Principal Rasik Gupta

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"मुफ्त का दूध" भाग - 1

"मुफ्त का दूध" भाग - 1

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एक बार की बात है। एक गांव में दूध की बड़ी भरी किल्लत थी। गांव के लोगों को दूध नहीं मिलता था। उन के बच्चे दूध पीने के लिए रोते बिलखते रहते थे। लोगों से अपने बच्चों का यह दुःख देखा नहीं जाता था। सब लोग परेशान हो कर मुखिया जी के पास गए। मुखिया जी बोले की इस का एक उपाय है की मैं गाय खरीद लेता हूँ किन्तु उस के लिए पैसे आप लोगों को ही देने होंगे। इतना ही नहीं, उस गाय के चारे, साफ़ सफाई, दवा दारु और अन्य किसी भी खर्चे के लिए भी पैसे आप को ही देने होंगे। इस पर लोग बहुत निराश हुए। सब सोचने लगे की हम इतने पैसे कहाँ से लाएंगे ? तो मुखिया जी ने इस का हल भी सुझा दिया। उन्होंने कहा कि उन के पास गांव के लोगों ने जो पहले से अन्य सरकारी कामों के लिए पैसे जमा करवा रखे हैं, उन्हीं में से वो कुछ गाय खरीद लेंगे किन्तु इस सब पैसे का और आगे होने वाले सब खर्चे का भुगतान गांव वालों को टैक्स के रूप में करना होगा। कोई और विकल्प ना देख कर गाँव वाले तैयार हो गए। 

अगले ही दिन गाँव वालों के ही पैसों से मुखिया जी कुछ गाय खरीद लाये। उन्होंने कुछ डेयरियाँ खोल ली और गाँव में मुनियादी करवा दी कि मुखिया जी कि डेयरियों में मुफ्त में दूध मिला करेगा। गांव के लोग बहुत खुश हो गए। उन्होंने टैक्स भरना शुरू कर दिया। हर कोई टैक्स भर कर यह सोच कर खुश था कि मुफ्त में बच्चों के लिए दूध मिलेगा। इसी तरह दिन, महीने और फिर कई साल बीत गए। लोग बराबर टैक्स भर रहे थे लेकिन मुखिया जी कि अधिकतर गाय दूध नहीं दे पा रही थी और जो कुछ दूध देती भी थी उस कि गुणवत्ता एकदम घटिया स्तर कि थी। इस के पीछे का कारण थे मुखिया जी के कर्मचारी जो दूध में दिल खोल कर पानी मिलाते थे। मान लीजिए जैसे दूध के नाम पर केवल पानी ही देते थे। जिस कि वजह से लोगों के बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे थे। समस्या जहाँ से शुरू हुयी थी वहीं पर आ कर खड़ी हो गयी। टैक्स देना लोगों कि दिनचर्या का ऐसा अंग बन चुका था कि लोग इस बात को लगभग भूल चुके थे कि वो दूध लेने कि लिए टैक्स भरते हैं, मुखिया जी की गायों कि गिनती बढ़ाने के लिए नहीं। मुखिया जी के पास वो जब भी शिकायत ले कर जाते तो मुखिया जी का एक ही उत्तर होता कि एक तो मुफ्त में दूध दे रहा हूँ फिर भी आप लोग नखरे करते हो। चुपचाप मुफ्त में जो मिलता है उस से संतोष करना सीखो नहीं तो यह भी नहीं मिलेग। 

