कंगन
कंगन
रजिस्ट्री का दिन था। दोपहर तीन बजे तक काग़ज़ बनने थे, पर सुबह दस बजे दफ़्तर से फ़ोन आया—स्टाम्प ड्यूटी की नई दर से साढ़े चार लाख कम पड़ रहे थे।
रितु उस वक़्त अपनी दुकान में थी, एक ग्राहक की ब्लाउज़ की नाप ले रही थी। फ़ोन तीन बार बजा, तब जाकर उसने उठाया।
पापा ने रितु को फ़ोन किया।
"बेटा, बस साढ़े चार लाख की बात है। आज दोपहर तक चाहिए, नहीं तो सौदा हाथ से निकल जाएगा। तीस साल से जिस ज़मीन के पीछे था, आज मिलते-मिलते रह जाएगी।"
यह पहली बार नहीं था कि पापा ने कुछ माँगा था। स्कॉलरशिप, शादी की तारीख़, बुटीक की कमाई—बरसों में बहुत कुछ माँगा था, और रितु ने बहुत कुछ दिया था। पर एक चीज़ कभी नहीं माँगी गई थी।
"पापा, मेरे पास इतना नहीं है। बुटीक बंद हुए दस साल हो गए। अब जो है, उसी से दुकान का किराया निकलता है।"
फ़ोन पर एक पल चुप्पी रही। इतनी लंबी कि रितु को लगा शायद लाइन कट गई।
"वो कंगन हैं ना तुम्हारे पास? जो मैंने दिए थे?"
रितु का हाथ अपने-आप कलाई की तरफ़ गया, जहाँ कंगन नहीं थे—वे घर में, अलमारी में, एक मख़मल के डिब्बे में बंद रहते थे, साल में शायद दो बार पहने जाते, किसी शादी या तीज-त्योहार पर।
वह बारह साल की थी जब पापा ने वे कंगन दिए थे। स्कूल की डिज़ाइन प्रतियोगिता में पहला इनाम जीता था उसने—एक दुपट्टे की कढ़ाई, ख़ुद बनाई हुई, रातों जागकर। पापा उस शाम मिठाई का डिब्बा नहीं, कंगन का डिब्बा लेकर आए थे। पूरे मोहल्ले के सामने उन्होंने रितु की कलाई पर पहनाए थे, हाथ पकड़कर।
"यह तेरा है," उन्होंने कहा था, "हमेशा के लिए। चाहे कुछ भी हो जाए, यह कभी वापस नहीं माँगूँगा।"
उस उम्र में रितु को समझ नहीं आया था कि यह वादा इतना बड़ा क्यों था। बड़े होकर, हर बार जब पापा कुछ और माँगते, रितु ख़ुद को याद दिलाती—कंगन अब भी उसके पास हैं। एक चीज़ है जो सच में उसकी है, जो कभी वापस नहीं माँगी जाएगी। शायद इसीलिए बाक़ी सब देना इतना मुश्किल नहीं लगा।
"पापा, वो कंगन आपने कहा था हमेशा के लिए—"
"कंगन?" पापा की आवाज़ में हल्की हैरानी थी, जैसे बरसों पुरानी कोई मामूली बात याद दिलाई गई हो। "अरे बेटा, वो तो कब की बात है। इतनी बड़ी डील के आगे कंगन की क्या बिसात। सौदा हाथ से निकल गया तो तीस साल की मेहनत बेकार हो जाएगी। कंगन तो फिर बनवा दूँगा, इससे भी अच्छे।"
उन्हें याद भी नहीं था कि उन्होंने क्या कहा था उस शाम।
रितु कुछ देर चुप रही। दुकान में सिलाई मशीन की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई दे रहा था।
"ठीक है, पापा। भेजती हूँ।"
फ़ोन रखकर उसने ग्राहक से माफ़ी माँगी, दुकान जल्दी बंद की।
घर पहुँचकर उसने अलमारी खोली। मख़मल का डिब्बा वहीं था, सबसे ऊपर वाले ख़ाने में। उसने डिब्बा एक बार खोला—कंगन वहीं थे, चमकते हुए, जैसे बारह साल पहले थे। उसने उन्हें हाथ में उठाया, वज़न महसूस किया, फिर वापस डिब्बे में रख दिया।
ज्वैलर की दुकान पुरानी थी, वही जहाँ से पापा ने बरसों पहले कंगन बनवाए थे। दुकान वाले ने कंगन पहचान लिए।
"यह तो हमारे यहाँ के हैं," उसने कहा, तराज़ू पर रखते हुए। "बहुत साल पहले बने थे।"
"हाँ," रितु ने बस इतना कहा।
काउंटर पर कंगन तौले गए। साढ़े चार लाख का हिसाब बैठ गया।
पैसे पापा तक पहुँचे तीन बजे से पहले। रजिस्ट्री उसी दिन हो गई।
शाम को घर लौटकर रितु ने अलमारी खोली। मख़मल का डिब्बा वहीं रखा था, ढक्कन खुला, भीतर कुछ नहीं।
उसने डिब्बा बंद नहीं किया। बस अलमारी का दरवाज़ा बंद कर दिया, डिब्बे को खुला छोड़कर—जैसे किसी बात को अधूरा छोड़ देना कभी-कभी उसे बंद करने से ज़्यादा सच होता है।
