Rupa Bhattacharya

Drama


5.0  

Rupa Bhattacharya

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अकेली लड़की (भाग- 2)

अकेली लड़की (भाग- 2)

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शालू थर-थर काँप रही थी, किसी प्रकार गिरती-पड़ती ट्रेन के दरवाज़े तक पहुँची और वहाँ से बाहर कूद गई। ट्रेन स्टेशन पर रूक चुकी थी, और बाहर रौशनी भी थी। प्लेटफार्म पर लोगों की आवाजें नज़दीक आते जा रही थी।

अरेऽ ऽ वह रही शालू, गरिमा की आवाज़ सुनाई दी। ओह दीदी ऽ ऽ शालू जाकर गरिमा से लिपट गई ! क्या हुआ? तू ठीक तो है न ? कितनी बार फोन ट्राई किया है हमने ! माँ फोन पर फोन किये जा रही है, तेरा सामान कहाँ है?

ट्रेन के अंदर, एक युवक गिरा, कहकर शालू गरिमा के हाथों में बेहोश होकर गिर पड़ी।

आनन-फानन में सब उसे लेकर अस्पताल पहुँचे।

होश आने पर गरिमा ने सबके सामने अपनी आपबीती सुनाई ।

मगर शालू, तुम्हारे जीजाजी तो ट्रेन के अंदर सामान लाने गये थे। "वहां कोई भी नही था, और न ही अंदर बारिश का पानी नजर आया।" तुम्हारा छाता भी पर्स के अंदर ही थी।

नही ! दीदी, "ऐसा कैसे हो सकता है "? ? शालू ने उत्तेजित होकर कहा ,वह युवक भाग गया होगा।

मगर तुमने कहा कि वह चोट खाकर वह गिर पड़ा था।

प्लीज मैडम, "आप सब बाहर जाएं। अभी पेशेंट को आराम करने दें। इन्हे ज्यादा सोचने के लिए मजबूर न करे, कहकर डाक्टर ने शालू को एक इंजेक्शन लगा दिया।


घर पहुंच कर शालू नार्मल थी। फूल सी नन्ही को देखकर उसी में मगन हो गई, ऐसा लगा कि वह घटना को भूल चुकी है। गरिमा ने सारी बातें फोन पर अपनी माँ को बताई। चिन्तित माँ ने अगले ही दिन आने की बात कही।

फोन रखकर जैसे ही मुड़ी, सामने घर में काम करने वाले रामू काका खड़े थे।

छोटी मालकिन ! छोटी मुँह बड़ी बात ! एक बात कहूँ ?? हाँ -हाँ रामू काका बोलो क्या बात है?

मगर आपको विश्वास करने में कठिनाई होगी।

बोलो न ! पहेलियाँ न बुझाओ ! कहो क्या बात है? मालकिनी ! अक्सर जब बारिश होती है, इस ट्रेन में अगर कोई "अकेली लड़की" सफर करती है तो ऐसे किसी युवक से मिलने की बात पहले भी सुनी जा चुकी है।

क्या बात कर रहे हो काका ? आज के जमाने में ये सब संभव है क्या ? बेटी, इसलिए मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता था ! ठीक है पूरी बात बताओ काका !

दरअसल तीन साल पहले हमारे गाँव "राजगंजपूर"

में एक युवक और युवती घर से भाग कर दूसरे गाँव के मंदिर में जाकर ब्याह कर लिया था। लड़का और लड़की दोनों की जाति अलग थी, गाँव वालों ने विवाह को स्वीकार नही किया। दोनों अपनी जान बचाने के लिए इसी ट्रेन पर चढ़े थे। कुछ गाँव वाले पीछा करते हुए ट्रेन में चढ़ गए और दोनों ने चलती ट्रेन से कूद कर जान दे दी थी। तभी से अनेक युवतियों का सामना उस युवक से हो चुका है।

