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Drama Tragedy Crime


4.0  

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मजबूर

मजबूर

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बारिश के कारण सड़क पर जगह-जगह पानी भरा हुआ था और पानी से भरे हुए ऐसे ही एक गड्ढे में मिस्टर स्वामी खून से लथपथ लगभग मृत पड़े थे। उनसे थोड़ी दूर जहाँ पर बारिश का पानी नहीं था वही पर ही मिसेज स्वामी की लाश भी पड़ी थी। चारों तरफ खून ही खून और इसी खून के तालाब में एक बड़ा खंजर, जिससे की दोनों हत्याएँ की गयी। थोड़ी दूरी पर ही 2 बैग पड़े थे और बैग के नीचे दबा हुआ रेलवे टिकट तेज़ हवा में फड़फड़ा रहा था। हत्यारा आराम से चलते हुए दूर जा चुका था। घटना स्थल से थोड़ी ही दूरी पर एक हवलदार लगभग डरा हुआ सा मौजूद था यदि हवलदार चाहता तो हत्यारे को पकड़ सकता था परन्तु शायद हवलदार उसे पकड़ना नहीं चाहता था या शायद यह भी हो सकता है की हवलदार जरूरत से ज्यादा डर गया हो। कारण चाहे जो भी हो फिलहाल उसने हत्यारे को रोकने की कोशिश नहीं की और हत्यारा उसकी आँखों से ओझल हो गया।

38 वर्ष पहले :

मिस्टर स्वामी आर्य हॉस्पिटल के गलियारे में एक कोने से दूसरे कोने तक किसी परेशानी में घूम रहे थे। मिस्टर स्वामी के चेहरे से उनकी परेशानी साफ़ दिखाई दे रही थी परन्तु यह परेशानी ख़ुशी मिश्रित परेशानी थी। काफी देर से गलियारे में चक्कर लगते लगते मिस्टर स्वामी थक चुके थे और वह नज़दीक पड़े बेंच पर बैठने की सोच ही रहे थे की तभी बंद कमरे का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर बाहर आते दिखाई दिए 

मिस्टर स्वामी : डॉक्टर साहब सब ठीक है 

डॉक्टर : स्वामी जी आपकी पत्नी ने एक बच्ची को जन्म दिया है 

मिस्टर स्वामी : मेरी पत्नी तो ठीक है 

डॉक्टर : जी हाँ आपकी पत्नी बिलकुल ठीक है 

मिस्टर स्वामी : क्या कोई परेशानी है 

डॉक्टर : मिस्टर स्वामी भविष्य मैं आपकी पत्नी प्रेग्नेंट नहीं हो पायेगी यह बच्ची ही आपकी एकमात्र संतान है 

मिस्टर स्वामी : डॉक्टर साहब आपने तो मुझे डरा ही दिया था। भारत मैं हज़ारों दंपति किसी बच्चे को जन्म नहीं दे पाते हमारे पास एक बच्ची है वही बहुत है 

डॉक्टर : आप प्रसन्न है 

मिस्टर स्वामी : बहुत 

डॉक्टर : बधाई 

मिस्टर स्वामी : धन्यवाद 

बच्ची का नाम मनीषा रखा गया। और नामकरण को आज 5 वर्ष बीत चुके है और जैसा की मिस्टर स्वामी ने कहा था वह एकमात्र बच्ची ही उनका जीवन बन गयी। उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं और उन्होंने बच्ची की किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी।

मिस्टर : कल मनीषा का जन्मदिन है जरा राय दो की जन्मदिन कैसे मनाया जाना चाहिए और क्या गिफ्ट दिया जाये 

मिसेज : हर साल जन्मदिन धूमधाम से मानते रहे है। इस बार छुट्टी नहीं है ऐसा करते है की घर पर कल सुबह ऑफिस जाने से पहले केक काट लेते है और मनीषा को कुछ खिलौने गिफ्ट में ला देंगे 

