नयी राह
नयी राह
"पापा फ्लाइट का समय हो रहा है। अब मुझे निकलना चाहिए।" सोमेंश कमरे मेंं अपने पापा से अनुमति लेने आया तो राकेश जी के हाथ मेंं पैन डायरी देख कर ठिठक गया।
आज सुबह से ही राकेश जी का मन अनमना हो रहा था। अब वो एकदम अकेले हो गये थे। जीवनसाथी के बिना अकेले रहना। उफ्फ़ घर काटने को दौड़ रहा था। कैसे जी पायेगे सुधा के बगैर। वो दो चार दिन सुधा को मायके भी नहीं जाने देते थे और आज उसे गए तेरह दिन हो गये। रह रह कर कलेजा मुँह को आ रहा था, फूट फूट कर रोना चाहते थे पर मर्द थे ना, रो भी नहीं सकते थे। एक एक कर रिश्तेदार विदा हो गए थे। बाहर सोमेंश भी वापस जाने की तैयारी कर रहा था। वो दिल्ली में नौकरी कर रहा था। दीदी कुछ दिनों के लिए रुकने वालीं थीं जिससे राकेश जी को संभलने में थोड़ा सहारा मिल जाये। जैसे भी हो सब मिलकर घर समेंट रहे थे। सुधा होती तो फटाफट सब समेंट लेती। सब के जाने की तैयारी कर दी होती। लेकिन वो तो खुद ही अचानक चल दी, बिना किसी तैयारी के, बिना किसी खबर के।
राकेश जी के सामने सुधा का मंगवाया कोरियर पड़ा था। हफ्ते भर से आया हुआ था। किसी ने खोल कर ही नहीं देखा। राकेश जी ने पैकेट खोला, अंदर से एक डायरी व पैन निकले।
राकेश जी की बैचेनी और बढ़ गयी। सुधा हमेंशा कहती थी, "तुम्हें लिखने का शौक है तो उसे मारते क्यों हो? समय कभी नहीं मिलता, समय चुराया जाता है। पंसदीदा काम तुमको खुश रखेगा। तुम लिखना शुरू करो समय अपने आप मिल जायेगा"
राकेश जी को लग रहा था जैसे जिंदगी अब इस डायरी के कोरे पन्नों की तरह रह गयी, खाली और बदरंग।
"देखिए ना पापा, मम्मी आपसे कह रही है अपने जीवन के कोरे कागज पर रंग भरने को। इस डायरी में लिखने की कोशिश करिएगा, मम्मी को अच्छा लगेगा। यह उन्होंने आपके लिए ही मंगवाई थी।" सोमेंश ने उनकी सोच को बदल कर रख दिया।
राकेश जी महसूस कर रहे थे जैसे जाते जाते सुधा उन्हें जीवन की नयी राह सुझा गई जिस पर चल कर वो अपने जीवन की नयी पारी खेल सके।
