सागर जी

Drama


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सागर जी

Drama


मां, पापा ओ पापा

मां, पापा ओ पापा

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"मां... पापा....ओ पापा.... मैं आपकी बेटी"

चंदन - हां बेटी, मैं आया।रमा - क्या हुआ !

चंदन नींद से उठता है।चंदन - रमा, मुझे ऐसा लगा कि मुझे कोई बच्ची पापा कहकर बुला रही है।रमा(मुस्कुराते हुए)- सपने मुझे आने चाहिए और देख तुम रहे हो, लेकिन एक बात कहूं, तुम मां-बाबूजी की बात में आकर सही नही कर रहे हो।चंदन - तुम फिर उस बात को लेकर बैठ गई, बात को समझो रमा, मैं अपने मां-बाप का एक ही लड़का हूं और ज़रा सोचो, इस बार भी तुम्हारे पेट में लड़की हुई तो.....

रमा - तो क्या, पता नहीं लड़की के नाम से तुम और तुम्हारे परिवार वाले इतना घबराते क्यों हैं।चंदन - तुमसे तो बात करना ही बेकार है, सो जाओ । (और चंदन हो जाता है )

रमा उस सोच में डूब जाती है जिसमें अकसर अधिकांश माएं डूब जाती हैं ।निराश, उदास हो जाती हैं पर कर कुछ नहीं पाती।रमा सोचती है - क्या , वास्तव में लड़का ही किसी परिवार का आधार होता है, क्या लड़के से ही किसी वंश, किसी परिवार की पहचान होती है और वंश आगे बढ़ता है, नही, अगर ऐसा होता तो गंधारी के 100 पुत्र होते हुए भी एक भी उसके वंश का अभिमान नही बन सका, फिर श्रवण से पुत्र तो बड़े भाग्य से मिलते हैं, लेकिन (अपने गर्भ को सहलाते हुए) इस बार मैं अपनी बच्ची को जन्म देकर ही रहुंगी, अपनी पिछली बच्चियों की तरह....(इस तरह सोचते-सोचते उसे नींद आ जाती है। 

सुबह तैयार होते समय चंदन कहता है -

रमा आज अस्पताल चलना है, तैयार रहना।  रमा कोई जवाब नही देती, बस हां में सर हिला देती है।चंदन - क्या बात है, चिंता मत करो यार, इस बार हमें वैसा नही करना होगा।ये सुनकर रमा की आंखें चमक उठती हैं।चंदन - मुझे पूरा यकीन है इस बार लड़का ही होगा।रमा फिर मायूस हो जाती है । तभी चंदन की मां उसे आवाज़ लगाती है।दीपा - चंदन, बेटा चन्दन, यहां तो आ।चंदन - हां मां, अभी आया.... बोलो मां

दीपा - तुझे याद है न आज डाॅक्टर के पास जाना है, बेटा मेरा मन कह रहा है, अबकी बहू के पेट में लड़का ही होगा । मैं मय्या जी के दरबार में सौ नारियल चढ़ाऊंगी। बेटा, बहू तैयार है न ?

चंदन - हां मां, कैसे तैयार नही होगी ( और वह रमा से कहता हुआ निकल जाता है)

दीपा - देखना जी, पोता ही होगा।मोहन - हां, तुम्हारा मन कहता है तो, शायद ऐसा ही होगा, अरे हां, पिछली दो बार भी तो तुम्हारा मन यही कह रहा था।दीपा - हां हां कह रहा था, लेकिन इस बार मेरी इच्छा अवश्य पूरी होगी, तुम देखना।मोहन - ईश्वर वही करे, जो तुम्हारे लिए अच्छा हो।  3

चंदन - रमा... रमा.... क्या तुम तैयार हो ? रमा तैयार होकर आती है, उसकी सास उससे कहती है - बहू, इस बार खुशखबरी लेकर ही आना और बेटा, माता के मंदिर में माथा अवश्य टिकाना, माता से आशीर्वाद अवश्य लेना।वाह री दुनिया ! एक देवी दूसरी देवी से कह रही है कि उसे देवी नही चाहिए, चाहे घर में असुर पैदा हो जाए, पर हो लड़का ही।चंदन - चलें ( रमा सर हिलाते हां में जवाब देती है )

