Rupa Bhattacharya

Drama


5.0  

Rupa Bhattacharya

Drama


नई शुरुआत

नई शुरुआत

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मोना ऽ ऽ ऽ ----' भीड़ से टकराती मेरी आवाज गुम होती चली गई, मोना ऑटो पकड़ कर जा चुकी थी। मैं मन मसोस कर रह गई।

करीब तीस साल बाद आज मोना को देखा था। गाड़ी में बैठे- बैठे मैं पुराने दिनों में खो गई थी। मोना मेरी सबसे प्रिय सहेली थी। बहुत ही खूबसूरत, नेक दिल और हंसमुख लड़की। हम सहेलियाँ प्रायः उससे कहती " मोना! अपनी खूबसूरती का कुछ अंश हमें भी दे दो, और मोना खिलखिला कर हँस पड़ती। मैं उसे निहारते हुए सोचा करती, इसकी हँसी की 'खनक' और कोयल की" कुक"बराबर है। एक बार मैं बीमार पड़ीं थी, तब खुद के लिखे सभी नोटस उसने मुझे दिये थे। कितने सुकून भरे वे भी दिन थे ! इंटर पास करते ही मोना की शादी तय हो गई थी।

मोना ! तू इतनी जल्दी शादी करेगी??

हाँ ऽ रे , अफसर लड़का मिला है, पापा जी कह रहे थे, हाथ से जाने नहीं देना चाहिए ! कहते हुए मोना शर्मा गई थी। शादी के बाद कुछ दिनों तक पत्रों का आदान-प्रदान होता रहा। स्नातक करते ही मेरी भी शादी हो गई। फिर हम अपनी घर गृहस्थी में मसरूफ़ हो गये, फिर मोना से भेंट नहीं हुई। आज इतने वर्षों बाद भी मैं मोना को पहचान गई थी, वैसी ही दुबली-पतली और छरहरी थी।


मोहतरमा, किन ख्यालों में खोई हुई हो! मुझे जूस मिलेगा या मैं निकल जाऊँ? नवीन जी की तेज आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई। मैं घर पहुँच कर सोफे में बैठते हुए फिर से ख्यालों में खो गई थी!

क्यों जी! अब तो आप रिटायर हो गए हो, क्या लेट होने से अब भी बाॅस की झाड़ पड़ेगी?

सुनो, मुझे "जिम" टाइम से ही जाना है, वरन् मैं भी तुम्हारी तरह घर में बैठे- बैठे 'मटका' बन जाऊँगा!


मम्मी जी, मैं जा रहीं हूँ, पप्पू को दोपहर में ज्यादा सोने मत देना, वरन् रात में वह जाग कर मेरी नींद खराब करता है ! कहती हुई बहु अपने जाॅब पर निकल गई । सारा दिन आठ महीने के पप्पू को अब मुझे ही संभालना था। कितना सोचा था, बहु के आ जाने से गृहस्थी से कुछ छुटकारा मिलेगा, फिर मैं अपनी लेखनी सुचारु रूप से जारी रखूँगी और अपनी अधूरी किताब को जल्द पूरी करूँगी! मगर हाय रे भाग्य ! गृहस्थी की चक्की में मैं और उलझती चली गई। अब "पोते" की बेबी- सिटिग की जिम्मेदारी मुझ पर थी। करीब तीस साल बाद फिर से एक नन्ही जान को संभालना आसान नहीं था! ख्यालों में खोई हुई, मुझे पप्पू की रोने आवाज सुनाई ही नहीं दी, अचानक धड़ाम की आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई, लगा कि पप्पू गिर पड़ा था, गला फाड़े रोये जा रहा था!

जल्दी से उठना चाहा तो कमर में तेज दर्द का अहसास हुआ और दर्द से बिलबिलाकर फिर बैठ गई! किसी तरह तेज दर्द को सहते हुए उठी और लंगड़ाते हुए वहां पहुँची तो देखा पप्पू सही सलामत था, केवल बड़ा सा तकिया उसने नीचे गिरा दिया था।

शाम को जब बहु आई तो मैंने उसे घटना के बारे में बताया, कुछ प्रतिक्रिया न देते हुए कहा कि, कल से बेबी -सिटिंग के लिए एक आया आ जाएगी, आप उसे रख लेना, पैसों की बात मैं उससे कर लूंगी ! कहकर दनदनाते हुए वह अपने कमरे में चली गई। मैं अवाक होकर उसके तेवर देखती रह गई !

रात को नींद नहीं आ रही थी। खुली खिड़की से ठंडी हवाओं का झोंका आम के मंजरों की खुशबू के साथ अंदर प्रवेश कर रहा था। पता नहीं क्यों रात के अंधेरे में आम के पेड़ पर बैठी कोयल कुक पड़ती !

तभी बहु की जोर -जोर से फोन पर बातें करने की आवाज सुनाई दी।

" हाँ माँ बहुत थकी हुई हूँ, यहाँ तो हर काम में मम्मी जी की मर्जी चलती है, घर में पर्दे से लेकर सोफा कवर तक सब उन्हीं की पसंद का है। थोड़ी सी पोते की देखभाल क्या कर लेती है ! उनके कमर में तेज दर्द शुरू हो जाता है!

हाँ माँ, ठीक कह रही हो, मुझे अब यहाँ रहने का मन ही नहीं करता है--।।

कोयल की कुक मुझे खुद की" चीख" प्रतीत होने लगी थी। मैं सोने की कोशिश करने लगी। जगजीत सिंह की गजल की कुछ पंक्तियाँ अनायास याद आने थी ,"नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है।"


सुबह कमर दर्द में और इज़ाफा हो चुका था। मगर मैंने उफ तक नहीं की। आज मैं पप्पू के पास ही बैठी रही। काॅलबेल बजने पर धीरे- धीरे उठकर दरवाजा खोला तो एक आश्चर्य मिश्रित खुशी की अनुभूति हुई ! सामने "मोना " खड़ी थी !