लोग बहुत दुखी होते किन्तु कोई और विकल्प ना होने कि वजह से मन मसोस कर रह जाते। 

फिर एक दिन गाँव के ही एक समझदार व्यक्ति ने गाँव वालों कि एक बैठक बुलाई और बोला, "मुझ से हम सब के बच्चों का दुःख देखा नहीं जाता। मेरा खुद का बच्चा भी दूध के लिए बिलखता है मगर मुखिया जी जो दूध के नाम पर पानी देते हैं, उस से तो किसी तरह का पोषण मिलता ही नहीं। अगर आप लोग मेरा साथ दें तो मेरे पास एक सुझाव है। " लोगों ने एक सुर में कहा, "बताइए "। वह व्यक्ति बोला, "मेरे पास गाय खरीदने लायक पैसे हैं मगर उस के बाद गाय के चारे और उस के रख रखाव के लिए बिलकुल भी पैसे नहीं हैं। अगर आप लोग मेरा साथ दो तो में गाय खरीद लेता हूँ मगर उस के चारे और रख रखाव के पैसे आप को देने होंगे। मान लीजिए कि एक तरह से आप दूध का मोल चुका कर ही दूध प्राप्त करेंगे। क्या आप सब इस के लिए राज़ी हैं? सब लोगों ने एक सुर में हामी भर दी। वो व्यक्ति एक अच्छी नस्ल की दुधारू गाय ले आया और लोग उसे चारे और रख रखाव के पैसे दे कर उस से दूध प्राप्त करने लगे। जल्दी ही उस व्यक्ति की गाय और उस के उत्तम गुणवत्ता वाले दूध की चर्चा गाँव भर में फैल गयी। उस की देखा देखी गांव के कुछ और लोगों ने भी गाय खरीद ली और लोग उसी तरह चारे और रख रखाव के पैसे दे कर उन से भी दूध खरीदने लगे। मुखिया जी की डेयरियों पर उन सब लोगों ने जाना बंद कर दिया जो चारे और रख रखाव के पैसे देने की हैसियत रखते थे। यहाँ तक की मुखिया जी के घर के सभी नौकर और उन के सगे सम्बन्धियों ने भी उन की डेयरियों से दूध लेना बंद कर दिया। हाँ टैक्स गाँव का हर व्यक्ति अभी भी भर रहा था जिस के बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं। 

मुखिया जी की डेयरियों पर केवल वही लोग जाते जो किसी भी तरह से पैसे भरने के काबिल ही नहीं थे। एक समय ऐसा आ गया कि ऐसे लोगों ने भी उन कि डेयरियों पर जाना बंद कर दिया। मजबूरन मुखिया जी ने ये घोषणा करवा दी कि जो कोई भी उन की डेयरियों पर दूध लेने आएगा, उस के बच्चों को मुफ्त में दूध के साथ थोड़ी चीनी, चाय पत्ती आदि भी फ्री में दी जाएगी। लेकिन जैसा कि मुखिया जी के कर्मचारियों की आदत थी, इस फ्री के सामान में भी ज़्यादातर से उन का ही पेट भरता और हल्का और घटिया दर्जे का सामान ही मुफ्त में लोगों को दिया जाता जिसे लेने से धीरे धीरे उन लोगों ने एक तरह से मना ही कर दिया। मुखिया जी ने हर कोशिश कर के देख ली मगर सभी मुफ्त की घोषणाओं के बावजूद उन की डेयरियों पर संपन्न लोगों के पाँव नहीं पड़े। फिर भी मुखिया जी को इस बात से संतोष था कि कम से कम उन का कोई खर्चा तो नहीं हो रहा। जो भी खर्चा हो रहा है, वो जनता के टैक्स के पैसे से ही हो रहा है। और जनता कि मूर्खता का आलम ये है कि दो दो जगह पर पैसे भर रहे हैं किन्तु मुखिया जी से दूध ना लेने के बावजूद भी ना तो कभी दूध ना मिलने के कारण नाराज़गी जतलाई और ना ही कभी टैक्स के पैसे बंद करने के बारे में सोचा। 

