मुझे माफ कर दो पापा
मुझे माफ कर दो पापा
वैसे तो मैंने कई लड़ाईयाँ लड़ी है। कभी हार गई तो कभी जीत का स्वाद भी बाखुबी चखा है।पर......यह लड़ाई मेरी खुद से थी... अपनी गलत आदत से छुटकारा पाने की थी और इसमें जितना थोड़ा मुश्किल था। सो मैंने काफ़ी कोशिशों के बाद अपनी कमज़ोरी पर जीत का तमगा हासिल किया है।यकीन मानिये खुद से लड़कर शुरू में तो मज़ा नहीं आया पर जैसे जैसे अपनी कमज़ोरी पर जीत का पताका लहराती गई... मेरी लड़ाई भले ही पहले से ज़्यादा कठिन हो गई पर जीत का अंदाजा और भी पक्का होता चला गया।
मैं यानि 'कनिका' जिसे सब प्यार से कनु बुलाते हैं सिवाय मेरे पापा के। पापा हमेशा मुझे पूरे नाम से बुलाते थे... कुन्नी और भैया.... वो तो कभी कभी कुम्भकर्ण बोलकर चिढ़ा भी देता था और मैं चिढ़ भी जाती थी।मैं पढ़ाई के अलावा हर काम में आलसी थी। सुबह उठना मेरे लिए एक बड़ी सजा थी।मेरे देर से सोकर उठने की वजह से अक्सर मेरी स्कूल बस मिस हो जाती और पापा या भैया को मुझे पीछे से स्कूल छोड़ने जाना पड़ता था।पापा हमेशा मुझे समझाते कि.....
"कुन्नी! तुम सुबह जल्दी उठा करो। तुम देर से उठकर सुबह की पहली किरण को देखना और प्रकृति को महसूस करना खो रही हो। तुम्हारी देर से उठने की आदत से तुम्हें आगे चलकर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है!"
पापा रोज़ सब बच्चों को सुबह सुबह उठा देते। मुझे तो गुस्सा तब आता ज़ब छुट्टी वाले दिन भी पापा मुझे, कुमुद और भाई को सुबह उठाकर कभी कसरत कराते तो कभी सैर पर ले जाते।जबकि मैं छुट्टी के दिन देर तक सोना चाहती थी।चुँकि मैं ज़्यादा सोती थी इसलिए पापा मुझे ज़बरदस्ती उठाते,और इसीसे बहुत बार मुझे अपने मेहनती और अनुशासनप्रिय पापा खड़ूस लगते और लगता वो मुझे प्यार नहीं करते।और मम्मी....?वो भी कहाँ कम थी। उनके भाषण भी लगभग रोज़ सुनने को मिल जाते,
"इतनी देर से उठोगी तो हमेशा आलसी कहलाओगी। ससुराल में तो मेरी नाक ही कटवाओगी। तुम लड़की हो, कल को घर की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हें संभालनी है, इतना सोओगी तो बाकी काम कब करोगी!"
सुनकर मैं कुछ बोलना चाहती तो छुटकी कुमुद चालू हो जाती,
"मम्मी, मैंने भी पढ़ा है...जो सोवत है वो खोवत है, और जो जागत है वो पावत है!"
मन तो करता इस कुमुद की तो अच्छे से धुलाई कर दूँ। एक तो पढ़ाई में कोई खास नहीं, ऊपर से खुद को किसी फ्यूचर मिस इंडिया से कम नहीं समझती। खुद रात में जागकर पढ़ाई करनी पड़े तो पता चलेगा महारानी को कि सुबह उठना कितना मुश्किल है।मैं यह सब मन ही मन में बड़बड़ाती थी, वरना मम्मी की फेवरिट कुमुद को सबके सामने कुछ कहने की हिम्मत भला मुझमें कहाँ थी।कुमुद के बोलते ही फिर भैया को भी मौका मिल जाता...
"पिछले जन्म में तु कुम्भकरण रही होगी, इस जन्म में क.... नि....का..."
फिर सबके समवेत ठहाके गूंजते और मैं रोने रोने को हो आती।अब मेरी नींद सुबह नहीं खुलती तो इसमें मेरा क्या कसूर?पर यह बात मैं इनको नहीं समझा सकती थी ना कि...मुझसे पूरी रात जगवा लो, चाहो तो पत्थर तुड़वा लो, कुंआ खुदवा लो.... पर सुबह जल्दी नहीं उठा जाता था मुझसे।पापा हम तीनों भाई बहनों क़ो हमेशा समझाते कि सुबह उठना सेहत के साथ मानसिक विकास के लिए भी कितना ज़रूरी है। उनकी बात हमारे 'कुणाल' भैया हमेशा मानते थे।जिन्हें हम दोनों बहनें पीठ पीछे अक्सर श्रवण कुमार भी बुलाते हैं।छुटकी कुमुद भी देर सबेर उठ ही जाती। उसे बस अपनी ब्यूटीस्लीप पूरी करने के लिए छः से आठ घंटे की नींद पूरी करनी होती थी ,और अगर उसकी नींद पूरी हो जाए तो वह सुबह जल्दी उठती थी।बच गई मैं.... तो स्कूल तक तो सुबह उठना एक मज़बूरी थी। कोलेज़ आते ही मेरे अच्छे दिन आ गए थे। उधर प्रमोशन होने से पापा की व्यस्तता बहुत बढ़ गई थी। भैया भी इंजिनियरिंग करने कुरुक्षेत्र चला गया था।
कॉलेज में ग्यारह बजे से मेरा क्लास होता था। बस मेरे मज़े थे। खूब सोने और देर से उठने लगी थी मैं।उन्हीं दिनों एक हादसा हो गया जिसने मुझे हमेशा के लिए सुधार दिया।हुआ ये कि.....