ओह माई गाॅड ! गरिमा सर पकड़कर बैठ गई।

रामू काका वहां से जा चुके थे।


गरिमा ने जब अपने पति रितेश को सारी बातें बताई तो उसने डाँट कर गरिमा को चुप करा दिया।

"क्या पागलों जैसी बातें करती हो ? सुनो ,डाक्टर ने बताया है कि शालू को कुछ डिप्रेशन का प्राब्लम है। हमें किसी मनोचिकित्सक से परामर्श लेने होंगे।

अगले दिन शालू खूब खुश थी, और पार्टी एन्जाय कर रही थी । शालू के माँ और पापा भी पहुंच चुके थे। शालू अपने डिप्रेशन की बात मानने को तैयार ही नहीं थी। पार्टी में रितेश के दोस्त डा. नवीन ने शालू से ढेर सारी बातें की जो एक मनोचिकित्सक भी था।

अपने क्लीनिक में उन सबको बुलाकर अलग- अलग पूछताछ भी की। डाक्टर नवीन ने कहा,

"शालू के दिमाग में अत्यधिक प्रेशर है।" दरअसल वह अपने मन की बात किसी से शेयर नहीं करती।

आपने उसके तुलना में गरिमा को हमेशा ज्यादा तव्वजों दी है, क्यों कि गरिमा की शारीरिक सुंदरता उससे अधिक है। शैक्षिक सफलता के बावजूद कुछ हीन भावना उसमें घर कर गई है।

डाक्टर साहब, "दो, तीन जगह उसके विवाह की बात चली थी , मगर उसका सांवला रंग और साधारण कद आड़े आ गया, शालू की माँ ने उदास स्वर में कहा।"

और इसका असर शालू के दिमाग पर भी पड़ा। अकेली रहने और आपके तरफ से कोई सपोर्ट नहीं मिलने के कारण वह कल्पनाओं में जीने लगी, और ये कल्पना हकीक़त बनकर उसके सामने आने लगी है।

घबराइए नहीं, एक महीने तक की दवा दे रहा हूँ, हाँऽऽ एक बात और, अभी उसे कुछ समय के लिए उसे अकेले न छोड़ें। कहकर डाक्टर नवीन दवा का नाम लिखने लगे।

घर पहुंच कर उन लोगों ने देखा शालू ने हंगामा किया हुआ था। गरिमा दौड़ कर आयी और अपनी माँ को लेकर रामू काका के कमरे में गयी

माँ ऽ ऽ ये देखो, "इस तस्वीर वाले लड़के को ही मैंने ट्रेन में देखा था।" शालू ने चिल्लाकर कहा।

शालू की माँ ने देखा, दीवार पर एक तस्वीर टंगी हुई है, जिस पर एक माला झूल रही थी।

गरिमा ने कहा, "सचमुच शालू का दिमाग फिर गया है।" रामू काका, तुम कुछ कहते क्यों नहीं??

छोटी मालकिन दरअसल ये मेरा ही बेटा है, जिसने तीन साल पहले ट्रेन से कूद कर जान दे दी थी।

शालू की माँ अपना सर पकड़ कर बैठ गई, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।


बहुत मुश्किल से शालू अपनी माँ को कुछ दिनों के लिए साथ ले जाने को तैयार हुई थी। सब उन्हें छोड़ने स्टेशन आये थे। शालू की माँ निश्चिंत थी कि अब शालू अकेली नहीं जा रही हैं ! ट्रेन नियत समय पर अपने गंतव्य की ओर रवाना हुई। बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी, शालू की माँ को झपकी आने लगी थी। शालू ईयर फोन लगा कर गाने में व्यस्त हो गई थी।अचानक शालू को सुनाई पड़ा ," क्या यह सीट खाली है ? शालू ने अधखुली आँखों से देखा, सामने एक युवक खड़ा मंद- मंद मुस्कुरा रहा था। शालू ने जवाब न देकर कस के आँखें बंद कर ली थी।

ट्रेन पूरी रफ्तार से दौड़े जा रही थी।



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