मिस्टर : हां ठीक है इस बार साधारण तरीके से मना लेते है वैसे भी ऑफिस में बहुत टेंशन चल रही है कल सांस लेने की भी फ़ुरसत नहीं है 

मिसेज : गिफ्ट क्या देना है 

मिस्टर : यह डिपार्टमेंट तो तुम्हारा है अपने हिसाब से खरीद लो 

मिसेज : मनीषा का पूरा कमरा खिलौनों से भरा हुआ है बाजार में मिलने वाला हर खिलौना उसके पास है 

मिस्टर : कपड़े दिलवा दो 

मिसेज : कपड़े तो वैसे भी जरूरत से बहुत अधिक है 

मिस्टर : अब यह सब तो तुम देख लो मुझे और बहुत काम है 

मिसेज : चलो ठीक है 

मिसेज स्वामी ने मनीषा के लिए गिफ्ट खरीद लिया और अगली सुबह केक काटने के बाद जब मनीषा ने गिफ्ट खोला तो उसे पसंद नहीं आया उसका चेहरा उतर गया। और जब उसे पता चला की आज घूमने भी नहीं जा सकेंगे क्योंकि पापा को ऑफिस में जरूरी काम है तो मनीषा ने पूरा घर सर पर उठा लिया। इतना जबर्दस्त हंगामा हुआ की आखिर मिस्टर & मिसेज स्वामी मनीषा को घुमाने शहर से बाहर बने वाटर पार्क में ले गए। मिस्टर स्वामी के ऑफिस में महत्वपूर्ण मीटिंग नहीं हो पायी नतीजा उन्हें लाखों का नुक्सान उठाना पड़ा। इस सब के बावजूद मनीषा के चेहरे पर उमड़ी ख़ुशी के लिए मिस्टर शर्मा कोई भी नुक्सान उठाने के लिए तैयार थे।

इसी तरह के माहौल में 10 साल गुजर गए। इन दस सालों में मिस्टर स्वामी ने अपने व्यापार में बहुत तरक्की की और मनीषा उसने भी स्कूल मैं बहुत अच्छा परफॉर्म किया। अपनी हर परीक्षा में उसने टॉप किया खेल कूद में भी आगे रही। मिस्टर & मिसेज स्वामी उससे बहुत प्रसन्न थे। मनीषा के टीचर्स भी उसकी तारीफ करते थे। मनीषा में वह सब कुछ था जो माँ बाप अपने बच्चे में चाहते है। परन्तु सब सफ़ेद नहीं था मनीषा के चरित्र में एक काला धब्बा भी था। मनीषा वक़्त के साथ ज़िद्दी होती जा रही थी उसकी हर सफलता उसे और ज़िद्दी बना रही थी। मिस्टर & मिसेज स्वामी मनीषा के चरित्र के इस काला पक्ष को देखते थे परन्तु बच्ची समझ कर नज़रअंदाज़ करते रहे और फिर मनीषा मिस्टर & मिसेज का पूरा संसार थी।

आज मनीषा का बोर्ड का रिजल्ट आने वाला था , मनीषा निश्चिंत थी उसे खुद पर भरोसा था। मिसेज & मिस्टर स्वामी भी निश्चिंत थे। जहाँ अन्य छात्रों के माँ बाप अखबार के इंतज़ार में बेचैन थे वहीँ मिस्टर & मिसेज मात्र उत्सुकता थी। आखिर अखबार आ गया और मिस्टर स्वामी ने रोल नंबर देख कर मनीषा का नाम मेरिट में आने की घोषणा भी कर दी। हमेशा मनीषा टॉप करती रही थी इस बार भी किया परन्तु इस बार बोर्ड एग्जाम थे इसीलिए बढ़िया पार्टी और बढ़िया गिफ्ट पर मनीषा का हक था। उसी शाम मोहल्ले वालों और स्कूल के दोस्तों को सम्मिलित की पार्टी का आयोजन किया गया। उसी पार्टी में बढ़िया डिनर में एक तरफ खड़े हुए मनीषा और उसके पापा बातचीत कर रहे थे।

