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H.D kumhar

Inspirational

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H.D kumhar

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मैं ऐसा क्यों !

मैं ऐसा क्यों !

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एक 35 साल का आदमी हाथ में थैली लेकर रेलवेस्टेशन के पास जा रहा था. उन्होंने थोडे फटेटूटे कपडे पहने हुए थे, पांव में जुते अलग-अलग थे और उदास चेहरे के साथ इधर-उधर घूम रहा था. कुछ सोचते हुए उस आदमी ने दूसरे आदमी से पूछा, “भाई ये ट्रेन कहां तक जाती है?” पहले तो वो आदमी उस आदमी की ओर देखता है और उससे ही पूछता है, “तुम्हे जाना कहां है? लगता तो नहीं तुम्हें कहीं जाना होगा !” यह कहते हुए वो आदमी हंस पडा. उस आदमी को हंसता देख, पहला आदमी मायूसी स्वर से बोला, “वो मैं आपको नहीं बता सकता !” यह सुनकर दूसरा आदमी हंसते हुए बोला, “तो फिर मैं भी तुम्हें नहीं बता सकता कि ट्रेन कहां जाती है !” इतना बोलकर वो आदमी चला जाता है. 

वह आदमी उस आदमी को जाता देख अपने आपसे बोलता है, “क्या मैंने कोई गलत सवाल पूछ लिया जो मुझे जवाब नहीं दिया !” ऐसा सोचते हुए वो आदमी ट्रेन जहां आती है वहां खडा होकर सामने की ओर देखने लगता है. वे जहां पर खडा था उसके बाजु में एक बेंच थी जहां एक 65साल के बूढे दादाजी बैठे थे. बूढे दादा उस आदमी की ओर देख रहे थे. आदमी जब इधर-उधर देख रहा था तब उनकी नजर दादा पर जाती है, दादा उसे देख रहे थे उन्होंने नजर नहीं हटाई लेकिन उस आदमी ने अपना मुँह फेर लिया.

थोडी देर बाद ट्रेन के आने की आवाज आते ही सभी लोग शोर करते हुए, भागादौडी करने लगते है. ट्रेन के पास खडे उस आदमी को लोग धक्का देते हुए बोलने लगे, “अगर जाना नहीं है तो इधर क्यों खडा है?”

“कहां-कहां से लोग आ जाते है !”

“ओ भाई ट्रेन को देखना है तो एक तरफ खडे होकर देखो !”

“हटो भाई मुझे जाने दो, मुझे देर हो रही है !”

एक औरत उनके कपडे देख बोली, “ओ मांगनेवाले भाईसाब जरा हटिए हमें जाने दे, कहीं ओर जाकर खडे होकर भीख मांगो !”

 लोग उस आदमी को धक्का देते हुए तेजी से जाने लगे. सभी कुछ न कुछ बोले जा रहे थे लेकिन वो आदमी किसीको कुछ न बोल सका. ट्रेन आते ही सब लोग चले जाते है. वह आदमी उपर देखते हुए अपने आपसे बोला, “मै ऐसा क्यो ! आखिर लोग मुझे देख ऐसा क्यों सोच रहे है !” सोचते हुए आदमी जब फिर से बूढे दादाजी की ओर देखता है तो वह उसे ही देखे जा रहे थे. वह आदमी मनमें सोचता है, “क्या ये दादाजी भी मुझे बेकार आदमी समझ रहे होगे !” वो आदमी मुँह फेरकर आगे चला जाता है.

वह आदमी दूसरे दिन उसी जगह खडा होकर ट्रेन का इंतजार करने लगता है. फिर से वही सब हुआ जो पहले हुआ था. आज भी वही दादा उसी जगह बैठकर उस आदमी को देख रहे थे. वह आदमी मुँह फेरकर आगे चला जाता है. 

