Ghanti
Ghanti
घंटी
रजिस्टर मेज़ पर खुला पड़ा था।
ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था—"सहायक कर्मचारी सेवा विवरण।"
नीचे पाँच खाने बने थे—नाम, नियुक्ति, वेतन, सेवा समाप्ति, कारण।
प्रधानाचार्य की कलम आख़िरी दो खानों के ऊपर रुकी हुई थी।
पहले खाने में पहले से लिखा था—
रामसहाय।
नियुक्ति—1946।
वेतन का आँकड़ा भी दर्ज था, साफ़ स्याही में।
बाक़ी दोनों खाने ख़ाली थे।
एक हफ़्ते पहले ज़िला शिक्षा कार्यालय से पत्र आया था। नए सत्र से पहले सभी अधूरे कर्मचारी-रिकॉर्ड बंद करने थे। जिनकी सेवा में कोई हलचल न हो, उन्हें भी दर्ज करना था। और जो लापता थे, उनके लिए भी कोई-न-कोई प्रविष्टि चाहिए थी। ऐसा नहीं हो सकता था कि रजिस्टर के एक पन्ने पर एक आदमी हमेशा के लिए "अभी सेवा में" बना रहे।
एक साल हो चुका था।
प्रधानाचार्य ने कलम मेज़ पर रख दी।
उन्होंने दराज़ खोला।
भीतर एक तह किया हुआ काग़ज़ था, कोनों से थोड़ा मुड़ा हुआ। उन्होंने उसे निकाला।
लेटरहेड पुराना पड़ चुका था। ऊपर तारीख़—
21 मार्च 1947
लिखावट वही थी जिसे वे पहचानते थे—सीधी, बिना किसी अलंकार के, जैसे लिखने वाले को मालूम हो कि उसकी बात जितनी जल्दी ख़त्म हो, उतना अच्छा।
"प्रधानाध्यापक महोदय,
पिछले कुछ दिनों से रावलपिंडी की तरफ़ से जो ख़बरें आ रही हैं, वे अच्छी नहीं हैं। यहाँ भी रात को दूर-दूर से आग की ख़बरें आने लगी हैं। ऐसे समय में स्कूल में रहना ज़रूरी है।
घंटी अब सिर्फ़ छुट्टी और कक्षा के लिए नहीं बजेगी। अगर आसपास ख़तरा दिखाई दे, तो मैं इसे लगातार बजाऊँगा, बिना छोड़े—जो जहाँ हो, वहीं रुक जाए, बच्चे भीतर ही रहें। छोटी, एक बार वाली आवाज़ रोज़ की घंटी ही समझी जाए।
मेरा घर यहीं है, और मेरा काम भी। इसलिए जब तक आप कहें नहीं, मैं स्कूल छोड़कर नहीं जाऊँगा।
रामसहाय"
प्रधानाचार्य ने काग़ज़ बहुत देर तक हाथ में रखा।
फिर मोड़कर वापस दराज़ में रख दिया।
यह उनकी पहली माँग नहीं थी। बस पहली बार था जब उन्होंने उसे काग़ज़ पर उतारा।
पहली बार जब रामसहाय यह प्रस्ताव लेकर आए थे, प्रधानाचार्य ने हँसकर टाल दिया था।
"घंटी कोई पहरेदार नहीं है, रामसहाय।"
"पहरेदार नहीं है," उन्होंने जवाब दिया था, "पर आवाज़ दूर तक जाती है। जितनी दूर पहरेदार की नज़र नहीं पहुँचती।"
उस दिन प्रधानाचार्य ने बात हवा में उड़ा दी थी।
लेकिन रामसहाय ने नहीं उड़ाई।
अगले कुछ दिनों में उन्होंने ख़ुद ही घंटी की रस्सी दुरुस्त करवाई, हथौड़े की कील कसवाई, और एक शाम बरामदे में खड़े होकर प्रधानाचार्य को दिखाया।
"एक बार खींचकर छोड़ दूँ, तो रोज़ वाली घंटी," उन्होंने कहा, और हथौड़ा एक बार टकराकर रुक गया। "और अगर यह बजे—" उन्होंने लगातार रस्सी खींची, बिना रुके, आवाज़ पर आवाज़ चढ़ती गई, "—तो समझ लीजिए, बाहर कुछ ठीक नहीं है। बच्चे जहाँ हों, वहीं रुक जाएँ।"
"यह किसलिए?" प्रधानाचार्य ने पूछा था।
"ताकि जब ज़रूरत पड़े, तो बताना न पड़े। सुनते ही समझ आ जाए।"
प्रधानाचार्य उस वक़्त कुछ नहीं बोले थे। बस देखते रहे कि यह आदमी, जिसका काम सिर्फ़ झाड़ू-बुहारू और घंटी बजाना था, स्कूल के बारे में उनसे ज़्यादा सोच रहा था।
उसके बाद के हफ़्तों में घंटी कई बार बिना समय के बजी।