मिस्टर स्वामी : बेटा खुश हो 

मनीषा : नहीं 

मिस्टर स्वामी : क्यों कहाँ कमी रह गयी 

मनीषा : मुझे इलेक्ट्रिक स्कूटी नहीं ज्यादा पावर इंजीन के साथ मोटर साइकिल चाहिए थी 

मिस्टर स्वामी : उसके लिए तुम अभी छोटी हो ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं बनेगा अभी तुम्हारा 

मनीषा : कौन पूछता है ड्राइविंग लाइसेंस को ?

मिस्टर स्वामी : हो सकता है ट्रैफिक पुलिस मुझसे प्रभावित हो और तुम्हें न रोके परन्तु मुझे तो देखने की जरूरत है की तुम किस काबिल हो।

मनीषा : मैं अपना ख्याल खुद रख सकती हूँ 

मिस्टर स्वामी : तुम्हारा ख्याल रखना हमारा काम है 

उस वक़्त मनीषा ने कोई जवाब नहीं दिया और अगले दिन से ही वह स्कूटी का इस्तेमाल करने लगी। तकरीबन दो महीने बाद ही एक शाम स्कूटी चोरी हो गयी और बहुत प्रयास के बाद भी नहीं मिल पायी। तब इंश्योरेंस क्लेम से मिले पैसे और साथ में कुछ और पैसे मिलकर नयी स्कूटी दिलवा दी गयी। मनीषा ने एक बार फिर ज्यादा पावर की बाइक लेने की डिमांड रखी परन्तु मिस्टर स्वामी ने डिमांड स्वीकार नहीं की और एक बार फिर स्कूटी ले ली गयी। तकरीबन 2 महीने बाद ही नयी स्कूटी का एक्सीडेंट हो गया। मनीषा पूरी तरह सुरक्षित थी। जाँच पड़ताल करने पर मिस्टर स्वामी ने जाना की एक्सीडेंट हुआ नहीं जानबूझ किया गया था।

मिस्टर स्वामी : मनीषा एक्सीडेंट कैसे हुआ 

मनीषा : वह मैं सड़क पर जा। ........ 

मिस्टर स्वामी : सच बोलो 

मनीषा : रोड रोलर वाले को 1000 रुपये देकर स्कूटी पर चलवा दिया 

मिस्टर स्वामी : और पिछली स्कूटी कैसे चोरी हुई 

मनीषा : उसे नदी में फेंक दिया 

मिस्टर स्वामी : क्यों 

मनीषा : मुझे ज्यादा पावर का मोटर साइकिल चाहिए स्कूटी नहीं 

मिस्टर स्वामी : हर इच्छा करने की एक उम्र होती है जब तुम्हारी उम्र मोटर साइकिल चलाने लायक होगी तुम्हें मोटर साइकिल भी दिलवा देंगे 

मनीषा : नहीं पापा मुझे अभी चाहिए 

मिस्टर स्वामी : इस वक़्त तुम्हारी उम्र स्कूटी के लायक है और तुम्हे मैं एक नयी स्कूटी दिलवा सकता हूँ परन्तु उसके लिए तुम्हे अपनी पुरानी गलतियों के लिए माफ़ी मांगनी होगी और दुबारा ऐसी गलती नहीं करोगी ऐसा वादा भी करना होगा।

मनीषा : नहीं मुझे स्कूटी नहीं चाहिए मुझे मोटर साइकिल चाहिए 

मिस्टर स्वामी : ठीक है अब तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा बस से स्कूल जाना 

मनीषा : मैं खाना नहीं खाऊँगी 

मिस्टर स्वामी : ठीक है एक वक़्त खाना नहीं खाना सेहत के लिए ठीक ही है।

मनीषा : क्या (आश्चर्य चकित होती है )