शाम हो गई थी, वह आदमी हाथ में थैली लेकर रेल की पटरी पर खडा होकर उपर देखकर कुछ सोच रहा था. वे बूढे दादा लकडी के सहारे धीरे-धीरे चलते हुए सामने से आ रहे थे. ट्रेन आने की आवाज आती है फिर भी वो आदमी रेल की पटरी पर खडा था, उनकी आंखो से आंसू बेह रहे थे. ट्रेन दिखाई देते ही बूढे दादाने उस आदमी का हाथ जोर से खिंचा और उसे बाहिर निकाला. यह देख वह आदमी एकदम से शॉक्ड हो गया. वह ट्रेन की ओर देखता है फिर दादा के सामने देख मायूसी स्वर में बोला, “मेरा आखरी मौका भी गवाह दिया ! आपने मुझे क्यों बचाया ! आज मैं शांति के रास्ते चला जाता !” इतना बोलते हुए वह रोने लगा. दादाने उसे एक बेंच पर बिठाया और पानी की बोतल देकर बोले, “तुम आखिर मरना क्यों चाहते हो ! तुम्हें कोई परेशानी है?” आदमी बोला, “दादाजी जीने की भी कोई वजह नहीं है ! आखिर मैं जीकर क्या करुंगा ! मेरे जैसे लोग जीकर क्या करेंगे ! रोते हुए वह रुक जाता है. दादाजी बोले, “एक बात बताओ, तुम जीकर भी अपने आपको साबित नहीं कर पाए तो मरने के बाद क्या साबित करना चाहते हो ! तुम किसे समझाने चले हो?”

वह आदमी बोला, “हर कोई मुझे बेकार समझ रहा है ! बचपन में अपने माता-पिता को गवाह दिया, चाचा-चाची मुझे निकम्मा और काम चोर सम्झते थे, स्कूल में बच्चे मुझे कमजोर समझकर चिढाते रहते थे, फिर बीवी बच्चोने यह कहते हुए मुँह फेर लिया कि आपने हमारे लिए कुछ नहीं किया. उसे भी अब मेरी चिंता नहीं है ! अब आखरी रास्ता बचा है मरने का फिर भी लोग मुझे ताने मारना नहीं छोड रहे ! पता नहीं आखिर मैं ऐसा क्यों हूँ !”

दादाने समझाते हुए बोला, “तुम ऐसे इसलिए हो क्योंकि तुम ऐसा सोच रहे हो ! मुझे देखलो मैने अपनी जिंदगी के 65साल काट दिए भी फिर जी रहा हूँ. मै इसी रेलवे में नौकरी करता था, लोग मुझे भी ताने देते थे फिर भी कभी जिंदगी से हार मानकर मरने के बारे में नहीं सोचा और तुमने अभी से ही हार मान लि ! क्या तुम्हें ऐसा लगता है सिर्फ तुम्ही हो जिसके बारे में लोग ऐसा सोच रहे है. मैंने भी अपनी जिंदगी में ऐसे लोगो के ताने सुने है लेकिन मैं उस पर ध्यान नहीं देता था अगर मै दूसरे के बारे में सोच-सोचकर अपने आपको दोष देता तो शायद मैं भी अभी तक जिंदा न होता. ” दादा कुछ सोचते हुए अटक जाते है.

वह आदमी बोला, “दादाजी आप के अंदर दुनिया से लडने की ताकत थी इसलिए आप जी रहे है लेकिन मुझ में तो वो ताकत है ही नहीं ! लोग मुझे भिखारी, निकम्मा, कामचोर, बेकार समझते है ! मेरी पहचान ऐसी है इसलिए मैं जी नहीं सकता !”

दादा बोले, “तुम दुनिया को नहीं बदल सकते लेकिन अपने आपको तो बदल सकते हो न ! तुम्हें जीना है क्योँकि तुम्हें अभी बहुत कुछ करना बाकि है. इस तरह हार मानकर तुम दुनिया से मुँह नहीं फेर सकते. पहले नहीं हुआ तो क्या हुआ, तुम्हारे पास अभी भी कुछ करने का मौका है. मैंने तुम्हें ऐसे ही नहीं बचाया, तुम्हारे अंदर कुछ कर दिखाने की चमक है लेकिन तुम्हें तो सिर्फ काला ही दिखाई देता है. जाओ अपने जीवन का नया रास्ता खोजो और एक नई पहचान बनाओ ! अगर तुम कुछ करके दिखाओगे तो वही लोग तुम्हारी तारिफ करेंगे ! तुम चाहो तो समय को बदल सकते हो और फिर से अपने परिवार के पास लौट सकते हो ! तुम इसलिए ऐसे हो क्योंकि तुम जैसा चाहो वैसा कर सकते हो ! तुमने जो नहीं किया वो अब कर सकते हो. सोचना तुम्हें है आखिर तुम क्या करना चाहते हो !”

दादाजी की बात सुनकर उस आदमी को जीने की वजह मिल जाती है. वह खुश होकर दादाजी को धन्यवाद करते हुए अपना नया रास्ता खोजने चल पडता है. जब वापस मुड़कर देखता है तो वहां कोई नहीं था. इसका मतलब शायद ईश्वर ही उसे समझाने आए थे.     

तुम दिन हारे हो जिंदगी नहीं इसलिए चलो उठो और अपना रास्ता खूद ढ़ूँढो।


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