नल नील- पुराण कथा
नल नील- पुराण कथा
ये नल और नील विश्वकर्मा के वानर पुत्र हैं। ये बचपन में स्वभाववश बड़े ही नटखट थे। ये ऋषियों के साथ रहते थे। वे ऋषिलोग जब इन्द्रियों को समेटकर परमात्मा को ध्यान में मग्न हो जाते ,तब ये दोनों भाई चुपके से दबे पॉंव वहाँ आते और उनके ठाकुर जी की मूर्ति उठाकर जेल में फेंक देते ।वात्सल्य स्नेह होने के कारण और तप में विघ्न पड़ जाने के कारण ऋषिलोग इनका अनिष्ट तो नहीं कर सकते थे ,इसलिए वे चुप रह जाते।
जब नल नील का उपद्रव बहुत बढ़ गया है तब एक दिन ऋषियों ने सलाह करके शाप के रूप में उन्हें ऐसा आशीर्वाद दे दिया कि इनके हाथ से जिसका स्पर्श हो जाय,वह वस्तु चाहे जितनी भारी हो जल में न डूबे।
तब से नल नील किसी की मूर्ति उठाकर जल में फेंक देते तो वह ऊपर ही ऊपर ऊपर उतराती रहती और ऋषि लोग उठा लाते। ऋषियों के इस आशीर्वाद के प्रभाव से ही सेतुबंध के समय नल नील ने भगवान् राम की सेवा की।
का विजय के लिये श्रीराम ने वानर सेना का संगठन किया और सब ओर से सुरक्षित यह सेना कार्य सिद्धि के लिये आगे बढ़ रही थी ।मार्ग में अनेकों जंगलों और पहाड़ों पर पड़ाव डालती हुई वह लवणसमुद्र के पास आ पहुँची और उसके तटवर्ती वन में डेरा डाल दिया।
तदनन्तर भगवान् राम ने यह समयोचित बात सुग्रीव से कही-“ हमारी यह सेना बहुत बड़ी है और सामने अगाध महासागर है, जिसको पार करना बहुत ही कठिन है। इतनी सेना उतारने के लिए तो हम लोगों के पास नावें भी नहीं हैं। हमारे विचार में तो यह आता है कि किसी उपाय से समुद्र की आराधना करें ,यही कोई मार्ग बताएगा ।उपासना करने पर भी यदि इसने मार्ग नहीं बताया तो मैं अपने अग्नि के समान तेजस्वी अमोघ बाणों से इसे जलाकर सुखा डालूंगा”
यों कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण सहित आचमन करके समुद्र के किनारे कुशासन बिछाकर लेट गए।तब समुद्र ने प्रकट होकर स्वप्न में भगवान् राम को दर्शन दिया और मधुर वचनों में कहा -“मैं आपकी क्या सहायता करूं ?”
श्रीराम ने कहा है-“मैं अपनी सेना के लिए मार्ग चाहता हूँ जिससे जाकर रावण का वध कर सकूँ ।यदि मेरे माँगने पर भी रास्ता न दोगे तो मैं अभिमंत्रित किए हुए दिव्य बाणों से तुम्हें सुखा डालूँगा।”
श्रीराम की बात सुनकर समुद्र ने हाथ जोड़कर कहा-“ भगवन् ! मैं आपका मुक़ाबला करना नहीं चाहता और आपके काम में विघ्न डालने की भी मेरी इच्छा नहीं है। आपकी सेना में नल नामक एक वानर है। वह विश्वकर्मा का पुत्र है, उसे शिल्प शास्त्र का अच्छा ज्ञान है। वह अपने हाथ से जो भी तृण , काष्ठ या पत्थर डालेगा,उसे मैं ऊपर रोके रहूँगा। इस प्रकार आपके लिए एक पुल तैयार हो जाएगा।”यों कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया।
श्री रामचंद्र जी ने धरना छोड़ दिया ,और नल को बुलाकर कहा-“नल ! तुम समुद्र पर एक पुल बनाओ। मुझे मालूम हुआ है कि तुम कार्य में कुशल हो।”
तब वानरश्रेष्ठ नल महाबली भगवान श्रीराम से बोला -“ प्रभो! मैं पिता की दी हुई शक्ति को पाकर इस विस्तृत समुद्र पर सेतु का निर्माण करूँगा ।महासागर ने ठीक कहा है।मैं विश्वकर्मा का औरस पुत्र हूँ। और शिल्प कर्म में उन्हीं के समान हूँ। इस समुद्र ने आज मुझे इन सब बातों का स्मरण दिला दिया है। मैं बिना पूछे आप लोगों को अपने गुणों को नहीं बता सकता था ,इसीलिए अब तक चुप था। मैं महासागर पर पुल बाँधने में समर्थ हूँ । आज से ही पुल बाँधने का कार्य प्रारंभ कर दें।”
तब पुल बॉंधने का कार्य आरम्भ हो गया। नल नील के हाथ से समुद्र में रखे हुए पत्थर डूबते नहीं थे। भयंकर कर्म करने वाले वानरों ने मिल-जुलकर उस समय सेतुनिर्माण का कार्य आरम्भ किया था। पर्वतों जैसी बड़ी- बड़ी चट्टानें और पर्वत शिखर लेकर दौड़ते वानर दानवों के समान दिखाई देते थे। जिनके अग्र भाग फुलों से लदे थे,ऐसे वृक्षों द्वारा भी वे वानर सेतु बॉंधते थे। इस प्रकार विश्वकर्मा के बलवान् कान्तिमान् पुत्र कपिश्रेष्ठ नल ने समुद्र में सौ योजन लम्बा पुल तैयार कर दिया। वे अपने पिता के समान प्रतिंभाशाली थे।