मिस्टर स्वामी : जब माफ़ी मांगने और आगे से ग़लती न करने का वादा करने का मन बना लो तो बता देना फिर हम बातचीत करेंगे नयी स्कूटी के बारे मैं 

मिस्टर स्वामी : अब तुम अपने कमरे में जाओ और अपनी गलतियों के बारे में सोच विचार करो 

इसके बाद मनीषा अपने कमरे में चली गयी और लगा की लाइफ सामान्य हो गयी परन्तु अगले दिन शाम को जब मिस्टर स्वामी ऑफिस से वापिस आये तब उन्होंने जाना की मनीषा ने पिछले 24 घंटो से खाना नहीं खाया है और मोटर साइकिल लेने की ज़िद्द कर रही है। मिस्टर स्वामी ने मनीषा की ज़िद्द बहुत दफा पूरी की थी परन्तु इस बार मनीषा की डिमांड उसकी उम्र के लिहाज़ से उचित नहीं थी इसीलिए मिस्टर स्वामी ने ध्यान नहीं दिया। मनीषा ने उस रात भी खाना नहीं खाया 

अगली सुबह मनीषा की तबियत बिगड़ गयी और उसे हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया। हॉस्पिटल में भी मनीषा ने खाना खाने से इंकार कर दिया। मिस्टर & मिसेज स्वामी की मनीषा के साथ लम्बी बहस हुई और आखिर में हारकर मिस्टर स्वामी को मनीषा को नयी ज्यादा पावर की मोटर साइकिल ले कर देनी पड़ी।

यह अंत नहीं बल्कि शुरुआत साबित हुई मनीषा को नया हथियार मिल गया अपनी मांगे मनवाने का और मिस्टर & मिसेज स्वामी मनीषा के सामने लगातार हारते चले गए। हर बार मनीषा कोई डिमांड करती या तो उसकी डिमांड तुरंत पूरी हो जाती या फिर 1 वक़्त भूखे रहने के बाद पूरी हो जाती। इसी तरह 5 और साल गुजर गए।

मनीषा का ग्रेजुएशन पूरा हो गया था। मनीषा लगातार मेरिट में आ रही थी परन्तु उसके सामने कोई लक्ष्य नहीं था उसे नहीं पता था की वह क्या बनाना चाहती है। उसके सामने सिर्फ इतना स्पष्ट था की उसके पिता के पास बहुत धन है और उसकी हर जरूरत पूरी होती है। इसी लक्ष्यहीन ज़िंदगी में मनीषा ने पोस्ट ग्रेजुएशन में एडमिशन ले लिया और अब पोस्ट ग्रेजुएशन का आखिरी साल चल रहा था और मनीषा को एक नयी इच्छा पैदा हुई फिल्म एक्ट्रेस बनने की। मनीषा ने अपने कॉलेज के दोस्त रविन्द्र से बात की जो कि नाटक वगैरह में डायरेक्टर का काम किया करता था।   रविंद्र भी फिल्म डायरेक्टर बनना चाहता था परन्तु फिल्म के लिए प्रोड्यूसर मिलना आसान नहीं था। मनीषा निश्चिंत थी क्योंकि उसे पता था की मिस्टर स्वामी फिल्म में इन्वेस्ट करेंगे फिर चाहे इच्छा से करे अथवा अनिच्छा से।

मिस्टर स्वामी की अच्छे व्यक्ति थे और उनकी परवरिश गाँव में हुई थी। उनकी नज़र में फ़िल्मी कारोबार अनैतिक था इसलिए मनीषा की ज़िद्द पूरी नहीं हो सकी। मनीषा ने 3 दिन तक खाना नहीं खाया इसके बावजूद मिस्टर स्वामी फिल्म प्रोडूस करने के लिए तैयार नहीं हुए।

