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DR ARUN KUMAR SHASTRI

Inspirational


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DR ARUN KUMAR SHASTRI

Inspirational


महिला मंडन

महिला मंडन

4 mins 197 4 mins 197

परिवर्तन का दौर है। अब नारी की हर स्पर्धा पुरूष के साथ है। उसका ये भाव अब जड़ पकड़ गया है कि जो काम पुरूष कर सकता और वह भी वो सब कर सकती है।

लेकिन परिवार में या ससुराल में वो असहाय महसूस करने लगी है खास तौर पर जब उसको पुरुष मानसिकता से टकराना या द्वंद करना पड़ता हो।

रीता अधिक तो पढ़ी लिखी थी नही हाँ इत्ती कम भी नही थी पारिवारिक माहौल के रूप से उसने जैसे तैसे 12 वी की थी फिर लड़ लड़ कर कॉमर्स से फिर बी ए सैकिंड ईयर में थी तो उसके लाख मना करने के बाद भी , शादी करदी गई , बहुत असहाय महसूस करती है अपने को अधूरी पढ़ाई छूटने के कारण। वो शादी करना ही नही चाहती थी लेकिन क्या करती बाबा की जिद्द के आगे एक न चली।

अभी तक अपने आपको एडजस्ट नही कर पाई थी जबसे रमेश के घर आई थी। 

शादी से पहले वो औरत के घरेलू कार्यों को औरत की दैनिक कार्यवाही रूटीन का हिस्सा मानती थी क्योंकि तब उनके अर्थात उसकी माँ व उसके सभी किये गए कार्य का सम्मान मिलता था भाई बाबा उनकी इच्छाओं का आदर करते थे और उनके हर छोटे बड़े काम को मान देते थे प्रेम देते थे यहां तक की अपने काम के लिए उनकी अनुनय विनय भी करते थे जब जब वो ऐसे समय कहीं और व्यस्त हो या मन न हो उस समय उस कार्य के लिए।

लेकिन रमेश के साथ रहते हुए उसे एक पल भी ये भाव नही दिखा। न जाने किस गुरुर में रहता था। औरत का सम्मान क्या होता है ये तो उसने सीखा ही नही था। किसी भी परिवार का काम एक महिला के बिना चलाना लगभग असंभव होता है वो भी एक परिवार में एक औरत के द्वारा पैदा हुआ परवरिश किया गया था आज भी एक औरत ही उसका घर सम्भालती है उसे तो पानी तक नही लेना पड़ता उठ कर। 

जब जब उसने रमेश से उक्त सम्बन्धी  विषय पर बात करनी चाही उसने एक तरह से लताड़ दिया।

अब दोबारा उसकी हिम्मत नहीं के उससे तिरस्कृत हो।

गृह स्वामी व गृह स्वामिनी दोनों एक गाड़ी के बराबर के महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं तो ही घर चलता है 

नारी के द्वारा घर के किये जाने वाले दैनिक कार्यों का अच्छा विस्तृत वर्णन किया जा सकता है यदि पति उसके इन कार्यों की अनदेखी या उपेक्षा करता है तो पत्नी को इस पीड़ा से निकालने के समाधान बहुत हैं यदि थोड़े से विवेक का इसमें मिश्रण हो जाये तो औरत का ये काम भी हताशा से  सार्थक परिणाम में परावर्तित हो सकता है।

रीता अब ऐसे ही विकल्प ढूँढ रही थी।

और उसने अपने भाई की मदद से उन पर कार्य करना भी शुरू कर दिया था।

एक दिन छोड़ वो जानबूझकर घर के कार्यों को लटकाने लगी थी। पत्नी धर्म के रूप में जिस कारण वो अपने को उपयोग की वस्तु समान देखने लगी थी। तो उसने इनकार को चालाकी से उपयोग करना सीख लिया था।अपने आप को सोशल मीडिया से जोड़ लिया था। 

रमेश को उसके व्यवहार में परिवर्तन दिखाई दे रहा था लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे झल्लाहट तो थी उसके मन मे साथ खिन्नता भी थी। करे तो क्या करे  वाला सवाल भी था।

एक दिन उसने अपनी भाभी से फोन पर इस बात पर चर्चा की तो उसकी समझ मे आया।

यूँ वो पागल तो था नही बस पुरुष के मिथ्या अहंकरिक भाव से भरा था।

उसने उस भाव को नीचे लाते हुए रीता को घुमाने ले जाने का निर्णय लिया।

उस महोल में उसने उसको टटोलने की कोशिश की।

लेकिन सब व्यर्थ। रीता अब काफी आगे जा चुकी थी 

उसने अपना सम्मान रमेश के हाँथ में रखने के बजाए कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया रहा।

भाई के सुझाये तरीके से आज वो घर से काम करते हुए अपना बैंक बैलेंस भी बना चुकी थी।

रमेश फिर से अपनी दिखावटी पौरुष गुरुता में चला गया था।जो कि उसकी मौलिक अवस्था थी

पति पत्नी का रिश्ता औपचारिक रूप से निर्बाध जारी था। जिसको प्रैक्टिकली रीता ने निर्बाह करना सीख लिया था। उसने अपने अधिकार इच्छाएं सब अपने कंट्रोल में ले लिए थे। अब उसका मन खिन्नता से कोसों दूर था आज वो 2 बेटों की माँ है और समाज में एक व्यस्त व्यवसायी उद्यमी। ये कमल था work to home कार्यकुशलता था। 


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