चंदन उसे लेकर मंदिर में जाता है। मंदिर में उसे प्रार्थना के दौरान फिर वही पुकार सुनाई देती है - " पापा.... ओ पापा..... मैं आपकी बेटी हूं ।"

चंदन इधर-उधर देखता है पर उसे ऐसी कोई बेटी नही दिखाई देती, क्योंकि उसकी प्रार्थना, उसके सपनों में तो बस बेटे की ललक जो है।अस्पताल पहुंचकर उन्हें पता चलता है कि डॉ के आने में अभी काफ़ी देर है, तो वे प्रतिक्षा कक्ष में प्रतिक्षा करते हैं, फिर चंदन के कानों में वही स्वर गूंजता है -" पापा.... ओ पापा.... मैं आपकी बेटी "

चंदन - तुमने कुछ सुना रमा !

रमा - क्या ?

चंदन - कुछ नही।रमा - सुनो, देखो मेरी बात मान लो, क्या हो जाएगा अगर बेटी हुई ? क्या पता वो हमारा सहारा बन जाए, उसी से हमारे वंश की पहचान हो।चंदन - तुम चिंता मत करो यार, बेटा ही होगा।तभी नर्स आकर उन्हें सूचित करती है कि डॉ को एक केस के सिलसिले में बाहर जाना पड़ा इसलिए वे नही आ पाएंगे । चंदन और रमा घर लौट आतें हैं।‌‌‌  4

दीपा - क्या कहा बेटा डॉ ने, लड़का ही है न!

चंदन - नही मां आज डॉ से मुलाकात नही हो पाई।दीपा - तो कहीं और चले जाते।चंदन - मां, तुम भी कैसी बात करती हो, रवि मेरा दोस्त है इसलिए ये गैर-कानूनी काम मेरे लिए कर रहा है।दीपा - अच्छा-अच्छा, फिर कब जाना है ?

चंदन - पता नहीं, वो कब तक लौटेगा।   5

सब लोग खाने की मेज़ पर खाना खाने के लिए बैठे होते हैं।चंदन - मां-पापा, एक बात कहनी है।दीपा - क्या बात है, क्या कोई परेशानी है ?

मोहन - क्या हुआ चंदन बेटा, क्या बहू ने कुछ कहा ?

चंदन - नही पापा...... कुछ दिनों से मुझे ऐसा लग रहा है कि कोई बच्ची मुझे पुकार रही है।दीपा - धत्त, बच्ची नही बच्चा, बेटा कह बेटा, ज़रूर मेरा पोता होगा । हे मय्या इस बार कृपा कर दे, सौ नारियल चढ़ाऊंगी।मोहन - और अगर न हुआ तो कितने ?

दीपा - शुभ-शुभ बोलो जी, बेटा तू बेकार में परेशान हो रहा है, इस मौके पर इस तरह के सपने आते ही हैं, तू चिंता मत कर।मोहन - हां बेटा, सब उस पर छोड़ दे।चंदन - लेकिन मां ये एक बार नही बार-बार हो रहा है। कल रात सपने में, फिर मंदिर में और फिर अस्पताल ....मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा है।दीपा - तू चिंता मत कर, मय्या पर भरोसा रख, बेटा ही होगा।क्यों, आख़िर क्यों, इस तरह की सोच, क्या बेटे के होने से सब पूर्ण हो जाएगा ? हमें कोई दुःख कभी न होगा ? क्या हमें पता है कि हम किसका वंश चला रहे हैं ? हूं ..मूर्ख मानव न जाने कब समझेगा । इस सृष्टि के सही संचालन के लिए स्त्री-पुरुष दोनों का होना आवश्यक है ,पर मैं क्या, मेरे जैसे कितने लोग समझाते रह गए और समझाते रहेंगे, पर क्या इस तरह की सोच कभी ख़त्म हो पाएगी । ख़ैर ?