पहली बार तब, जब शहर के उस पार आग की लपटें आसमान में दिखाई दीं—रामसहाय ने लगातार घंटी बजाई, इतनी देर तक कि आसपास के मोहल्ले के कुछ परिवार डरकर स्कूल के मैदान में आ गए। उस रात कोई घर नहीं जला, कम से कम स्कूल के आसपास नहीं।
फिर एक दिन दोपहर के वक़्त, जब उन्होंने दूर से भीड़ की चाल देखी—डंडे, मशालें, नारे—घंटी उसी तरह बजी, और भीड़ रास्ता बदलकर दूसरी गली से निकल गई।
धीरे-धीरे मोहल्ले में यह बात फैलने लगी कि स्कूल की घंटी अब सिर्फ़ बच्चों के लिए नहीं बजती—और यह भी कि बजाने वाला कौन है।
एक शाम एक अजनबी आदमी गेट पर आया। चपरासी से रामसहाय को बुलवाया। प्रधानाचार्य बरामदे के दूसरे छोर से यह सब देख रहे थे। बातचीत बहुत छोटी थी, आवाज़ इतनी धीमी कि शब्द नहीं सुनाई दिए। पर आदमी का हाथ रामसहाय के कंधे पर एक पल रुका था—ज़ोर से नहीं, बस इतना कि चेतावनी समझ में आ जाए।
आदमी चला गया।
"कौन था?" प्रधानाचार्य ने पूछा।
"जानता हूँ थोड़ा। कह रहा था, अपने काम से काम रखो।"
"तो?"
रामसहाय ने कंधे उचकाए। "यह काम भी मेरा ही है, साहब।"
उस रात प्रधानाचार्य ने उन्हें समझाने की कोशिश की थी—कि सावधानी बरतें, कि हर आवाज़ का ज़िम्मा उन्हीं के हिस्से नहीं, कि कोई और भी देख सकता है। रामसहाय चुपचाप सुनते रहे। जवाब में सिर्फ़ इतना कहा—
"अगर मैं नहीं बताऊँगा, तो कौन बताएगा?"
प्रधानाचार्य के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
15 अगस्त 1947 की सुबह मैदान में झंडा फहराने की तैयारी थी।
रस्सी बँध चुकी थी। बच्चे कतार में लगने लगे थे।
प्रधानाचार्य को याद था—रामसहाय उस सुबह हमेशा की तरह जल्दी आ गए थे, लेकिन उनका चेहरा हमेशा जैसा नहीं था। वे दो बार बरामदे के उस सिरे तक गए जहाँ से पश्चिम की बस्ती दिखती थी, और दो बार वापस आए।
तीसरी बार जाकर वे नहीं लौटे।
प्रधानाचार्य मंच की तैयारी में उलझे थे कि घंटी बजी—इस बार लगातार, बिना रुके, जैसे रुकना भूल गई हो।
मैदान में जमा हो रहे बच्चे जहाँ के तहाँ ठिठक गए। किसी ने नहीं सिखाया था, फिर भी सब समझ गए।
घंटी थमी। रामसहाय बरामदे से होते हुए गेट की तरफ़ बढ़ गए।
"कहाँ जा रहे हो?" प्रधानाचार्य ने पीछे से पूछा था।
"देख आता हूँ। बच्चों को भीतर ही रखिएगा।"
इतना कहकर वे गेट से बाहर निकल गए।
प्रधानाचार्य ने उन्हें मुड़कर एक बार देखा था—कंधे पर वही पुराना गमछा, चाल में कोई जल्दबाज़ी नहीं, जैसे वे बस सड़क के उस पार कुछ देखने जा रहे हों।
वह आख़िरी बार था।
दोपहर तक झंडा फहर चुका था। भाषण हो चुके थे। बच्चे घर जाने लगे थे।
रामसहाय नहीं लौटे थे।
शाम को सब्ज़ी बेचने वाला, जो उसी रास्ते से आता था, स्कूल के गेट पर रुका। उसने बताया कि सुबह उस तरफ़ कुछ हथियारबंद लोग दिखे थे, और एक आदमी को रोकते देखा गया था। उसने चेहरा साफ़ नहीं देखा।
रात तक इंतज़ार होता रहा।
अगले दिन चपरासी और दो पड़ोसी उस तरफ़ गए। कहीं कुछ नहीं मिला। न कोई निशान, न कोई ख़बर।
हफ़्ते भर तक पूछताछ चलती रही।
फिर धीरे-धीरे पूछना भी बंद हो गया, क्योंकि पूछने वाला कोई नहीं बचा था जिसके पास जवाब हो।
प्रधानाचार्य ने रजिस्टर फिर अपने सामने खींचा।
कलम उठाई।
"सेवा समाप्ति" वाले खाने में उन्होंने तारीख़ लिख दी। हाथ काँपा नहीं। यह हिस्सा आसान था।
"कारण" वाला खाना अब भी सामने खुला था।
उन्होंने लिखना शुरू किया—
कर्तव्य के दौरान...