रोहणी, मैंने तुझे ढूंढ ही लिया, कहकर मोना मेरे गले लग गई। बरसों बाद अपनी बचपन की सहेली को देखकर आँखें भर आई थी।

उस दिन जब तक मैं लौट के आती, तुम आगे निकल चुकी थी ! फिर मैं तुझे ढूंढ कर यहाँ आ पहुँची, एक ही सांस में मोना कहती चली गई।

मोना अब अंदर भी आओ, क्या बाहर से ही सब बातें निपटा लोगी ? मोना मुस्कराते हुए अंदर आई। फिर जो हमलोग अपनी पुरानी बातों में मशगूल हुए, हमें समय का होश ही न रहा ! मोना तुम तो पहले जैसी ही दुबली-पतली हो, देखो ! मैं कैसी पहलवान हो गई हूँ ! पहलवान नहीं सेठानी ! कहकर मोना मुस्करा पड़ी।

अच्छा बता, परिवार में सब कैसे हैं ?

मोना कुछ बुझ सी गई थी। पति नहीं रहे, मैं एक आश्रम में रहती हूँ !

क्या मतलब ? ?

मैं बेटा- बहु के साथ नही रहती हूँ ! बेटे ने घर और बैंक-बैलेस के कागजात पर धोखे से साइन करवा लिया था। मेरी जरूरत अब उनको नहीं है।

मैं आश्रम में शाम को बुजुर्गों को रामायण पढ़ कर सुनाती हूँ ।

अचानक पप्पू रोने लगा था, मोना ने मुझे सहारा देकर उठाया और कहा, अपने दर्द को नजर अंदाज़ न कर, किसी अच्छे डाक्टर को दिखा !

देखो न, आज एक आया आने वाली थी, जो अब तक नहीं आई !

वह आ चुकी है रोहणी, तेरे सामने ही खड़ी है !

क्या ऽ ? ?

मैं हतप्रभ मोना को देखने लगी थी !

तुमने ठीक सुना, मैं कुछ घर में बेबी सिटिंग का काम भी करती हूँ। आश्रम में रहने का किराया भी देना पड़ता है।

---ओह!

सच कहूँ ! अगर मुझे पता होता कि ये तेरा घर है, तो मैं नहीं आती! मोना ने सपाट स्वर में कहा।

तू पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं लिखाती है? ऐसे कैसे वे तुम्हें निकाल देंगे?? मैंने कुछ चिढ़ते हुए कहा!

थाने जाने के लिए मन नहीं माना, अपने बेटे की तकलीफ़ एक माँ नहीं देख सकती ! कहते हुए मोना की आँखों में आँसू थे। ठीक है ,खुद का ख्याल रखना,

मुझे अब निकलना चाहिए, कहती हुई मोना चली गई।

शाम को बहु ने आते ही पूछा," मम्मी जी आया आई थी"?

"नहीं", मैंने सपाट होकर कहा।

ये छोटे लोग होते ही ऐसे हैं, बहु ने बिफरते हुए कहा।

अगले दिन सुबह बेटे ने कहा, " माँ तुमसे एक बात कहनी थी---।

हाँ- हाँ कहो न !

माँ मैंने आँफिस के पास एक फ्लैट बुक कराई थी, उसके बगल में बच्चों का क्ररैश भी है। हमें वहां शिफ्ट करने पर तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं होगी? ?

नहीं बेटा, तुमने मेरा रास्ता आसान कर दिया, कुछ सोचते हुए मैं मुस्करा पड़ी।

माँ ऽ तुम और पापा भी हमारे साथ वहीं रहोगे, बेटे ने बहु की तरफ देखते हुए कहा।

हाँ- हाँ क्यों नहीं? आप लोग भी हमारे साथ वहीं रहते तो कितना अच्छा होता !

मैंने मुस्कराते हुए कहा, अरे नहीं बहु, हमलोग यही ठीक है, वरन् तुम अपनी पसंद के परदे और सोफे का कवर कैसे लगा पाओगी?

उनके जाने के कुछ ही देर बाद मैं फोन मिलाकर नंबर मिलाती, फिर फोन रखकर सोच में पड़ जाती !

अरे बाबा ! अब "मोना" को फोन कर भी डालो ! अखबार से नज़रें हटा कर उन्होंने कहा।

हे भगवान! आपने कैसे जाना मैं मोना को फोन करना चाहती हूँ ? मैं अवाक थी---

मोहतरमा ! आपकी मन की बातें मैं नहीं तो कौन समझेगा? उन्होंने मुस्कराते हुए कहा। नंबर मिला कर मैंने कहा, "हेलो मोना, हमारे घर में ऊपर का मंज़िल खाली हो गया है, तुम आश्रम छोड़ कर यहाँ रहना पसंद करोगी ?

मोना प्लीज, रोना बंद करो! फोन पर भी तुम रोती हुई अच्छी नहीं लगती ! चलो हम जीवन में फिर से एक नई शुरुआत करते हैं।

फोन रखकर उनके कंधे पर सिर रख कर मैंने अपनी आँखें बंद कर ली। आंगन वाले आम के पेड़ में बैठी कोयल जोरों से 'कुक ' पड़ी, और मुझे तीस साल पहले की मोना का खिलखिलाना याद आ गया -।



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