सुहानी रात, सब जगह एक सूकून भरी शांति सी, मन को सुख देने वाली रात, फिर वही स्वर, वही पुकार - पापा.... ओ पापा , मैं आपकी बेटी। क्यों पापा ! मुझे देखे बिना, मुझे पकड़े बिना, मुझे भी मेरी बहनों की तरह पेट में ही मार दोगे । पापा, आप बहुत निर्दयी हैं । आपकी मां ने भी तो कभी एक लड़की के रूप में जन्म लिया और मेरी मां ने भी । जब इन दोनों का आपके जीवन में इतना महत्व है तो फिर मुझ अजन्मी से इतना बैर क्यों ? पापा मुझे बचा लो,मुझे बचा लो पापा, प्लीज़ बचा लो।चंदन चौंककर उठ बैठता है। रमा भी उसे देखकर उठ जाती है और उसे पानी पिलाती है। वह पानी पीता है, इधर-उधर देखता है जैसे किसी चीज़ को खोज रहा हो।रमा - क्या हुआ जी, कोई बुरा सपना देखा ?

चंदन रमा के पेट पर कान लगाता है जहां से उसे वहीं स्वर सुनाई देता है... पापा....ओ पापा.... मैं आपकी बेटी।चंदन - हां बेटी, तू मेरी प्यारी बेटी, मैं मूर्ख था जो इस तरह का पाप करने को जा रहा था, रमा, अब चाहे बेटी हो या बेटा, दोनों मंजूर।रमा ये सुनकर बहुत ख़ुश हो जाती है और वे दोनों आज बहुत दिनों बाद बड़े संतोष की नींद लेते हैं।

अगले दिन चंदन के माता-पिता चंदन, रमा नाश्ता कर रहे होते हैं, तभी चंदन की मां कहती है - बेटा, कल रात मैंने एक अजीब सा सपना देखा।रमा और चंदन (चौंककर) क्या !

दीपा - मैंने देखा देवी माता की मूर्ति से एक दिव्य प्रकाश निकला और बहू के गर्भ में समा गया, फिर मेरी नींद खुल गई । चंदन बेटा, मुझे लगता है ये मय्या का संदेश था कि बहू के पेट में मय्या का ही अंश है। साक्षात मय्या जन्म लेने वाली है और मैं मूरख, न जाने क्यों बेटा-बेटी के फेर में पड़ गई। बहू, अब अस्पताल जाने की कोई ज़रूरत नही, अब तो देवी मां के स्वागत की तैयारी करो।रमा और चंदन ये सुनकर बहुत ख़ुश होते हैं। ख़ुश हो भी क्यों न, बेटा हो या बेटी, दोनों हमारा अंश है, उनसे पूछो न जिनकी संतानें नही होती, या होकर भी न के बराबर होती हैं। एक परिवार पूर्ण तभी होता है जब उसमें कोई भी संतान हो, चाहे बेटी हो या बेटा, और कुछ भी हो, हमें इसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि ये हमारे हाथ में नही, ये तो ऊपर वाला तय करता है कि हमें संतान हो या हम संतानहीन रहे । यदि सृष्टि का संतुलन बनाए रखना है तो हमें इस भेद को मिटाना होगा, अन्यथा एक दिन इस धरती पर न मां होगी और न बेटी, और जब इन दोनों में से कोई न होगा तो क्या हम होंगे, क्या हमारा वंश होगा? जिसकी हम दुहाई देते हैं, जैसे ये शरीर दो आंखों, दो कानों, दो होंठों, हाथ-पैरों आदि कई अन्य अंगों के होने से सुंदर है, ऐसे ही एक परिवार संतान से सुंदर है चाहे बेटा हो या बेटी । आज की बेटी ही कल की मां होगी, फिर छोड़ो इस भ्रम को, वरना फिर हर बेटी को चंदन की बेटी की ही तरह जन्म लेने से पहले पुकारना होगा " मां... मां...पापा...ओ पापा.. मैं आपकी बेटी।"


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