हाँ इस का उल्टा जहाँ से उन्हें उत्तम गुणवत्ता वाला दूध मिल रहा था, उन लोगों से यदा कदा छोटी मोती चीज़ों को ले कर अपनी नाराज़गी ज़रूर जतला देते ख़ास तौर पर जब चारे के पैसे देने का टाइम आता। आखिर दूध तो सब को चाहिए मगर पैसे देना किस को अच्छा लगता है, वो भी एक गैर सरकारी व्यक्ति को? मगर फिर भी धीरे धीरे सब गैर सरकारी व्यक्तिओं की डेयरिओं पर भीड़ बढ़ने लगी। इस का एक बहुत बड़ा कारण था की हर व्यक्ति ने अपनी पहुँच के अनुसार अलग अलग नस्ल की गायें खरीदी और अलग अलग तरह की सुविधाओं वाली डेयरियां बनायीं जिन में अलग अलग गुणवत्ता वाला दूध मिलता था। किन्तु उसी गुणवत्ता और सुविधाओं के आधार पर चारे और रख रखाव का खर्च भी लोगों को देना होता था। यानि, यदि ज़्यादा पोषण वाला दूध चाहिए तो ज़्यादा खर्च करना पड़ेगा और यदि कम खर्च कर सकते हैं तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वैसे ही विकल्प भी उपलब्ध थे। हर कोई अपनी जेब और पहुँच के अनुसार दूध प्राप्त कर रहा था। जैसे जैसे दूध की मांग बढ़ती जा रही थी, वैसे वैसे कुछ लोगों ने ज़्यादा गाय भी रखनी शुरू कर दी। ज़्यादातर ने तो क़र्ज़ ले कर भी गायें रख ली। क्योंकि इस में उन को कमाई भी होने लगी थी। धीरे धीरे इस दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में कई लालची लोग भी आ गए जिन का उद्देश्य केवल पैसा कमाना ही था। किन्तु फिर भी उन की डेयरिओं पर भीड़ दिखने लगी क्योंकि जितने पैसे वो चारे और रख रखाव के लेते थे, उसी के अनुपात में दूध भी देते थे। 

गाँव के लोगों के पास इतने विकल्प हो गए की अब वो डेयरी से डेयरी घूम घूम कर पहले दूध की गुणवत्ता चेक करते और चारे और रख रखाव के खर्चे के बारे में जानकारी प्राप्त करते और फिर निर्णय लेते की अपनी जेब के हिसाब से वो किस डेयरी वाले से किस गुणवत्ता का दूध लेना चाहेंगे और फिर उसी से दूध लेते। मुखिया जी गैर सरकारी डेयरियों को फलता फूलता देख कर जलते भुनते रहते। उन की रह में रोड़े अटकाने के लिए उन्होंने उन डेयरी वालों पर तरह तरह के टैक्स का बोझ लाद दिया जैसे कि फायर सेफ्टी टैक्स, बिल्डिंग सेफ्टी टैक्स, CLU , प्रॉपर्टी टैक्स, हेल्थ एंड हाइजीन टैक्स, और तो और सभी कर्मचारियों का 6 महीने का वेतन भी मुखिया जी ने अपने पास रखवा लिया यह बोल कर कि मुसीबत के समय में वापिस कर दिया जायेगा । इन सब चीज़ों के सर्टिफिकेट देने के लिए मुखिया जी के कर्मचारी जम कर रिश्वत भी लेते। फिर भी वो सब टैक्स भर कर और सब कुछ पूरा होने के बावजूद भी रिश्वत भर कर भी वो गैर सरकारी लोग अपनी डेयरियां चलाते रहे और लोगों को दूध देते रहे। मुखिया जी ने जनता को कभी इस बात कि भनक तक भी ना लगने दी कि जिन डेयरी वालों से वो दूध लेते हैं, उन पर मुखिया जी और उन के कर्मचारी कितना अत्याचार कर रहे हैं। 