आज चौथा दिन था और मनीषा ने कुछ नहीं खाया था और चिंता की बात थी की सुबह सवेरे ही मिस्टर स्वामी का सन्देश उसे मिल चुका था। सन्देश स्पष्ट था। मनीषा हार चुकी थी परन्तु वह अपनी हार स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। उसे नए हथियार की जरूरत थी। नींद की गोलियां एक नए विकल्प (हथियार) के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बनी। उसी रात मनीषा ने नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने का प्रयास किया। मनीषा ने सिर्फ उतनी गोलियां खाई जिससे की उसकी जान को कोई खतरा न हो सिर्फ तबियत ख़राब हो और उसे हॉस्पिटल मैं भर्ती होना पड़े। मनीषा ने पोस्ट ग्रेजुएशन भी मेरिट में पास किया और उसके 3 महीने बाद ही वह फिल्म भी रिलीज़ हुई जिसमे मनीषा ने एक्ट्रेस की भूमिका निभाई थी और मिस्टर स्वामी ने जिसे प्रोडूस किया था।

रविंद्र बहुत बढ़िया डायरेक्टर साबित हुआ। फिल्म का डायरेक्शन वास्तव में बहुत बढ़िया हुआ था। रविंद्र को कई बड़े प्रोडूसर्स ने अपने प्रोडक्शन हाउस की फिल्म के लिए डायरेक्टर के तौर पर साइन किया उसका फ़िल्मी कैरियर चल निकला। फिल्म फ़्लॉप हो गयी और मनीषा ने एक्ट्रेस के तौर पर किसी को प्रभावित नहीं किया बल्कि फिल्म से सिर्फ इतना साबित हुआ की मनीषा का एक्टिंग से उतना ही लेना देना है जितना की गधे का हवाई जहाज से। मनीषा ने और कोई फिल्म नहीं की।

मनीषा की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी फ़िल्मी कैरियर पर ब्रेक लग चुका था और आगे क्या करना चाहिए यह स्पष्ट नहीं था। दूसरी तरफ मिस्टर & मिसेज स्वामी भी मनीषा से तंग आ चुके थे। आगे क्या करना चाहिए स्पष्ट नहीं था तो सोचा गया की चलो मनीषा की शादी ही कर दी जाये। क्योंकि मनीषा को भी आपत्ति नहीं थी इसीलिए लड़के की तलाश शुरू कर दी गयी। मिस्टर & मिसेज स्वामी अपने हिसाब से लड़के की तलाश कर रहे थे। मिस्टर & मिसेज स्वामी जानते थे की मनीषा का किसी अन्य परिवार मैं रह पाना मुश्किल है इसीलिए वह चाहते थे की कोई ऐसा लड़का तलाश किया जाये जो शादी के बाद उनके साथ आकर रह सके। मनीषा अपने हिसाब से लड़के की तलाश कर रही थी मनीषा चाहती थी पूर्ण आजादी अपने माता पिता से पूर्ण आजादी।

आखिर में मनीषा ने एक ऐसे लड़के को शादी के लिए चुना जिसका खुद का ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस था और शहर में वह अकेला ही रहता था। अच्छा मुहूर्त देख कर मनीषा और अभिनव की शादी भी हो गयी। शादी के वक़्त सभी खुश थे मिस्टर & मिसेज स्वामी थोड़े चिंतित परन्तु खुश थे।

शादी के 5 दिन बाद अभिनव को अपने बिज़नेस के लिए शहर से बाहर जाना था उसका 1 सप्ताह का टूर था। मनीषा चाहती थी की अभिनव ना जाये और घर पर ही रहे परन्तु अभिनव के लिए यह संभव नहीं था। उसका ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस अच्छा चल रहा था परन्तु नया था। अभी बिज़नेस को देखभाल की जरूरत थी और अभिनव बिज़नेस के मामले में खुद के अलावा किसी और पर भरोसा नहीं करना चाहता था। अभिनव ने अपना सामान पैक किया और जाने की लिए तैयार हो गया। जब अभिनव मनीषा से इजाज़त लेने गया तब मनीषा ने उसे इजाज़त नहीं दी बल्कि स्पष्ट कह दिया की यदि अभिनव ने घर से बहार कदम रखा तो वह आत्महत्या कर लेगी। अभिनव ने इसे मज़ाक समझा और वह अपना सामान उठा कर घर से बाहर आ गया।

