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V. Aaradhyaa

Inspirational

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V. Aaradhyaa

Inspirational

मैं गुलछर्रे उड़ाने नहीं जाती

मैं गुलछर्रे उड़ाने नहीं जाती

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"पता नहीं आज इतनी देर कहां रह गई नव्या?"आनंदी जी का इतना पूछना था कि...तान्या को मौका मिल गया,


खूब अच्छे से भर दिए उसने कान आनंदी जी के।इधर नव्या भी थोड़ा घबड़ाई हुई ही घर आ रही थी।आज नव्या को ऑफिस जाते हुए थोड़ी देर हो गई थी। स्मिता ने बात ही ऐसी की थी कि उसे उसके साथ जाना पड़ गया था।वह डरते डरते घर आई। और जिस बात का डर था वही हुआ। बैठक में ही उसे माँ जी बैठी हुई मिल गई और मिलते ही उसे आड़े हाथ लिया। और कह बैठी

" बहू! तुम कोशिश करो कि ऑफिस से सीधे घर आओ हम सब तुम्हारा इंतजार करते हैं अब इस उमर में मुझसे ज्यादा काम तो होता नहीं और आज काम वाली भी नहीं आई है!"


" जी माँ जी! मैं तो ऑफिस से सीधा घर ही आती हूं!"


"भई... अब हमें क्या पता ? जो तुम बताती हो, हम बेचारे उसे ही सच मान लेते हैं। अब कोई ऑफिस से कहीं कॉफी पीने जाए या कहीं घूमने जाए तो...हमें क्या पता चलेगा...?

माँ जी का अनवरत प्रवचन चालू था।


"ऑफिस के अलावा घर का काम भी तो बहुत जरूरी है। लेकिन आजकल की बहुएँ घर का काम करना कहां चाहती हैं?"नव्या को सास की इस बात से बहुत दुख हुआ और वह बोले बिना ना रह पाई।


"मैं दिन भर ऑफिस फिर घर का काम संभालती हूँ और सबको लगता है कि मैं कुछ नहीं करती।बोलते हुए नव्या का गला रूँध गया था।


"मेरे कहने का यह मतलब था बहू, कि दिन भर तो तुम ऑफिस में रहती हो। तब तो हमें कुछ शिकायत नहीं है पर कम से कम ऑफिस से आने के बाद तो कुछ घर के काम कर ही सकती हो। और नहीं तो कम से कम रात का खाना तुम बना दिया करो। महिनों हो जाते हैं तुम्हारे हाथ का खाना खाए हुए!"


आनंदी जी ने अपने स्वर को थोड़ा मुलायम बनाते हुए कहा।

पर... फिर एक चुटकी छोड़ ही दिया,


"और बहू , हमें भी पता है कि ऑफिस के काम और रेशेपशनिस्ट के काम के बारे में। तुम हमें ज़्यादा मत सिखाओ। भले ही हमने कभी बाहर काम ना किया हो। पर बाहर की खबर हम पूरी रखते हैँ। अगर तुम खड़े खड़े थक जाती हो तो फिर कॉफी पीने जाकर सुस्ताती भी तो हो। हाँ... भई! ऐसी थकान के क्या कहने!"


"ओह... तो तान्या ने आज आकर फिर से माँ के कान भरे!"


नव्या को अब एकदम से समझ आ गया कि आज सासुमां का पारा क्यों चढ़ा हुआ है।


अपने कमरे की ओर जाते हुए ज़रा सा पर्दा हटाकर तान्या के कमरे में झांका तो सामने उससे टकराते टकराते बची क्योंकि तान्या कान लगाकर सास बहू की बात सुन रही थी। उसे ज़रा सा भी अंदाजा नहीं था कि भाभी उसके कमरे में आ भी सकती है


"वो.... भा... भाभी... मैं अभी कमरे से निकल रही थी, तभी आपसे टकरा गई। आपको कोई चोट तो नहीं लगी?"उसने आवाज को मीठी बनाते हुए कहा


नव्या के मन में तो आया कि अभी चीखकर कहे कि,

हाँ, मुझे बहुत चोट लगी है। तुम्हारी चुगली से मेरा हृदय छलनी हुआ है। पर प्रकट में चुप रही। अभी अगर तान्या से कुछ भी कहती तो वह पैर पटककर और चीखकर घर में सबको इकठ्ठा कर लेती और नव्या की बात को बढ़ा चढ़ाकर, तोड़ मरोड़कर ऐसा प्रस्तुत करती कि सबकी नज़रों में नव्या ही दोषी बन जाती।

इसलिए उस वक़्त तो नव्या चुपचाप अपने कमरे में चली आई पर इस मीठी छुरी का पर्दाफाश कैसे किया जाए... उसके ज़ेहन में यही बात गूंज रही थी।और नव्या को जल्दी ही इसका मौका मिल गया।

रविवार को सुबह उसने जान बूझकर तान्या को सुनाने के लिए फ़ोन पर कुछ ज़ोर से ही अपनी कुलीग से बात करने का उपक्रम किया और उससे कहने लगी,


