Kumar Vikrant

Drama


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Kumar Vikrant

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मिलन

मिलन

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गुलफाम नगर के सुदूर कोने में स्थित बगिया रेस्त्रां लगभग खाली सा था कारण; शाम के छह बज चुके थे और डिनर टाइम अभी दूर था। रेस्त्रां की कुछ टेबल्स मनचले लड़कों ने हथिया रखी थी जो कोने की टेबल पर बैठी अकेली लड़की को देख आपे से बाहर हुए जा रहे थे। लेकिन लड़की अपने मोबाईल पर किसी से बाते करने में व्यस्त थी और लड़कों को देख कर भी अनदेखा कर रही थी।

रुपेश पूरे दिन होली का हुड़दंग करने के बाद बगिया रेस्त्रां में पैर रखते ही समझ गया था कि कोने की टेबल बैठी लड़की लैला ही थी, उसकी फेसबुक प्रोफ़ाइल फोटो से उसकी शक्ल बिलकुल अलग लग रही थी; लेकिन पक्का करने के लिए उसके पास जाना जरूरी था। जैसे ही वो उस टेबल के पास पँहुचा वो लड़की मोबाईल फोन को टेबल पर रखते हुए बोली, "कितनी बार बताना पड़ेगा कि मैं अपने दोस्त का इंतजार कर रही हूँ, जब वो आ जायेगा तो खुद ही आर्डर करेगा; और अगर मेरे बैठे रहने से इतनी ही परेशानी है तो जा एक कप कॉफी ले आ।"

रुपेश ये सोच कर घबरा गया था कि वो लड़की उसे रेस्त्रां का वेटर समझ बैठी थी, अब उसे कुछ संदेह हो रहा था कि कहीं वो गलत लड़की के पास तो नहीं आ गया। अपना शक दूर करने के लिए बोला, "तुम लैला हो?"

उसकी बात सुनते ही लड़की भड़क उठी और चिल्ला कर बोली, “वेटर के बच्चे लैला बोला मुझे, बहुत हिम्मत हो गई है, भागता है यहाँ से या जूती निकाल कर तुझे ही लैला बना दूँ।"

लड़की का रौद्र रूप देख कर रुपेश सिर पर पैर रख कर भागा और रेस्त्रां के लॉन की कोने वाली टेबल पर लगभग छिप कर बैठ गया।

५३ वर्षीय रुपेश शरीर से थोड़ा सा उम्रदराज भले ही हो गया था लेकिन आज भी खुद को जवान समझता था। वो जवान दिखने के लिए हर तरकीब करता था, लेकिन रंगे हुए उसके बाल, चेहरे पर मेकअप के नीचे छिपी झुर्रिया उसकी उम्र की चुगली कर ही देती थी। किसी ने कहा कि जवान महसूस करना है तो युवा लोगो की संगत में रहा करो तो उसने फेसबुक पर अपनी तीस साल पुरानी फोटो को प्रोफ़ाइल में लगाकर फेसबुकिया छोरे-छोरियों में शामिल होने की कोशिश करने लगा। 

एक साल पहले जब लैला ने जब उसे फ्रेंडशिप रिकवेस्ट भेजी तो वो उसका प्रोफ़ाइल फोटो देख कर खुशी के मारे पागल सा हो गया और एकदम फ्रेंडशिप स्वीकार कर ली। तत्काल लैला का थैंक्स मैसेज आ गया और उसके बाद शुरू हुआ मैसेंजर पर अनगिनत बातों का सिलसिला। पता लगा लैला गुलफाम नगर की ही रहने वाली थी लेकिन फ़िलहाल बंगलौर की कॉन यूनिवर्सिटी में ‘एन्सिएंट ठग्स,’ पर रिसर्च कर रही थी। 

बाते करते-करते जब लैला के फोन का बैलेंस खत्म हो जाता तो रुपेश तत्काल उसके फोन को रिचार्ज कर देता ताकि बातों का सिलसिला चलता रहे, जो बातें पहले सभ्यता के दायरे में होती थी वो अब असभ्यता के भी दायरे लांघने लगी थी। अचानक लैला के बैंक अकाउंट को किसी बदमाश ने हैक करके उसकी साल भर की फीस चुरा ली तो रुपेश ने तत्काल लैला के बताए अकाउंट में तीस-तीस हजार कर कुल नब्बे हजार डिपॉजिट करा दिए ताकि उसकी पढाई में किसी बात की रुकावट न आये।