इन टैक्सों और नाजायज़ खर्चों का बोझ अपने सर से उतारने के लिए कई डेयरी वालों ने कुछ और तरीकों से पैसा उगाहना शुरू कर दिया जैसे कि दूध के लिए लिफाफे, बर्तन आदि केवल उन कि ही डेयरी से खरीदने पर ही दूध देना आदि आदि। मगर फिर भी वो अपनी डेयरियां चलते रहे। अंततः मुखिया जी ने एक नयी चाल चली। उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि हर गैर सरकारी डेयरी वाले को अपने डेयरी का 25 % दूध मुफ्त में गरीबों को बाँटना होगा। गैर सरकारी व्यक्तियों ने थोड़ा हो हल्ला मचाया कि हमारा सारा खर्चा तो चारे और रख रखाव के जो पैसे लोग देते हैं, उन से ही चलता है। उस में से भी पहले से ही आप अलग अलग टैक्स के रूप में से पहले से ही हम से वसूल रहे हो। अब यह आमदन जब 75 % ही रह जाएगी तो हम अपनी डेयरियां कैसे चला पाएंगे और कैसे गांव वालों को उसी खर्चे पर दूध दे पाएंगे जिस पर अभी दे रहे हैं ? मुखिया जी ने कहा उन्हें कुछ नहीं पता। उन के कर्मचारी कुछ प्रबंध कर देंगे। कैसे करेंगे, नहीं पता मगर यह आदेश तुरंत प्रभाव से लागू होगा। जो लोग इन गैर सरकारी डेयरिओं से दूध लेते थे, वे भी मुखिया जी के इस आदेश के खिलाफ कुछ नहीं बोले। काफी समय बीत जाने के बाद भी गैर सरकारी डेयरी वालों को उन २५ % गरीबों को दूध देने के बदले ना तो मुआवज़ा मिला ना ही इस मुआवज़े का कोई तरीका मुखिया जी का कोई कर्मचारी बता पाया। मजबूरन कुछ डेयरी वालों ने चारे और रख रखाव का खर्च बढ़ा दिया तो कईओं ने दूध कि गुणवत्ता घटा दी। लोग तब भी समझ नहीं पाए कि ये समस्या गैर सरकारी डेयरी वालों द्वारा नहीं बल्कि मुखिया जी द्वारा पैदा कि गयी है। और मुखिया जी से अपने टैक्स के बदले अपना हक़ मांगने के बजाय यदा कदा मौका देख कर गैर सरकारी डेयरी वालों को ही गरियाने लगे, खास तौर पर जब चारे और रख रखाव का खर्चा देने का समय आता। 

मुखिया जी ने एक और चाल चली। अपने सभी कर्मचारियों को इस काम पर लगा दिया की वो गाँव के संपन्न लोगों के पास जाएं और उन्हें "इमोशनल ब्लैकमेल" कर के और गाँव की इज़्ज़त का वास्ता दे कर कुछ डेयरियों को गोद लेने के लिए मना लें जिस से कुछ एक डेयरियों को सजाया , संवारा जायेगा और उन की गायों के दूध की गुणवत्ता में सुधार का प्रचार कर के शायद उन के कर्मचारी लोगों को मुखिया जी के डेयरियों की और आकर्षित कर पाएं। मुखिया जी अपनी योजना में सफल रहे। बहुत से संपन्न लोगों ने उन की चाल में आते हुए कुछ डेयरियों को गोद ले लिया और जिन का खर्चा पहले से ही जनता के टैक्स के पैसों से चल रहा था, उन के लिए ही और पैसे देने शुरू कर दिए। मुखिया जी ने उन डेयरियों का नाम रखा स्मार्ट डेयरियां और ज़ोर शोर से उन का प्रचार करना शुरू कर दिया। मगर हाय रे किस्मत, मुखिया जी की यह योजना भी कामयाब ना हो सकी और उन की चालबाज़ियों से तंग आये लोगों ने उन की और रुख नहीं किया। मुखिया जी कभी यह ना समझ पाए कि जनता को दूध कि गुणवत्ता से मतलब है , ना कि डेयरियों कि साज सज्जा से। मगर कहानी का दूसरा पहलु अभी भी वैसा ही रहा, जनता अपने ही टैक्स का पैसे का मोल मुखिया जी से मांग पाने में नाकाम रही। 


और फिर वर्ष 2020 का उदय हुआ और पड़ोस के गाँव में बहुत बड़ी महामारी ने दस्तक दी


क्रमशः (जारी है)

कहानी का दूसरा भाग:- "कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?" ओह सॉरी, "मुखिया ने गैर सरकारी डेयरी वालों को मारने की साज़िश क्यों रची ?" पढ़ने के लिए थोड़ा इंतज़ार करें। 



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