मेरे कॉलेज में परीक्षाएँ चल रही थीं,तभी मम्मी को उनकी मौसी के बेटे की सगाई में जाना पड़ा। चुँकि सिर्फ चार दिनों के लिए जाना था इसलिए वह मुझे कुछ ज़रूरी हिदायतें देकर छोटी बहन कुमुद को लेकर चली गईं।पापा क़ो पिछले तीन साल पहले एक बार कोलेस्टेरोल बढ़ जाने की वजह से हार्ट में प्रॉब्लम हुई थी। तबसे मम्मी उनके खाने पीने का बहुत ध्यान रखने लगी थी।अब खाने पीने में लापरवाही उनके लिए बहुत खतरनाक हो सकती थी, इसलिए माँ की सख्त हिदायत थी कि उनको खाना और दवा समय पर मिले।वैसे तो घर में खाना बनाने के लिए सुबह शाम कुक आता था फिर भी पापा के खाने और समय पर दवाई देने का काम माँ मेरे ही ज़िम्मे देकर गई थी। पापा सरकारी नौकरी में थे और उनका इंस्पैक्शन होनेवाला था,अतः पापा माँ के साथ नहीं जा सके थे।
उनके जाने के बाद घर एकदम खाली खाली सा लग रहा था। पर चुँकि मुझे पढ़ाई करनी थी इसलिए मैं व्यस्त हो गई। इसके अलावा मुझे इस बात की ख़ुशी थी कि बिना किसी रोक टोक के सुबह देर तक सो पाऊँगी।
एक दिन रात में पापा काफ़ी देर से आए और उनकी तबियत भी कुछ ठीक नहीं लग रही थी। पुलिस की नौकरी में वैसे ही कभी कभी कभी खाना पीना सही समय पर नहीं हो पाता है। इसलिए पापा की तबियत उस दिन कुछ ठीक नहीं थी।मुझे आज भी वह घटना याद आती है तो मैं सिहरकर रह जाती हूँ।
सुबह के साढ़े आठ बजे थे कि कॉलबेल की आवाज़ से मेरी नींद खुल गई। मैं नींद में कुनमुनाई। फिर यह सोचकर अलसाकर सो गई कि पापा खोल देंगे। पर ज़ब थोड़ी देर बाद कॉलबेल दुबारा बजी और पापा ने नहीं खोला तो मैंने आँखें मलते हुए दरवाज़ा खोला तो सामने महरी और अर्दली दोनों खड़े थे।
मैं दरवाजा खोलकर दुबारा बेड पर लेटने ही वाली थी कि कामवाली की तेज़ आवाज़ आई। वह मुझे बुला रही थी।मैं हड़बड़ाकर उठी और कमरे से निकलते ही फिर से सुना, आवाज़ पापा के कमरे से आ रही थी।
मैं दौड़कर पहुँची तो पापा जमीन पर लेटे हुए थे। मुझे कुछ समझ नहीं आया, मैंने उनको हिलाते हुए आवाज़ लगाई....
"पापा... पापा.... उठिये, आप नीचे क्यों सो रहे हैं "उस वक़्त मुझे कोई होश नहीं था कि मैं क्या बोल रही हूँ।
आनन फानन में अर्द्ली के साथ पापा को लेकर हॉस्पिटल गई। सरकारी महकमे में होने की वज़ह से उन्हें अस्पताल में तुरंत एडमिट किया गया।पापा को तुरंत आई. सी. यू. में ले जाया गया। वहाँ मैं डॉक्टर कुमार को अच्छे से जानती थी वह इमरजेंसी में बैठते थे और कभी कभी घर भी आते थे। मैंने उन्हें देखते ही पुछा कि पापा को हुआ क्या है।बोलते हुए मेरी आवाज़ इतनी भर्रा रही थी कि मेरे मुँह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे।
डॉ कुमार ने जो बताया उसे सुनकर मेरे दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया। उन्होंने बताया पापा को हार्ट अटैक आया था।थोड़ी देर में फॉर्म भरते हुए मेरे हाथ थर थर काँप रहे थे....ज़ब मैंने फॉर्म पर यह लिखा देखा जिसमें लिखा था कि.....अगर ऑपरेशन के दौरान मरीज़ की जान चली जाती है तो अस्पताल या अस्पताल प्रशासन उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं होगा।उस फॉर्म पर साइन करते हुए मेरे हाथ के साथ मेरा हृदय भी थर थर काँप रहा था।
कहीं पापा को कुछ हो गया तो....?
