हल्के-फुल्के नैन-मटक्के
हल्के-फुल्के नैन-मटक्के
ये उम्र और अंदर की जवानी ही तो है, जिसे चाहे जितना समझा लो, पर समझदारी ज़रा भी इनके बूते की बात नहीं।
वो दो ज़रा कम कपड़ों वाली हीरोइनियाँ क्या सामने आ खड़ी हुईं, बिदक पड़ीं एकाएक! अब ये नज़रें कोई हमने अकेले तो न पाल रखी थीं। जैसे हमारे चेहरे पर थीं, ठीक वैसे ही और बल्कि और बड़ी-बड़ी गाड़कर लगायीं थीं ऊपर वाले ने श्रीमती जी के चेहरे पर।
जितना हमने अपनी दो आँखों से उन चार नज़रों को ताड़ा, उत्ती ही देर में बगल वाली अर्धांगिनी नज़रों ने हमारी पूरी काया को कम से कम दस गुना तो ताड़ ही डाला होगा। अब बस सड़क पर बवाला होना ही बाकी था। पर ज़रा मज़ाल कि एक शब्द निकले उनके मुंह से। हमें घूरकर एकदम चुप। चुप्पी भी ऐसी कि कम से ढाई-तीन हज़ार शब्द हमने बोल डाले, सारी कसमें, सारे फेरे वक़्त वाले वायदे याद दिला डाले, पर चूं तक न निकली उनके मुँह से।
सड़क पर आखिर कितनी देर तक खड़ा रहा जाता? उनके कदमों के आगे शब्द-फूल लुढ़काते हुए एक तरफ़ को चल पड़े। पर जिधर हमारे शब्द झरे, उससे कम से कम छः फुट की दूरी पर कदम धरकर चलना जारी रखा उन्होंने।
आखिरकार अपने कहे जाने वाले घर की देहरी सामने थी। खुलकर जहर-वाक्यों का शिकार बनने से पहले कुछ कर गुज़र जाने का वो आखिरी मौका था। उनके सामने ठहर कर हौले से आँखे झुकाते हुए होठ हिले-
“पता है, उनको क्यों देखा? तुम इतनी सुंदर, इतनी खूबसूरत होते हुए भी कभी खुद को उस तरह से देखने का मौका ही नहीं देती। उनके कपड़े देखकर बस ये सोच ही रहा था कि मेरे दिल की रानी जो एक बार को ऐसे रंग में आ गयी, तो क्या गज़ब का कहर ढायेगी, उतनी ही देर में मेरे चरित्र के बारे में सारे निर्णय ले डाले आपने? इतना वक़्त मेरे साथ गुज़ारकर बस इतना ही जान पायीं आप मेरे बारे में! फिर तो गलती किसी और की नहीं, मेरी ही है।“
शब्दों की आवाज़ मेरे होठों पर धीमी पड़ते-पड़ते, उनके अधरों से ज्यादा आंखों में शरारत की हरकत आ चुकी थी-
“गलती आपकी नहीं, तो और किसकी है? आपके दिल की रानी तो कब से आपके लिये हर ड्रेस पहनने को तैयार है, पर आपकी जेब है कि ढीली होती ही नहीं।“
घर की देहरी भीतर दाखिल होते ही मोबाइल से तत्काल किये गये ऑनलाइन ऑर्डर से एक बड़ा गृह-युद्ध छिड़ते-छिड़ते रह गया।