गाडी मैं बैठने से पहले जब अभिनव ने पलट कर देखा तो मनीषा बालकनी में खड़ी थी उसने रिवाल्वर अपनी कनपटी पर रखा हुआ था और धमकी स्पष्ट थी। अभिनव का एक पैर गाड़ी में और दूसरा बाहर था वह कशमकश में थे और मनीषा ने अपनी धमकी की तीव्रता बढ़ाने के लिए रिवाल्वर पर पकड़ और मजबूत कर ली। इस रस्साकशी में गोली चल गयी और मनीषा की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गयी।

   आत्महत्या की खबर बहुत तेजी से फैली और मिस्टर & मिसेज स्वामी के साथ पुलिस पत्रकार एवं कई अन्य प्रभावशाली लोग भी घटना स्थल पर आ चुके थे। अभिनव को दहेज़ हत्या के आरोप में जेल भिजवा दिया गया। अगले दिन अभिनव के माँ बाप और बहन को उनके गांव से गिरफ्तार कर लिया गया। मिस्टर & मिसेज स्वामी बहुत गुस्से में थे उन्होंने अभिनव एवं उसके परिवार सजा करवाने की स्पस्ट धमकी दे दी। मिस्टर स्वामी ने बहुत तेजी से कार्य किया और कई समाज सेवी संस्थाओं को अपने साथ जोड़कर पुलिस एवं प्रशासन पूरा प्रेशर क्रिएट कर दिया। रोड शो, गयापन , जनसभाएं की गयी , मीडिया का इस्तेमाल भी किया गया। अभिनव के चरित्र को पूरी तरह से तहस नहस कर दिया गया नतीजा जो लोग अभिनव के दोस्त कहलाने में गर्व महसूस करते थे अब अभिनव की छाया से भी दूर भागने लगे। यहाँ तक की अभिनव की बहन के चरित्र पर भी कीचड़ उछाला गया। अभिनव की बहन का नाम कई लड़कों के साथ जोड़ दिया गया। परिणाम स्वरुप लम्बे समय तह अभिनव एवं उसकी बहन की जमानत नहीं हो सकी। अभिनव की जमानत तकरीबन 3 साल बाद ही हो पायी।

   मुकदमा तकरीबन 10 साल चला। मनीषा के माता पिता ने कोई कसर नहीं छोड़ी अपने सभी संपर्क इस्तेमाल किये इसके बावजूद अभिनव एवं उसके परिवार खुद को निर्दोष साबित करने में कामयाब रहा और उनको बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। परन्तु इन 10 सालों मैं अभिनव की दुनिया बदल चुकी थी। अभिनव के माँ बाप की मृत्यु हो चुकी थी। अभिनव का ट्रांसपोर्ट का व्यापार खत्म हो चुका था। व्यापार को दोबारा खड़ा कर पाना लगभग असंभव था क्योंकि लोग कोर्ट से बरी होने बाद भी अभिनव को दोषी मानते थे और उससे दूर रहना चाहते थे। अभिनव की बहन एक प्राइवेट ऑफिस में मामूली वेतन पर कार्य कर रही थी। अभिनव की बहन का सपना था IAS बनना वह इसके काबिल भी थी जिस वक़्त उसे गिरफ्तार किया गया वह IAS का एग्जाम क्लियर कर चुकी थी और इंटरव्यू की तैयारी कर रही थी। परन्तु गिरफ़्तारी ने सब कुछ बदल दिया।

लम्बे समय तक अभिनव की जमानत नहीं हो सकी और तकरीबन 3 साल तक जेल में रहना पड़ा। इस तीन सालो में मनीष की मित्रता शरीफ लोगों से नहीं बल्कि गुंडे बदमाशों से हुए और जब अभिनव जमानत पर जेल से बाहर आया तब अभिनव वह पहले वाला शरीफ अभिनव नहीं रह गया था।

   अभिनव सुलझे हुए विचारों का आधुनिक नौजवान था। ज़िंदगी के प्रति उसका नज़रिया सकारात्मक था और वह कानून की इज़्ज़त करता था। उसकी नज़र में अदालतों का काम न्याय प्रदान करना था। जब अभिनव जमानत पर जेल से बाहर आया तब तक उसके विचारों में क्रन्तिकारी परिवर्तन आ चुके थे। उसकी समझ में आ चुका था की जिस कानून (दहेज़हत्या) के तहत उसे गिरफ्तार किया गया है उस कानून का सच से कोई लेना देना नहीं है बल्कि उसे अपराधी मान लिया गया है क्योंकि उसकी शादी को अभी सात वर्ष नहीं हुए थे (यदि शादी के 7 वर्ष के अंदर किसी की पत्नी आत्महत्या कर ले या अप्राकृतिक कारणों से उसकी मृत्यु हो जाये तब पति परिवार को दहेज़हत्या का अपराधी मान लिए जाने का प्रावधान 304 बी में है)। लिहाज़ा कानून एवं अदालतों के प्रति अभिनव का नज़रिया पूरी तरह से बदल गया।

अभिनव की नज़र में वास्तविक दोषी मिस्टर & मिसेज स्वामी थे जिन्होंने मनीषा की परवरिश अच्छे तरीके से नहीं की और उसकी जायज एवं नाजायज मांगों के आगे सर झुकाते रहे। मिस्टर & मिसेज स्वामी के कारन ही मनीषा के दिमाग में यह बात घर कर गयी थी की आत्महत्या की धमकी देकर वह कुछ भी करवा सकती है। और अभिनव एक ऐसे अपराध की सजा में जेल में था जो उसने किया भी नहीं था। जेल से आने के बाद अभिनव ने वही किया जो करना वह अपना मकसद बना चुका था। अदालत से बाइज़्ज़त बरी होने तक अभिनव शांत रहा। अदालत से बरी होने के बाद अभिनव ने मिस्टर & मिसेज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और हर जायज एवं नाजायज तरीके का इस्तेमाल करते हुए मिस्टर स्वामी का बिज़नेस अपने कब्ज़े में कर लिया।

मिस्टर & मिसेज स्वामी अच्छी तरह समझ चुके थे की वह अभिनव के खिलाफ जंग हार चुके है। काफी सोच विचार के बाद मिस्टर & मिसेज स्वामी ने तय किया की उन्होंने मनीषा की मृत्यु के लिए अभिनव को जिम्मेदार मानते हुए उस पर दहेज़हत्या के जो आरोप लगाए वह उचित नहीं था और अब अभिनव से पीछा छुड़ाने का एकमात्र तरीका जो वह मांग रहा है उसे दे दिया जाये और वह दोनों हरिद्वार जाकर अपना बाकी वक़्त गुजारें। इस तरह मिस्टर स्वामी के व्यापार पूरी तरह अभिनव के सुपुर्द हो गया और अभिनव ने व्यापार का स्वामित्व अपनी बहन को सौंप दिया स्वयं को हर तरह की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त कर लिया।

   आज मिस्टर & मिसेज स्वामी हरिद्वार जाने के लिए स्टेशन की तरफ जा रहे थे और मनीष एक बड़े खंज़र के साथ उनका इंतज़ार कर रहा था। मनीषा की आत्महत्या के लिए अभिनव मिस्टर & मिसेज स्वामी को वास्तविक दोषी मानता था और कानूनी तौर पर उन दोनों को कोई सजा संभव नहीं थी फिर भी किसी न किसी को तो उन्हें सजा देनी ही थी।


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