मैं देखता हूँ
मैं देखता हूँ
उस रात काशी विश्वनाथ की आरती खत्म होने के बाद भी अरुण मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा रहा।
भीड़ धीरे-धीरे छँट रही थी। फूलों की टोकरी वाले अपनी दुकानें समेट रहे थे। गीले पत्थरों पर बचे हुए दीयों की लौ हवा से काँप रही थी। मंदिर के भीतर से आती घंटियों की आवाज़ अब दूर लग रही थी।
अरुण के हाथ में फ़ोन था। स्क्रीन पर आरव का नाम था, लेकिन उसने फ़ोन नहीं किया।
पिछले छह महीनों में वह इस नाम को इतनी बार देख चुका था कि अब फ़ोन बजने से पहले ही उसे अंदाज़ा हो जाता था—किसी परेशानी का फ़ोन होगा। कभी पैसे चाहिए होते, कभी नौकरी का कोई झंझट, कभी किसी से झगड़ा—और हर बार अरुण का एक ही जवाब होता—
"तुम चिंता मत करो। मैं देखता हूँ।"
फिर वह कुछ न कुछ कर देता—पैसे भेज देता, किसी परिचित को फ़ोन कर देता, किसी का गुस्सा शांत कर देता। आरव की मुश्किल कुछ दिनों के लिए टल जाती, फिर कोई नई मुश्किल आ जाती।
अरुण ने कभी हिसाब नहीं रखा था। बाप बेटे से हिसाब थोड़ी रखता है। लेकिन उस रात पहली बार उसके भीतर एक बात उठी—
शायद उसने हर बार जो किया, वह मदद नहीं थी।
पाँचवीं में आरव ने स्कूल की खिड़की तोड़ दी थी। प्रिंसिपल ने बुलाया, अरुण गया—"मैं देखता हूँ।" दसवीं में परीक्षा से एक रात पहले दोस्तों के साथ बाहर चला गया। नंबर कम आए तो अरुण ने ट्यूशन लगवा दी। कॉलेज में पैसे खत्म हुए—अरुण ने भेज दिए। पहली नौकरी छोड़ी तो पुराने परिचित के यहाँ इंटरव्यू लगवा दिया। दूसरी नौकरी में झगड़ा हुआ, इस्तीफ़े की बात आई तो अरुण ने फिर वही कहा—"रुको। मैं देखता हूँ।" हर बार आरव की ठोकर उसके पैरों तक पहुँचती, उससे पहले अरुण उसे उठा चुका होता। शायद इसी वजह से आरव ने कभी ठीक से जाना ही नहीं था कि गिरना कैसा होता है।
अरुण ने फ़ोन की स्क्रीन फिर देखी। आख़िरी संदेश एक घंटे पहले आया था।
पापा, इस बार मुझे मत रोकना।
उसने संदेश दोबारा पढ़ा।
आरव जिस लड़की से शादी करना चाहता था, घर वाले उसके खिलाफ़ थे। नौकरी भी ठीक नहीं चल रही थी। दोनों ने तय किया था कि शहर छोड़कर कहीं और रहेंगे। आरव नौकरी छोड़ चुका था और उसकी बचत लगभग खत्म हो चुकी थी।
अरुण को यह फैसला गलत लगता था। बहुत गलत। उसे कहीं सुनी हुई एक पंक्ति याद आई—
जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहले हर लेही।
अरुण हल्का-सा मुस्कुराया। उसे नहीं पता था कि आरव की मति गई थी या उसकी अपनी।
वह आरव को रोक सकता था। बस एक फ़ोन करना था—लड़की के पिता से बात, आरव के दोस्त से बात, किसी परिचित के यहाँ नौकरी, कुछ पैसे। शायद सब ठीक हो जाता। शायद नहीं।
उसने फ़ोन उठाया।
स्क्रीन पर आरव का नाम चमक रहा था। उँगली कॉल बटन तक गई—फिर रुक गई।
कुछ देर बाद उसने फ़ोन बंद कर दिया।
उस रात उसने किसी को फ़ोन नहीं किया—न आरव को, न लड़की के पिता को, न किसी परिचित को।
सुबह आरव का फ़ोन आया।
"पापा?"
"हाँ।"
"आपने किसी को फ़ोन नहीं किया?"
"नहीं।"
"पैसे भी नहीं भेजे?"
"नहीं।"
दूसरी तरफ़ कुछ देर चुप्पी रही।
"आपको फर्क नहीं पड़ता?"
अरुण ने आँखें बंद कर लीं।
"फर्क पड़ता है," उसने कहा। "बहुत।"
"फिर आप चुप क्यों हैं?"
अरुण ने खिड़की से बाहर देखा। सुबह की धूप सामने वाली दीवार पर धीरे-धीरे चढ़ रही थी।
"क्योंकि इस बार तुम्हारी ज़िंदगी में जो होना है, उसे मैं तुम्हारी जगह नहीं जी सकता।"
"मतलब?"
"फैसला तुम्हारा है।"
"और अगर मैं गलत हुआ?"
अरुण चुप रहा।
"तो गलती भी तुम्हारी होगी।"
फ़ोन के उस पार फिर सन्नाटा था।
अरुण ने धीरे से कहा—
"मैं तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन तुम्हारी जगह नहीं।"
कुछ देर बाद आरव ने पूछा—
"पापा… आपको डर नहीं लग रहा?"