इस दोस्ती में कई बार उसकी पत्नी रूपी बाधा ने दिक्कतें खड़ी की लेकिन पत्नी की आँखों में धूल झोक कर वो लैला के साथ प्रेम की पींगे बढ़ाता रहा। 

अब रुपेश लैला से मिलना चाहता था; रुपेश ने लैला से मिलने की बहुत जिद की लेकिन जब लैला नहीं मानी तो रुपेश ने समझाया कि वो उससे होली की शाम को मिल ले, उस दिन वो उसकी कॉलेज फीस की आखिरी किश्त भी दे देगा और उनका होली मिलन भी हो जायेगा।

जैसे-जैसे वक़्त गुजर रहा था रूपेश बेचैन होता जा रहा था, अँधेरा हो चुका था और लैला का फोन भी नहीं लग रहा था। उसे लैला से मिलने और उसे बहकाने के सारे प्लान फेल होते नजर आ रहे थे। वो उठ कर चलने वाला ही था कि अचानक उसके मोबाईल फोन की घंटी बजी और फोन की स्क्रीन पर लैला का निक नेम स्वीटी चमक उठा। फोन पर बात करने पर पता लगा कि रेस्त्रां में लैला का कोई परिचित बैठा था इसलिए वो रेस्त्रां के अंदर नहीं आ रही थी, लैला ने उसे बाहर आने को कहा ताकि वो उसके साथ किसी और जगह चल सके। 

रुपेश ख़ुशी से उछलता बाहर आया और लैला के कहने के अनुसार वो रेस्त्रां की पार्किंग में पहुँचा, लेकिन पार्किंग तो उजाड़ पड़ी थी। वो लैला को फोन करने ही वाला था तभी वातावरण में लैला की मधुर आवाज गूँज उठी, “इधर झाड़ियों के पीछे आ जाओ रुपेश जी।"

रुपेश लगभग दौड़ता हुआ पार्किंग में खड़ी उस झाडी के पीछे पहुँचा। झाड़ी के पीछे तीन हट्टे-कट्टे मुस्टंडे खड़े थे, उनमें से एक दाढ़ी बढ़ाये हुआ था और शरीर के डील-डौल से बिलकुल भालू लग रहा था। तभी उस भालू नुमा मुस्टंडे के मुंह से लैला की मधुर आवाज निकली, "आओ रुपेश डार्लिंग।"

रुपेश उस भालू नुमा मुस्टंडे को देख कर हक्का-बक्का था जिसने उसे लैला बनकर ठग लिया था। उसने पार्किंग से रपट लेना उचित समझा लेकिन तभी बाकी दो मुस्टंडो ने उसे दबोच लिया और उसे खींच कर रिवाल्वर की नोक पर भालू नुमा मुस्टंडे के पास ले गए। 

भालू नुमा मुस्टंडा उसकी गिरेबान पकड़ते हुए लैला की आवाज में बोला, "रुपेश डार्लिंग मेरे कॉलेज की फीस तो देते जाओ।"

रिवाल्वर के डर से रुपेश ने चुपचाप तीस हजार निकाल कर भालू नुमा मुस्टंडे के हवाले कर दिए। 

"मजा नहीं आया लड़कों, इस मजनूं की कुछ सेवा तो हुई ही नहीं अभी तक।" भालू नुमा मुस्टंडा अपनी असली और बहुत ही कर्कश आवाज में बोला।  

इसके बाद तीनों मुस्टंडे रुपेश पर टूट पड़े और जबरदस्त तरीके से उसकी पिटाई करने लगे। रुपेश की चीख-पुकार पूरे वातावरण में गूँज उठी और रेस्त्रां से निकल कर कुछ लोग पार्किंग में आने लगे। लोगों को आते देख मुस्टंडो ने रुपेश को एक-एक लात और मारी और भाग कर अँधेरे में गायब हो गए।


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