अम्मा का जाला
अम्मा का जाला
अम्मा का जाला
एक
अस्सी घाट से हटकर, एक तंग गली के आख़िर में, वह मकान अब भी झुका हुआ खड़ा था। आँगन में नीम का पेड़ था। उसी की छाया में एक टूटी आराम-कुर्सी पर सावित्री अम्मा बैठी रहती थीं, दिन भर।
बरामदे के कोने में मकड़ी का एक पुराना जाला था। माँ कई बार उसे साफ़ करना चाहतीं, पर अम्मा हर बार कहतीं—"रहने दो... फिर बन जाएगा।"
गौरी दसवीं में थी। बोर्ड फरवरी में। नवंबर की उस दोपहर वह किताबें लेकर आँगन में इसलिए आई थी क्योंकि कमरे का पंखा उसे भागते हुए समय जैसा लगता था।
"कौन बैठा है?" अम्मा ने पूछा।
"मैं, गौरी।"
"गौरी..." नाम अम्मा के मुँह में घूमा, फिर अचानक — "मेरी एक बहन थी। शांति।"
गौरी ने किताब से नज़र नहीं उठाई। बीसवीं बार थी यह।
"भाग गई थी। सत्रह की उम्र में।" अम्मा रुकीं, जैसे धागा हाथ से छूट गया हो। "बाबूजी ने... क्या किया था बाबूजी ने? हाँ। नाम मिटा दिया घर से।"
"सब कहते थे... हार गई।" गौरी ने वाक्य पूरा किया, बिना ऊपर देखे। यह हिस्सा अम्मा कभी नहीं भूलतीं।
"किसने कहा तुझसे यह?" अम्मा ने पूछा, कुछ खोया हुआ-सा।
"आपने ही, अम्मा। अभी।"
"मैंने?"
अम्मा ने गौरी को कुछ देर घूरा, जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हों, फिर आँखें फिर धुंधला गईं। "अच्छा।"
दो
घर में यह कहानी सुनते ही माँ बर्तन धोते हुए कहतीं, "अंदर ले चलो अम्मा को, धूप है।" पिताजी अख़बार मोड़ लेते, जल्दी से, बिना पढ़े। "दादी जी की बात मत छेड़ा कर उनसे," उन्होंने एक बार कहा था। "बीमार हैं। जो मन आता है बोल देती हैं।"
"पर वह ख़ुद ही तो बताती हैं," गौरी ने कहा।
"तो क्या हुआ। पचास साल पुरानी बात है।"
गौरी को यह ठीक नहीं लगा, पर बहस करने लायक शब्द उस वक़्त नहीं मिले।
तीन
एक दोपहर, घर खाली था। गौरी स्टोर रूम की सीढ़ियाँ चढ़ी — हर पायदान अलग आवाज़ करता — और वह लोहे का ट्रंक ढूँढ निकाला जिस पर सफ़ेद रंग से "स." लिखा था।
साड़ियाँ, कपूर की गंध, पीतल के बर्तन। सबसे नीचे कपड़े में बँधा एक पुलिंदा — एक धुँधली तस्वीर, कुछ ख़त।
तस्वीर में दो लड़कियाँ, घाट की सीढ़ियों पर। पीछे पेंसिल से लिखा — *सावित्री और शांति, 1961।*
एक ख़त पर तारीख़ थी 1963।
"प्रिय सावित्री,
उस रात अगर तुम साथ न देतीं, तो शायद मैं कभी निकल नहीं पाती।
अगर बाबूजी को पता चला तो तुम्हें भी निकाल देंगे।
मुंबई पहुँच गई हूँ। एक छोटे से स्कूल में नौकरी मिल गई है।
घर में कह देना मैं मर गई, अगर इससे उनका ग़ुस्सा शांत हो जाए।
पर तुम जानती रहना—मैं जी रही हूँ।
— शांति"
गौरी फ़र्श पर बैठ गई। बाहर अम्मा की खाँसी सुनाई दी।
चार
गौरी ने कई दिन तक किसी से कुछ नहीं पूछा।
फिर एक शाम, जब गीता दादी नीम के नीचे मेथी चुन रही थीं, उसने सहज ही पूछ लिया — "दादी... अम्मा की बहन, शांति... कैसी थीं?"
गीता दादी के हाथ रुक गए।
"तुझे किसने बताया?"
"अम्मा बार-बार उनका नाम लेती हैं।"
कुछ देर चुप रहकर गीता दादी बोलीं — "मैंने उन्हें देखा नहीं था, बेटा। तब मैं बहुत छोटी थी। पर मेरी माँ बताया करती थीं। पूरे मोहल्ले में कई दिनों तक बस उसी की चर्चा थी।"
"क्या हुआ था?"
