मेहनत का फल खट्टा भी होता है
मेहनत का फल खट्टा भी होता है
बचपन से सुनते आए हैं कि मेहनत का फल मीठा होता है। और मानते भी आए पर जब बड़े हुए तो लगा शायद हमेशा फल मीठे नहीं होते ।कभी-कभी खट्टे भी होते हैं। बोर्ड की परीक्षा में बहुत मेहनत की ।सुबह पढ़ा नहीं जाता था तो रात में दो बजे तक पढ़ाई करती थी ।परीक्षा के दिन सब की तरह बहुत नर्वस थी।
पता नहीं क्या आएगा ?क्या नहीं? याद तो सब था पर लग रहा था कि जैसे सब मिक्स हो गया है ।खैर, परीक्षाएँ बहुत बढ़िया गई ।नंबर भी सबसे अच्छे आए और फर्स्ट डिवीजन भी आया। ऐसा लगा मानो सबसे बढ़िया कॉलेज में नाम लिखाने का सपना मेरा पूरा हो जाएगा, जो मैंने बचपन से देखा था और हमेशा देखती थी जब भी उस कॉलेज के सामने से गुजरती थी।
पर यह क्या, मेरी दोस्त जिसे सेकंड डिवीजन आया था उसका नाम लिखा गया और मेरा नहीं। बहुत दुख हुआ। कारण जाना तो और दुख हुआ। उसका सीट आरक्षित था। तब लगा मेहनत करने से अच्छा है, आरक्षित हो जाऊँ। दोस्त से ईर्ष्या हुई कि कुछ भी करो सफलता तो मिल ही जाएगी उसे और हम कितनी भी मेहनत करें कुछ नहीं मिलने वाला ।थर्ड लिस्ट आते आते मेरा नाम भी लिखा गया पर वो खुशी और उत्साह नहीं रहा, जो रिजल्ट आते ही हुई थी। इस व्यवस्था पर बहुत दुख हुआ। आज भी यह व्यवस्था कितने मेहनत करने वालों को तोड़ जाती है। उस दिन एहसास हुआ कि मेहनत का ही नहीं बल्कि सब्र का फल भी मीठा होता है।
वैसे भी आज के समाज की व्यवस्था में टिक पाने के लिए धैर्य जैसे गुण की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि सभी एक दूसरे को ठेलकर गलत रास्ते से ही सही पर आगे बढ़ने में लगे हैं क्योंकि सभी रिजल्ट देखते हैं, मेहनत कोई नहीं देखता।
