STORYMIRROR

मुक्ता की उलझन

मुक्ता की उलझन

4 mins
14.5K


मुक्ता ने जब से होश संभाला है तब से ही वह पिता के रौद्र रूप से रूबरू रही है।मुक्ता के पिता अत्यंत विद्वान,समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति,राजनीति में रसूख़दार एवं सुघड़ देहयष्टि धारक व्यक्ति थे। किन्तु अहंकारी इतने की छोटा से बच्चे ने भी अगर हुक्म उदूली कर दी तो उसकी भी ख़ैर नही रहती थी।जरा जरा सी बात में मरने मारने पर उतारू हो जाते थे।
एकबार बचपन मे मुक्ता किसी खिलौने के लिये अड़ गई थी ,बहुत चीख पुकार मचा रही थी तो गुस्से में आकर उसके पिता ने उठाकर आँगन में फेंक दिया था।माँ की बड़ी अनुनय विनय के बाद उसे घर मे दाख़िल होने दिया था।तब से मुक्ता के मन मे पिता के लिए एक अनजाना सा डर बैठ गया था।
उसे याद है छोटी छोटी बातों में माँ को पिताजी बहुत बुरी तरह से डांटते थे।अगर समय पर उनका कोई काम नही किया तो उस दिन माँ की खैर नही रहती थी।
एक बार मुक्ता की नानी के बीमार होने पर माँ बिना बताए ही उन्हें देखने चली गयी थी।मुक्ता के पिताजी इतना गुस्सा हुए थे कि उन्होंने माँ को घर मे घुसने नही दिया था।बहुत अनुनय विनय और पड़ोसियों के समझाने के बाद ही माँ घर मे अंदर आ सकी थीं।
उसके पिता जब तक घर मे रहते थे पूरे घर मे कर्फ्यू सा लगा रहता था।
मुक्ता की माँ उतनी ही सीधी,सरल और विनम्र स्वभाव की थीं।पूरे परिवार को एक सूत्र में बांध कर रखने वाली और सभी से हँसमुख व्यवहार करने वाली सहनशीलता की प्रतिमूर्ति।
मुक्ता के मन मे पिता की एक अलग धारणा बन चुकी थी।एक क्रूर,जुल्म,और शासन करने वाला व्यक्ति।
समय पंख लगा कर उड़ता गया।मुक्ता बड़ी हो गई उसकी शादी पिता की इच्छा के अनुरूप सुसंस्कारित परिवार में हो गई।
मुक्ता जब ससुराल में आई तो यहाँ परिस्थितयां बिल्कुल उलट थीं।ससुराल में सास का बोलबाला था,उनकी आज्ञा के बिना पत्ता भी नही खड़क सकता था।बहुओं के लिए कठोर अनुशासन था।उसका पति और देवर सभी उसकी सास से कांपते थे।बगैर उनकी अनुमति से न कोई घर मे आ सकता था न जा सकता था।
मुक्ता के ससुर बहुत शांत और सौम्य प्रकृति के व्यक्ति थे।मुक्ता के मन की बात तुरंत समझ जाते थे और अपनी पत्नी की नजर बचा कर उसे पूरा करने की कोशिश करते थे।
एक बार अविनाश ने खर्चे के लिए अपनी माँ से कुछ पैसे मांगे।
माँ बहुत तमक कर बोली"नाकारा से घर बैठे रहते हो कुछ कमाओ या खेतों में जाकर पसीना बहाओ,पैसा पेड़ों पर तो उगता नही है।"
अविनाश मुँह लटका कर बाहर निकल गया,मुक्ता को बहुत बुरा लगा वह सोचने लगी कि कोई माँ अपने बेटे से ऐसा व्यवहार कैसे कर सकती है।उसके ससुर को जब पता चला तो उन्होंने मुक्ता को बुला कर खर्च के लिए पैसे दिए।
अविनाश नौकरी तलाश रहा था।लेकिन आज की परिस्थितियों में सामान्य वर्ग के लोंगों को नौकरी कहाँ मिल रही है?
एक बार मुक्ता अविनाश के साथ बाजार खरीददारी के लिए चली गई दोनों बहुत दिनों बाद घूमने निकले थे पार्क में बैठ गए।बातों में पता ही नहीं चला कब रात हो गई।अविनाश ने घड़ी देखी तो घबरा गया।जल्दी से दौड़ते भागते घर पहुंचे,दरवाजे पर ही मुक्ता की सास ने अविनाश को खूब खरी खोटी सुनाई।
"आ गए महाराज महारानी जी को सैर करा लाये"
"माँ वो खरीददारी में लेट हो गए" हकलाते हुए अविनाश ने उत्तर दिया।
"हां क्यों नहीं होंगे लेट महारानी जी के माता पिता ने खूब दहेज दिया है जो बाजार का बाजार उठा ले आते।" मुक्ता की सास लगभग गरजते हुई बोली।
मुक्ता के ससुर ने दोनों को चुपचाप कमरे में जाने का इशारा किया।मुक्ता और अविनाश चुपचाप कमरे में चले गए।लगभग आधे घंटे तक मुक्ता की सास के प्रवचन चलते रहे,अविनाश चुपचाप बिस्तर पर सो गया।
मुक्ता बिस्तर पर बैठ कर तुलना कर रही थी।उसको अपनी सास में अपने पिता का स्वभाव नजर आ रहा था।और अपने ससुर में अपनी माँ का अक्स दिखाई दे रहा था।उसके मन मे पिता और माता के जो प्रतिमान थे वो सब टूट चुके थे।
वो निर्णय नहीं कर पा रही थी कि पिता श्रेष्ठ होता है या माँ।
जब मुक्ता ने गहन विचार किया तो उसके मस्तिष्क ने स्वयं उत्तर दिया।माता और पिता भी व्यक्ति होते हैं भगवान नही।उनमें भी व्यक्तिगत और स्वभावगत गुण दोष होते हैं।स्वभावतः भले हो वो कितने गुस्सा करने वाले अहंकारी क्यों न हों।उनकी डांट डपट और अनुशासन मैं भी अपनी औलादों की भलाई छुपी होती है।
माता पिता अपनी संतानों के लिए वैसे ही हैं जैसे शरीर मे दो आंखे दो हाथ और दो पैर।इनमें से एक के न होने से जिंदगी तो चलती है किन्तु घिसटती हुई।
मुक्ता के मन मे अपनी सास और पिता के लिए स्नेह और श्रद्धा के भाव थे और उसके मुंह पर मुस्कान।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational