मुसीबत को बुलावा
मुसीबत को बुलावा
"कितना मना किया था बेटा। उसे यहाँ मत रख काम पर। सुना था बड़ी झगड़ालू किस्म की है मगर तू कहाँ सुनने लगा" मम्मी ने माथा पीट लिया।
"ये बाल धूप में पकाए हैं क्या ? मन्नू बेटा माँ हूँ तेरी।"
"माँ गणेशी आंटी को सचिन के यहाँ बहुत साफ-सफाई से काम करते देखता था। इसीलिए यहाँ बुला लाया था। आप भी इस उम्र में हाथों से अकेली कितना करेंगी।"
मन्नू ने तो अपनी सोच से अच्छा ही किया था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अंकित (मन्नू ) जब एक अच्छी एम एन सी में साफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर नौकरी करने लगा तो अब तक उसकी पढ़ाई की खातिर संघर्ष करने वाले अपने प्यारे माता - पिता को हर संभव सुख सुविधाएं मुहैया कराने के लिए तत्पर हो उठा।
यह काम वाली बाई उसी सिलसिले की एक कड़ी थी।
वह बाई की असली फितरत से बिल्कुल भी वाकिफ नहीं था।
"गणेशी को मैं पहले से पहचानती हूँ बेटा।"
"कई घरों से इसका काम इसीलिए छूटा कि यह झूठी और झगड़ालू है। पैसे उधार ले जाती है बाद में मुकर जाती है।"
मन्नू माँ के कंधे पकड़ कर उन्हें कुर्सी पर बिठाते हुए प्यार से बोला- "प्यारी माँ । आपसे कुछ कहा क्या उसने।"
"हाँ मन्नू। बेटा जब वह नयी आई ही थी तब 15 दिनों के बाद ही मुझसे पति की बीमारी की बात कहकर दो हज़ार रु ले गयी थी।"
" आज जब मासिक पगार देने का कहने लगी तो मैंने उसे दो हज़ार रु एडवांस देने वाली बात याद दिलाई।
वह तो साफ मुकर गयी। कहने लगी आपने तो पाँच सौ रुपये ही दिए थे और कहा था अभी मेरे पास बस इतने ही हैं। "
माँ परेशान दिख रही थीं जबकि मन्नू के पापा कह रहे थे -" कोई बात नहीं शांति। ऐसे झूठ बोल कर वह ज़्यादा से ज़्यादा डेढ़ हज़ार रुपए ले जाएगी। क्या तुम्हारी किस्मत ले जाएगी।"
"कल वह आए तो उसका हिसाब करके उसे तुरंत प्रभाव से काम से हटा दो।" मन्नू के पापा ने अपना फाइनल फैसला सुनाया।
मन्नू सोच रहा था कि माँ के बहुत मना करने पर भी मैंने जान बूझकर कर गणेशी जैसी झगड़ालू बाई को काम पर रख कर""आ बैल मुझे मार"" वाला काम किया।
अंकित (मन्नू ) अपने आनन-फानन में लिए गए निर्णय पर पछता रहा था।
