Rupa Bhattacharya

Tragedy


5.0  

Rupa Bhattacharya

Tragedy


मुझे इंसान मत बनाना

मुझे इंसान मत बनाना

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"झुमकी " ऽ ऽ चश्मा उतार कर रख दे, टूट जाएगी! ! फिर तेरे पापा मुझे डाटेंगे !

सितारा देवी ने अपनी पोती से कहा। मगर दादी, चश्मा मुझसे टूटेगी तो पापा तुम्हें क्यों डाँटेंगे ? मैम कहती है बड़ों को डाँटना गलत बात है


सितारा ने झुमकी से चश्मा लेना चाहा मगर चश्मा बच्ची के हाथों से गिर कर टूट गया।

माँ ऽ ऽ अभी तो नया चश्मा बनाया था- --

इतनी जल्दी टूट गई- -- क्या पैसा पेड़ो पर उगते हैं ?

पापा चश्मा मुझसे टूटा है ! आप दादी को क्यों डाँट रहे हो? नन्ही झुमकी ने कहा ।

माँ तुमने झुमकी को भी बिगाड़ दिया है ,मुँह पर बातें करने लगी है--।

बेटा जाने दे,पैसे तो मेरे ही है, तू पैसों की चिंता क्यों करता है ?

बादल गुस्से से बाहर निकल गया।

एक महीना बीत गया मगर "बादल "को चश्मा बनाने का समय नहीं मिला।

सितारा ने कभी किसी के सामने अपना सर नहीं झूकाया था। वह एक रिटायर्ड बैंक कर्मचारी थी। एक निडर, हँसमुख, जिंदादिल इंसान थी।

मगर अब बुढ़ापा ने उनकी कमर तोड़ कर रख दिया था।

और एक रात चश्मे के बिना ज़मीन पर पड़ी हुई खिलौना को देख नहीं सकी और नीचे गिर पड़ी। पैरों में मोच आ गई थी, रात भर दर्द से तड़पती रही,

सुबह तक पैरों मे काफी सूजन आ गया था।


अस्पताल में डाक्टर ने कहा पैरों की हड्डी टूट गई है, एक महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ेगा।

बहू ने कह दिया वह सेवा नहीं करेगी !

घर में रखने से नर्स का ख़र्चा अलग से लगेगा !

बहुत सोच समझ कर बादल ने माँ को अस्पताल के जनरल वार्ड में भर्ती कर दिया।

बेटा इन मरीज़ों के बीच मेरी तबियत और खराब हो जाएगी। मुझे घर ले चल।

माँ एक महीने की तो बात है, इनके बीच तुम्हें अकेलापन महसूस नहीं होगा।

माँ आज शाम को " चेक "लेकर आऊँगा साइन कर देना, डॉक्टर की फ़ीस और दवाओं के पैसे देने हैं।

बेटा चश्मा बना लाना,साइन के लिए चश्मा जरूरी है। हां माँ हां- --।


शुरू के कुछ दिन जैसे तैसे बीता, फिर धीरे- धीरे सितारा वहां अभ्यस्त होने लगी।

अस्पताल का खाना उससे खाया नहीं जाता था। एक कूत्ता जो वहाँ अक्सर चहलकदमी करता, उसे छुपाकर खाना खिला देती।

शेरू अब सितारा का दोस्त बन गया था। अचानक एक दिन अस्पताल में आग लग गई।

चारों तरफ अफरा तफरी मच गई। लोग अपने परिवार के साथ भागने लगे। चारों ओर चीख पुकार मची हुई थी।

जनरल वार्ड भी धुएँ से भर गया था। सितारा बिस्तर पर लेटी थी। उसे खाँसी आनी शूरू हो गई। उसने उतरने की चेष्टा की पर नाकाम रही।

वह ज़ोर से चीखी पर उसकी चीख लोगों के शोर में दब गई। धीरे- धीरे वह बेहोश हो गई।

जब उसे होश आया तो उसने देखा पूरा वार्ड खाली है, बंद खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी। चारों तरफ चादर, जूते चप्पल बिखरे पड़े हैं।

वार्ड के एक कोने के बिस्तर पर वह पड़ी हुई थी। उसे अपने आप पर तरस आ गया। रोते रोते उसने अपनी आँखें बंद कर ली।

तभी उसे अपने गालों पर कुछ गिला सा, ठंडा सा महसूस हुआ। डर कर उसकी आँखें खुली तो देखा कि" शेरू" उसे चाट रहा था।

वह शेरू से रोते हुए लिपट गई और बोली- ----'

हे भगवान ! "मुझे अगले जन्म में इंसान मत बनाना। "शेरू उसकी बात सुनकर पूछ हिलाने लगा था।



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