"इतना सुना था कि घर में उनकी शादी को लेकर बड़ा झगड़ा हुआ था। फिर एक दिन वह चली गईं।"
"फिर?"
"फिर इस घर में किसी ने उनका नाम नहीं लिया।"
"क्यों?"
गीता दादी ने धीरे से सिर हिला दिया।
"यह मेरी माँ भी नहीं जानती थीं। लोग अपने-अपने किस्से बनाते रहे। कोई कहता था भाग गईं, कोई कहता था बहका ली गईं। सच क्या था... यह तो शायद इसी घर वाले जानते होंगे।"
गौरी घर लौटी, ट्रंक की बात किसी को बताए बिना।
पाँच
दिसंबर की एक शाम, घर खाली था। सर्दी थी, अम्मा ने शॉल लपेट रखी थी।
"अम्मा, आपकी बहन हारी हुई थीं?"
अम्मा ने गौरी की तरफ़ देखा। कुछ पल — जैसे धुंध हटी हो।
"नहीं," अम्मा ने कहा। फिर रुक गईं, शॉल का किनारा मरोड़ने लगीं।
"उस रात..." उन्होंने कहना शुरू किया, फिर थम गईं। "कौन-सी रात? क्या पूछा तूने?"
"शांति के बारे में, अम्मा।"
"हाँ। शांति।" माथे पर हाथ रखा, जैसे कुछ पकड़ने की कोशिश हो जो फिसल रहा हो। "कुछ था... उस रात कुछ हुआ था।"
गौरी साँस रोके रही।
पर आँखें फिर धुंधली हो गईं। "ठंड लग रही है," अम्मा ने कहा। "अंदर चलें?"
आज नहीं। गौरी को समझ आ गया — यह पल आज नहीं आएगा।
छह
गौरी ने माँ से शांति का पता माँगा। माँ चौंकीं, फिर देर तक चुप रहीं। "देखते हैं," बस इतना कहा।
कुछ नहीं हुआ इसके बाद। हफ़्ते गुज़र गए।
सात
जनवरी की एक ठंडी दोपहर थी, नीम की छाया धीरे-धीरे आँगन में सरक रही थी। अम्मा उसी कुर्सी पर बैठी थीं। गौरी उनके पास आकर चुपचाप बैठ गई, कुछ पूछा नहीं।
बहुत देर बाद अम्मा ने स्वयं कहा — "मैंने उसे छोड़ा था।"
गौरी ने उनकी ओर देखा। "किसे?"
"शांति को।" आवाज़ बिल्कुल साफ़ थी। "स्टेशन तक गई थी।"
फिर चुप्पी।
"उसने कहा था... 'डर मत। एक दिन समझेंगे।'" अम्मा की आँखें कहीं बहुत दूर चली गईं। "मैं नहीं समझी..."
पहली बार उनके चेहरे पर पछतावा नहीं था, सिर्फ़ थकान थी। "घर आकर मैंने झूठ बोला।"
गौरी कुछ नहीं बोली।
"जानती है..." अम्मा ने बहुत धीरे कहा, "उस दिन घर से शांति नहीं गई थी..." उन्होंने साँस ली। "...उस दिन मैं रह गई थी।"
आँगन में हवा चली, नीम से दो पत्तियाँ टूटकर उनकी गोद में आ गिरीं। अम्मा ने उन्हें देखा। "लोग कहते रहे... वह हार गई।"
बहुत लंबी चुप्पी। फिर जैसे अपने आप से बोलीं — "हारी तो मैं थी।"
गौरी ने उनका हाथ पकड़ लिया, अम्मा ने पहली बार उसकी उँगलियाँ कसकर थाम लीं। "वह चली गई थी..." उनकी आँखों में हल्की-सी चमक आई। "...मैं कभी जा ही नहीं पाई।"
इतना कहकर उन्होंने आँखें बंद कर लीं। कुछ ही क्षण बाद फिर खो गईं। "तुम कौन?" उन्होंने पूछा।
गौरी की आँखें भर आईं। "गौरी।"
"अच्छा..." अम्मा मुस्कुराईं। "मेरी एक बहन थी..."
इस बार उनकी आवाज़ में दुख कम था, मानो पचास साल बाद, पहली बार, वह कहानी किसी बोझ की तरह नहीं, एक स्मृति की तरह लौट रही हो।
नीम की डाल पर पुराना जाला हवा में हिल रहा था। इस बार गौरी ने उसे हटाने के बारे में नहीं सोचा।
— समाप्त —
