतल उठा ली और गट गट करके शराब पीने लगा ‌ 


शेष अगले अंक में 



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