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Shree Kant

Abstract

4.5  

Shree Kant

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टिन का डब्बा

टिन का डब्बा

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विकास ने अलमारी के सबसे ऊपरी खाने से टिन का डिब्बा उतारा।


किनारों पर जंग चढ़ आई थी। ढक्कन अब भी वैसे ही अटका था—बाईं तरफ़ से थोड़ा तिरछा दबाओ, तभी खुलता था। बचपन से यही तरीका था।


अंदर सात-आठ राखियाँ थीं। रंग उड़ चुके थे, धागे जगह-जगह से उधड़ गए थे।


सबसे नीचे वाली राखी रीतू ने बनाई थी। तेरह साल की उम्र में। माँ की सिलाई की पिटारी से चुराए हुए ज़री के टुकड़े से।


विकास ने डिब्बा बंद नहीं किया। उसे सेंटर टेबल पर रख दिया। शायद रीतू की नज़र पड़ जाए। शायद वह पूछे—“ये अभी तक रखा है?” और दोनों वैसे ही हँस पड़ें जैसे कभी हँसते थे।


आज राखी थी। शादी के बाद रीतू पहली बार आ रही थी। साथ में संजय था। और उसकी माँ भी।


“बच्चों को इतनी दूर अकेले थोड़े ही भेजते हैं।”


ग्यारह बजे गाड़ी नीचे रुकी। विकास बालकनी में खड़ा था। रीतू उतरी। साड़ी का पल्लू ठीक किया और ऊपर देखा। मुस्कुराई।


अंदर आते ही रस्म शुरू हो गई।


संजय ने घड़ी देखी।


“साढ़े बारह तक निकलना होगा। माँजी की फ्लाइट है।”


रीतू ने राखी बाँधी। नई थी। चमकीली।


विकास ने कुछ नहीं कहा।


उसने लिफ़ाफ़ा आगे कर दिया।


“थैंक्यू, भैया।”


विकास ने हल्का-सा सिर हिला दिया।


“चाय?”


“नहीं भैया। अभी निकलना है। ट्रैफ़िक बहुत रहता है इस तरफ़।”


विकास पानी की बोतल लेने रसोई में चला गया। दो मिनट बाद लौटा तो रीतू सेंटर टेबल के पास अकेली खड़ी थी। उसकी नज़र टिन के डिब्बे पर थी।


पंद्रह मिनट बाद संजय ने घड़ी देखी और उठ खड़ा हुआ।


“चलें, माँ?”


दरवाज़े तक पहुँचकर रीतू अचानक रुकी। संजय और उसकी माँ कुछ कदम आगे निकल चुके थे। वह पीछे मुड़ी।


“भैया…”


“हूँ?”


“वो डिब्बा…” एक पल चुप रही। “अभी भी है?”


विकास ने उसकी आँखों में देखा। “हाँ।” रीतू ने सिर हिला दिया। “अच्छा।” बस इतना। फिर वह चली गई।


गाड़ी मोड़ से ओझल हुई तो विकास भीतर आया। टिन का डिब्बा वहीं खुला पड़ा था। सबसे ऊपर एक काग़ज़ का छोटा-सा टुकड़ा था।


उसने उसे उठाया।


काग़ज़ खोलते ही एक अधूरी राखी उसकी हथेली पर आ गिरी। कच्चा धागा। ज़री का छोटा-सा टुकड़ा। ठीक वैसा ही।


विकास देर तक उसे देखता रहा।


फिर उसने डिब्बे के सबसे नीचे वाली राखी निकाली और दोनों को पास रख दिया। एक तब की रीतू ने बनाई थी। दूसरी आज की रीतू ने। वह अधूरी थी। आख़िरी गाँठ बाकी थी। दोनों राखियाँ उसने डिब्बे में रख दीं।


ढक्कन को बाईं तरफ़ से थोड़ा तिरछा दबाया।


टक।


डिब्बा बंद हो गया।


विकास ने डिब्बा वापस अलमारी के सबसे ऊपर रखा। फिर कुछ सोचकर उसे उतार लिया। अलमारी में नीचे एक खाली जगह थी। उसने डिब्बा वहीं रख दिया।


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