अरुण हल्का-सा हँसा।
"बहुत।"
"फिर?"
"डर लगना और रोकना एक बात नहीं है।"
फ़ोन कट गया। अरुण कुछ देर फ़ोन को देखता रहा, फिर उसे मेज़ पर रख दिया।
उस दिन उसने कोई काम ठीक से नहीं किया।
दोपहर तक उसने चार बार ट्रेन की वेबसाइट खोली। पाँचवीं बार टिकट बुक करने लगा। नाम तक भर दिया—फिर स्क्रीन बंद कर दी।
कुछ देर बाद दोबारा खोली। ट्रेन का समय देखा। फिर बंद कर दी।
शाम को आरव का संदेश आया—
मैं जा रहा हूँ।
अरुण ने बहुत देर तक फ़ोन हाथ में पकड़े रखा।
उसने कई बार कुछ लिखना शुरू किया।
मत जाओ।
मिटा दिया।
कम-से-कम एक बार और सोच लो।
मिटा दिया।
पैसों की चिंता मत करना।
मिटा दिया।
आख़िर में सिर्फ़ इतना भेजा—
पहुँचकर बता देना।
अगले कुछ महीने आसान नहीं थे। आरव का काम नहीं चला। जिस लड़की के साथ वह गया था, उससे झगड़े हुए। पैसे खत्म हुए।
एक रात आरव का फ़ोन आया।
"शायद वापस आ जाना चाहिए।"
अरुण का दिल भर आया। जीभ तक आया—
आ जा। बाकी मैं देख लूँगा।
वह कुछ सेकंड चुप रहा, फिर पूछा—
"तुम क्या चाहते हो?"
दूसरी तरफ़ चुप्पी थी। "पता नहीं।"
"तो पहले पता करो।"
"आप पहले जैसे क्यों नहीं रहे?"
अरुण ने कुछ देर सोचा। "शायद पहले मैं तुम्हें बचाने की जल्दी में था।"
"और अब?"
"अब मैं तुम्हें बचाने के बजाय तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ। फर्क है।"
आरव चुप रहा। "लेकिन अगर तुम्हें मेरी मदद चाहिए," अरुण ने कहा, "तो माँगना। मैं मना नहीं करूँगा।"
कुछ देर बाद आरव ने धीरे से कहा—
"ठीक है।"
फ़ोन कट गया। अरुण ने फ़ोन नीचे रख दिया। कुछ देर बाद उठकर पानी पिया। बस।
दो महीने तक आरव की कोई ख़बर नहीं आई। हर सुबह अरुण फ़ोन देखता। रात को कभी-कभी आरव के कमरे के बाहर खड़ा हो जाता।
कमरा वैसा ही था जैसा वह छोड़ गया था—टेबल पर पुरानी किताबें, एक टूटी हुई घड़ी, दीवार पर कॉलेज का एक फ़ोटो। टेबल के नीचे उसका पुराना कैमरा पड़ा था। अरुण ने उसे देखा, लेकिन उठाया नहीं।
एक रात उसने आरव का नंबर मिलाया। पहली घंटी बजने से पहले ही काट दिया। कुछ देर फ़ोन हाथ में लिए बैठा रहा, फिर उसे मेज़ पर रख दिया। उसे अब भी डर लगता था। फर्क सिर्फ़ इतना था कि इस बार उसने उस डर पर अमल नहीं किया।
सावन की एक शाम वह काशी विश्वनाथ चला गया। बारिश अभी-अभी रुकी थी। मंदिर की सीढ़ियाँ गीली थीं। हवा में मिट्टी और फूलों की मिली-जुली गंध थी।
अरुण कुछ देर सीढ़ियों पर खड़ा रहा, फिर हाथ जोड़ लिए। आरती शुरू हुई। घंटियाँ एक साथ बज उठीं।
उसने आँखें बंद कर लीं।
उसे आरव का बचपन याद आया—स्कूल की टूटी खिड़की, दसवीं के कम नंबर, कॉलेज के लिए भेजे गए पैसे, पहली नौकरी, दूसरी नौकरी और हर बार उसका अपना वही वाक्य—
"मैं देखता हूँ।"
घंटियाँ बजती रहीं। अरुण ने आँखें खोल दीं। उसे अचानक लगा—महादेव भी हर ठोकर नहीं हटाते। इतने वर्षों में पहली बार यह ख़याल उसे डराने के बजाय राहत जैसा लगा।
उसने हाथ नीचे कर लिए।
कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
फिर बहुत धीरे से कहा—
"अब जो होना है, उसे होने देता हूँ।"
छह महीने बाद आरव का फ़ोन आया।
"पापा?"
"हाँ।"
"एक फिल्म बनाई है।"
अरुण मुस्कुराया।
"चल गई?"
"पता नहीं।"
"फिर मुझे क्यों बता रहे हो?"
दूसरी तरफ़ हल्की हँसी थी।
"दिखानी है।"
"कब?"
"आप आओगे?"
"हाँ।"
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर आरव ने पूछा—
"मदद करने?"
अरुण हँस पड़ा।
"नहीं।"
"फिर?"
"देखने।"
दूसरी तरफ़ कुछ देर सन्नाटा रहा।
"ठीक है।"
फ़ोन कट गया।
अरुण कुछ देर वहीं बैठा रहा।
