फौज़ी की लाल बत्ती
फौज़ी की लाल बत्ती
"चलो न, कहीं घूमने चलते हैं। शादी को साल भर हो गया है, हम कहीं घूमने ही नहीं गये।" श्रीमती जी के प्रेम-शब्दों ने इसी भाव पर जरा पड़ाव लिया। आख़िर कुछ सोचकर ही उन्होंने दो-एक बार ही सही, लाल बत्ती की गाड़ी में दिखे फौज़ी से शादी की थी। कुछेक लालसायें उनके मन में पलना स्वाभाविक ही था। श्रीमती जी की बात सुनते ही वो फ़ौरन सोच में पड़ गया था।
बात तो एकदम सही थी। श्रीमती जी ने तो ज़रा भी गलत न कहा था। शादी का एक साल गुज़रने को था और वो साथ में घर से बाहर कहीं निकले तक नहीं थे।
उसने बस घंटे भर का वक़्त माँगा और फिर सीधे अटैची, बिस्तर बाँधने की तैयारी शुरू हो गयी।
उसको कोल्हू के बैल की तरह घर की ज़रूरत की चीज़ों के साथ जुटते देख श्रीमती जी ने टोका-
"इन सबको क्यों बाँध रहे? पहले थोड़ा बात तो कर लें, जाना कहाँ है !"
"अरे, घूमने चलना है न ! तो, चलते हैं। इसमें, कुछ सोचने की भला क्या बात है? अभी इधर थोड़ी गर्मी भी पड़ रही है। नैनीताल में मेरी यूनिट के एक दोस्त का बहुत बड़ा घर है। उसने बोला था, कभी उधर जाना हो, तो सीधे उसके घर पहुँच जाऊँ। उसके घर वाले हमेशा उसके दोस्तों की खातिरदारी के लिए तैयार रहते हैं। बस अभी थोड़ी देर में उसको फ़ोन कर दूँगा। कल सुबह निकल लेंगे, फिर चलते हैं उधर ही।" उसने सब समझाते हुए बात खत्म ही की थी कि श्रीमती जी तुनक पड़ीं-
"नहीं जाना है मुझे। एक घर से निकलकर दूसरे घर में जाना, बस यही घूमना होता है क्या?"
"अच्छा... " कहते हुए श्रीमती जी के रूख पर उसके चेहरे की सारी रौनक जैसे एक बार को सूख सी गयी और पूछना उसकी मजबूरी बन पड़ी-
"तो फ़िर क्या करना है ?"
श्रीमती जी के पास मन की कहने की वजह थी-
"घूमने का मतलब होता है कि थोड़ा आराम, थोड़ी मस्ती, रोज-रोज के इस खाना बनाने के झंझट से मुक्ति, सबकी खिट-पिट से थोड़ा दूर, थोड़ी शांति, केवल मियाँ-बीवी संग-संग, एक-दूसरे के साथ।"
उनकी सुनते-सुनते, हर एक बात पर 'हाँ' में सर हिलाते हुए वो अपनी श्रीमती जी की हर ख्वाहिश, हर मर्ज़ी पर अमल करने को सहसा ही तैयार होता गया; आखिर शादी के सात फ़ेरे लेते समय उसने हर सुख-दुःख का खयाल रखने का वचन जो दिया था।
पर एक बात, जो वो बोल नहीं पाया, क्या करता उसे वो अपने मन से तो दूर कर नहीं सकता था-
"छुट्टियों का तो इसीलिए हमको इंतज़ार होता है कि थोड़ा वक़्त घर की चार दीवारों बीच मौजूद सुकून में एक अपनेपन के अहसास के साथ अपनों की चार तरह की चार बातों के बीच ज़िंदगी को थोड़ा सा खुशमिजाज किया जा सके। वरना, दुनिया तो रोज़ ही घूमनी पड़ती है, जहाँ न जाने कौन सा आतंकी किस भेष में आकर अपनेपन का दिखावा करके इस जान से मौत का सौदा करके चलता बने।"
ये जो वो नहीं बोल पाया, उसे न सुन पाने वाली श्रीमती जी के दिमाग की लाल बत्ती जल उठी थी और उसके कमरे से निकलकर जाने के बाद वो खुद से बोल ही पड़ीं-
"अगर जो मैं न बोलती, फ़िर तो ज़िंदगी भर यूँ ही घर के बाड़े में पिसती रहती ! सच में... फौजियों के दिमाग नहीं होता। बस जो हुकुम दे दे, उसकी नौकरी बजाने लगते हैं !"