फिर रुक गए।
दौरान शब्द ग़लत था। कर्तव्य कहीं तय नहीं था कि उस सुबह गेट से बाहर जाना उनकी ड्यूटी में आता था। कोई आदेश नहीं था। कोई निर्देश नहीं था। यह सिर्फ़ एक आदमी का अपना फ़ैसला था।
और यह भी सच था कि जिस दिन यह प्रस्ताव पहली बार आया था, उन्होंने उसे हँसी में उड़ा दिया था—न मना किया, न सहमति दी। उस चुप्पी में रामसहाय ने अपना रास्ता ख़ुद तय कर लिया था।
उन्होंने पंक्ति काट दी।
फिर लिखा—
अज्ञात कारणवश...
यह भी ग़लत लगा। कारण अज्ञात नहीं था। कारण सबको पता था। बस उसे सरकारी काग़ज़ पर लिखने की कोई जगह नहीं थी—न यह लिखने की जगह थी कि किसने रोका, न यह कि किस तरफ़ से रोका गया, क्योंकि उस एक वाक्य में इतने नाम, इतने समुदाय, इतने आरोप बुनने पड़ते जिनका सच्चा हिसाब किसी के पास नहीं था। और आज के हालात में—जब शहर अब भी सम्भल ही रहा था—ऐसा एक वाक्य फ़ाइल में पड़ा रहना ख़तरनाक भी हो सकता था।
उन्होंने वह पंक्ति भी काट दी।
बहुत देर तक कलम काग़ज़ पर टिकी रही, बिना हिले।
आख़िर में उन्होंने सिर्फ़ इतना लिखा—
अनुपस्थित। वापसी नहीं हुई।
और खाना बंद कर दिया।
यह सच था। पूरा सच नहीं, पर झूठ भी नहीं। रजिस्टर इससे ज़्यादा किसी सच की माँग नहीं करता था।
उन्होंने रजिस्टर बंद किया और उसे अलमारी में वापस रख दिया।
शाम को स्कूल ख़ाली हो चुका था।
प्रधानाचार्य बरामदे से होते हुए बाहर निकले।
घंटी वहीं टँगी थी, जहाँ हमेशा रहती थी। शाम की धूप में उसका ताँबा हल्का सुनहरा दिख रहा था।
वे कुछ देर उसके सामने खड़े रहे।
फिर उन्होंने चपरासी को बुलाया।
"बाज़ार में ठठेरे की दुकान अभी खुली होगी?"
"होगी, साहब।"
"घंटी उतार लाओ। कल सुबह तक वापस टाँग देंगे।"
ठठेरे की दुकान में एक दीया जल रहा था। बर्तनों की कतार दीवार के सहारे टिकी थी।
प्रधानाचार्य ने घंटी मेज़ पर रखी।
"क्या करवाना है, साहब? पॉलिश?"
"नहीं। कुछ शब्द उकेरने हैं। नीचे किनारे पर, जहाँ जगह हो।"
"बोलिए, लिख देता हूँ।"
प्रधानाचार्य ने एक पल सोचा। फिर धीरे-धीरे बोले, जैसे हर शब्द तौल रहे हों—
"जिस दिन यह घंटी डर के बिना बजेगी, उस दिन हम सचमुच आज़ाद होंगे।"
ठठेरे ने बिना कुछ पूछे औज़ार उठाया।
धातु पर नोक टिकाई।
खट्।
खट्।
खट्।
देर तक वह आवाज़ दुकान में गूँजती रही—एक-एक अक्षर, धीरे-धीरे उकेरा जाता हुआ।
प्रधानाचार्य वहीं बैठे रहे।
उन्होंने न अपना नाम बताया, न किसी और का।
काम पूरा होने पर ठठेरे ने घंटी लौटा दी।
"किसके लिए है, साहब?"
प्रधानाचार्य ने घंटी उठाई। उसका वज़न हाथ में तौला।
"स्कूल के लिए," उन्होंने कहा। और कुछ नहीं।
अगली सुबह घंटी फिर बरामदे के खंभे से टँगी थी।
चपरासी ने हमेशा की तरह रस्सी खींची।
टनऽऽऽऽन।
बच्चे कतार में जुट गए।
प्रधानाचार्य खिड़की के पास खड़े रहे।
किसी ने घंटी को नहीं देखा।
उन्होंने खिड़की बंद की और रजिस्टर वापस मेज़ पर खींच लिया। आगे और भी नाम दर्ज करने थे।
बरसों बाद, किसी और पंद्रह अगस्त की सुबह, एक बच्चा घंटी के पास से दौड़ता हुआ निकला।
उसकी उँगली किनारे से छू गई। वह रुक गया।
धातु पर उकेरे कुछ अक्षर धूप में दिखाई दे रहे थे।
उसने सिर झुकाकर पढ़ने की कोशिश की।
पीछे से किसी ने पुकारा—
“चल!”
बच्चा भाग गया।
घंटी वहीं रही।
उस पर लिखे अक्षर भी।