किसी तरह फॉर्म भरा फिर अस्पताल के फोन से नानाजी और भैया को फोन किया।वो दो घंटे मेरे लिए बहुत ही कठिनाई भरे थे। जबतक पापा का ऑपरेशन चलता रहा मैं लगातार काँपते होंठों से हनुमान चालीसा पढ़ती रही।
पूरे दो घंटे बाद मैंने सुना.....डॉक्टर कुमार कह रहे थे,"तुम्हारे पापा अब खतरे से बाहर हैँ। थोड़ी देर में तुम उनसे मिल सकती हो"
मैं पापा से ज़ब मिलने गई तो वह कुछ बोल नहीं पा रहे थे। बस मुझे देखकर आँखों से ही आश्वस्त कर रहे थे कि.....मैं अब ठीक हूँ।दोपहर तक मम्मी भी आ गई थी और शाम तक भैया भी आ गए थे।पापा ज़ब थोड़े सामान्य हुए और हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर घर आए तब उन्होंने बताया कि उस दिन सुबह उठते ही उन्हें सीने में दर्द और जलन महसूस हुई जो बाएं हाथ से होते हुए और बढ़ गई। चुँकि उनको पहले भी दिल के दौरे का अनुभव हो चुका था, इसलिए वह समझ गए इस दर्द का संकेत किस तरफ है.हमेशा उनकी दवाइयाँ दाहिने तरफ के ड्राअर में रखी होती थी। उस दिन मम्मी नहीं थीं तो पापा बेड के बाएं तरफ ही सो गए थे। और ज़ब उनके सीने में तीव्र ज़लन हुई तो दवा वाले रैक तक उनका हाथ नहीं पहुँच पा रहा था इसलिए उन्होंने मुझे आवाज़ लगाई थी। दर्द बढ़ता जा रहा था तो उन्होंने किसी तरह खुद को सँभालते हुए मुझे फिर से कई आवाजें दी। पर मैं कैसे सुनती। मैं तो सो रही थी, मैं सुन ही नहीं पाई।और फिर पापा बेहोश हो गए थे।
मुझे सुनकर बहुत अफ़सोस हो रहा था। लग रहा था ओह.... उस दर्द के वक़्त पापा ने खुद को कितना असहाय महसूस किया होगा। मैं घर में थी पर उस वक़्त उनके पास नहीं आ पाई ज़ब वह दर्द से तड़प रहे थे।दुख और ग्लानि के अतिरेक से मैं और सुन नहीं पा रही थी।भर्राए गले से मैं बोलीं,"अब कभी देर से नहीं उठुँगी पापा, प्लीज मुझे माफ कर दीजिये "
पापा ने मुझे गले से लगाते हुए पुनः वही दोहराया जो हमेशा कहा करते थे कि,"बेटा! सुबह जल्दी उठना अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में सफलता के लिए ज़रूरी है "पर आज पापा की बातें मुझे भाषण नहीं लग रही थी।मैं देर तक उनका हाथ पकड़े बैठी रही थी।आज मम्मी ने भी ज़्यादा नहीं डांटा था। शायद वो मेरा पश्चात्ताप समझ रहीं थीं।भैया पापा की इस बीमारी के बाद कुछ ज़्यादा ही समझदार और बड़ा हो गया था।और सबसे ज़्यादा बदलाव आया छुटकी में।कुमुद अब आईने से ज़्यादा वक़्त किताबों के साथ गुजारने लगी थी।
मुझे चिढ़ाना छोड़कर भैया मुझे सुबह जल्दी उठने में मदद करने लगा था। मम्मी रात में बोल बोलकर मुझे जल्दी सोने भेज देती थी।और पापा सुबह चाय बनाकर मुझे जगाते। कुमुद इतना भर करती कि अपने कपड़ों के साथ मेरे जॉगिंग के कपड़े और जूते भी निकालकर रख देती।एक हादसे ने सबको एक सूत्र में बाँध दिया था जैसे। शायद इसी को परिवार की और रिश्ते की ताकत कहते हैँ।इस तरह सबके सहयोग से मैंने अपनी इस आदत पर विजय पाई थी।उसके बाद से मैं जल्दी उठने लगी।और अब तो जल्दी उठना मुझे बहुत अच्छा लगने लगा है।
प्रिय दोस्तों, मैंने बड़े जतन से अपने आपको देर से उठने की आदत से छुटकारा दिलवाया है। और मेरे लिए यह एक बड़ी जीत है। क्यूँकि इसमें मुझे खुद से लड़ना पड़ा था।आज भी मैं सुबह जल्दी उठती हूँ और बाल अरुण की मद्धिम रश्मियों को धीरे धीरे उगते हुए सूरज़ के आकार में बदलते देखने का आनंद लेती हूँ। बढ़ते धूप की उजास मेरे मन में उत्साह और स्फूर्ति की नई ऊर्जा भर देती है, जिससे मेरा पूरा दिन रौशनी से भरा रहता है।
