मेरी ईर्ष्या
मेरी ईर्ष्या
बचपना कह लो या फिर ईर्ष्या ....हुई थी मुझे भी पहली बार, जब मैं देखती थी कि मेरी चचेरी बहन को सब प्यार करते थे और मुझे नहीं। मुझे आज भी याद है वो दिन जब हम सभी ताऊ जी की बेटी की शादी में गाँव में इकट्ठा हुए थे।
सभी लोग बस संध्या की ही तारीफ किये जा रहे थे और करते भी क्यों नहीं ? वो थी ही इतनी चंचल और बातूनी... कभी इधर फुदक तो कभी उधर... एक जगह टिकना तो मानो उसे आता ही नहीं था। नृत्य तो वो ऐसा करती थी कि सभी देखते रह जाएं। एक मैं ठहरी शान्त सी अपने में ही खोई रहने वाली... सीधी सादी सी.... लोग तो यहाँ तक कह देते थे कि इसके मुँह में जबान है भी या नहीं।
जब भी इस तरह का समारोह होता तो मेरी सदैव यही इच्छा रहती थी कि मेरी पोशाक उससे अच्छी ही होनी चाहिए। किसी और से कोई मतलब नहीं, बस सारा ध्यान सिर्फ संध्या से बेहतर दिखने में होता था।
मुझे ठीक से तो याद नहीं कि उस दिन ऐसा क्या हुआ था कि मैं बहुत अधिक भावुक हो गई थी। रात के गीत-संगीत का कार्यक्रम समाप्त हो चुका था ,सब सोने की तैयारी कर रहे थे। एक बड़े से कमरे में नीचे गद्दे पर सभी लोग आराम कर रहे थे... अचानक मेरे सिसकने की आवाज वहीं चारपाई पर सो रहे मेरे जीजाजी (ताऊ जी के बड़े दामाद) के कानों तक जा पहुँची। उनके लिये तो मैं बच्ची की तरह ही थी।
क्या बात है... क्या हुआ तुम्हें? किसी ने कुछ कहा क्या ?
कुछ नहीं... मैंने बात को टालते हुए कहा।
कुछ तो हुआ है, मुझे नहीं बताओगी क्या ?
क्या मैं किसी को अच्छी नहीं लगती ! जिसे देखो बस संध्या -संध्या किये जाता है.... मुझ से तो कोई बात नहीं करता... सब उसी को प्यार करते हैं और मुझे सब इज्जत देते हैं ... कहते हैं कि सबको मेरे जैसा होना चाहिए... अरे ! मैं भी चाहती हूं कि सब मुझ से प्यार करें... मुझे भी अपने साथ लेकर जाएं, मुझे भी कहें कि काम में हाथ बंटा दो जैसा कि उसे कहते हैं... मैं बस लगातार इसी बात को दोहरा रही थी कि मुझे इज्जत नहीं प्यार चाहिए, वो अपनापन जो सब संध्या को देते हैं।
आज भी जब ये बात याद आती है तो अपने आप पर बड़ी हँसी आती है कि बारह-तेरह साल की उम्र में कैसे मैं इस तरह की बात कर सकती हूँ... आज ऐसा कुछ भी नहीं है। अब वो उसके प्रति ईर्ष्या का भाव भी नहीं है।
उससे तो क्या इतनी उम्र गुजर जाने पर भी ऐसा भाव किसी के प्रति भी मन में नहीं आया।
ये बचपन भी न कितना अजीब होता है ....बिना सोचे समझे ही हम इस तरह की बात कह जाते हैं या फिर कर जाते हैं जो शायद कहने या सोचने के लायक ही न हो.... हम बिना किसी परिणाम के सब कुछ कितने सहज तरीके से कह जाते हैं... कुछ भी बनावटी नहीं होता और किसी से कुछ छिपा कर भी नहीं रखा जाता। बातों को घुमा फिरा कर कहना तो शायद उम्र के साथ ही सीख जाते हैं, अब तो बोलने से पहले बहुत बार सोचना पड़ता है कि कहीं हम कुछ गलत तो नहीं कर रहे।