"स्मिता! मैं सोच रही हूँ कि अब जल्दी ही नौकरी छोड़ दूँ। घर में सबको मेरा काम करना नहीं दिखता बल्कि जो तेरे साथ उस दिन ऑफिस के पास वाले रेस्टुरेंट में कॉफ़ी पीने चली गई थी, उस बात को सबने बतंगड़ बना दिया है। मेरे काम को कोई सीरियसली नहीं लेता। सब सोचते हैं कि रिसेशनिस्ट के काम में करना ही क्या होता है। बस सज संवरकर ऑफिस जाओ और वहाँ से कभी कभी कॉफी पीने चले जाओ। जबकि तु अच्छी तरह जानती है कि उस दिन मैं तेरे साथ तान्या के लिए तेरे मामा के लड़के से रिश्ते की बात डिसकस करने गई थी। पर, ज़ब तान्या और मेरी सासू माँ को मुझ पर ही विश्वास नहीं तो मेरे बनाए हुए रिश्ते पर क्या ही भरोसा होगा!"


पता नहीं उधर से स्मिता ने क्या कहा। नव्या सुन नहीं पाई, क्योंकि तभी उसे अपने कमरे के दरवाज़े के सामने किसीके लड़खडाकर गिरने की आवाज़ आई।


नव्या ने पलटकर देखा तो पीछे तान्या थी। वह परदे के पीछे खड़ी नव्या की बातें सुन रही थी और शायद परदे को खींचने की वजह से उसके रॉड समेत ही नीचे गिर पड़ी थी।

तान्या को इस हालत में देखकर रोकते रोकते भी नव्या को हँसी आ ही गई।


"अरे... तान्या! तुम यहाँ क्या कर रही थी?"


सब कुछ जानते हुए भी नव्या ने अनजान बनकर पूछा तो तान्या कुछ बोल नहीं पाई।


सिर्फ दबी आवाज़ में इतना ही कहा,"भाभी! आप स्मिता दीदी के भाई अनंत से मेरे रिश्ते की बात कऱ रही थीं ना? प्लीज उन्हें मना मत करना। वो...मुझे कुणाल पसंद है। हमदोनों कई बार मिल चुके हैं। आई थिंक इसलिए स्मिता दी आपसे मिलने आपके ऑफिस आई होंगी!


नव्या को सुनकर हंसी आ गई। क्योंकि एक एक करके सारे पत्ते खुल रहे थे। तान्या अपने मुंह से सारी बातें बताई जा रही थी। और उसे इस बात का जरा भी ध्यान नहीं था कि उसके पीछे माँ जी कब से आकर खड़ी हो गई थी, और उनकी बातें सुन रही थी।


"अच्छा... तो...ये बात है? तनु तू कबसे जानती है कुणाल को? हमें तो पता ही नहीं था। और तू तो कह रही थी कि बहू ऑफिस से कॉफी पीने चले जाती है। जबकि वह तेरे ही रिश्ते की बात करने के लिए गई थी। आगे से ऐसी ऐसी बातें कहकर मेरी बहू को गलत मत साबित किया कर!"

अब तान्या क्या कहती?

इधर माँ बेटी की बात सुनकर नव्या को बहुत मज़ा आ रहा था। अपने आप तान्या अपने मुँह से स्वीकार कर रही थी कि उसने उस दिन नव्या को कॉफी पीते हुए रेस्टोरेंट में तो देखा था पर वह स्मिता को नहीं देख पाई थी इसलिए आकर उसने नव्या के खिलाफ माँ जी के कान भर दिए थे।

अब ऐसा चमत्कार तो नहीं हुआ कि...तान्या एकदम से बदल गई।या सासू माँ ने नव्या से माफ़ी मांग ली।हाँ... इतना ज़रूर हुआ था कि अब उनके मन में एक डर बैठ गया था कि अगर उन्होंने नव्या के काम को लेकर कुछ नकारात्मक टिप्पणी कर दी तो वह अपनी नौकरी से त्यागपत्र भी दे सकती है।


नव्या के लिए घर की स्थिति पहले से बेहतर हो गई थी।और कुछ महीनों में इससे भी बेहतर होने वाली थी। क्योंकि नव्या के सौजन्य से तान्या की शादी स्मिता के ममेरे भाई कुणाल से पक्की हो गई थी।

किसी भी भाभी के लिए इससे खुशी की बात और क्या हो सकती थी कि उसकी ननद की शादी हो जाए। क्योंकि ननद भाभी, सास बहू ये कुछ ऐसे रिश्ते हैं जो एक साथ एक छत के नीचे बहुत कम ही खुश खुश देखे जा सकते हैं।


यहां मैं अपवाद की बात नहीं कर रही हूं।लेकिन कुछ रिश्तो में अक्सर असुरक्षा की भावना होती है। हाँ, बदलाव जरूर हुए हैं लेकिन उनकी रफ्तार बहुत कम है। धीरे-धीरे इन रिश्तो में भी सहजता और अपनापन बढ़े, इन्हीं कामनाओं के साथ...



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