Kallol Mukherjee

Abstract Drama


4.7  

Kallol Mukherjee

Abstract Drama


लॉकडाउन में प्रेम को झांकती एक बालकनी

लॉकडाउन में प्रेम को झांकती एक बालकनी

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बचपन में दादी कहती थी कि जब दुनिया में डाक, टेलिफ़ोन इत्यादि का आविष्कार नहीं हुआ था तब लोग अपना सन्देश कबूतरों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाते थे। आज, वो चाह रहा हैं कि, उसकी बालकनी में बैठा यह कबूतर उसका सन्देश वहाँ पहुँचा दे, जहाँ से पिछले दो दिनों में, एक फ़ोन तक नहीं आया हैं। फ़ोन वो भी कर सकता हैं लेकिन वो करता नहीं हैं सोचकर, घर में हैं, व्यस्त होगी, घर वाले होंगे, पूछताछ हो जायेगी।

वो चुपचाप, लॉक डाउन के कारण पसरे सन्नाटे का आनंद, अपनी बालकनी में बैठ, शाम के सूरज के साथ ले ही रहा होता हैं कि तभी उसका फ़ोन बज उठता हैं। वो जल्दी से फ़ोन देखता हैं लेकिन किसी का कॉल नहीं आया हैं। एक भ्रम हैं, जो अक्सर व्यस्त ज़िन्दगी से अचानक निठल्ले होकर घर पर पड़ जाने से होता है। कबूतर अब भी वहीँ बैठा हुआ है जैसे एक पोस्ट बॉक्स हो, जो चिट्ठी के भर जाने के इंतज़ार में है।

यह अन्धविश्वास हैं, वो इन सब में नहीं मानता और सोचने लग जाता हैं प्रेम के बारे में, कि कैसे उसका प्रेम उसके लिए दुनिया भर के काम काज के बाद, थकान में सुकून देने जैसा था। अब थकन नहीं है, तो प्रेम भी नहीं है। या फिर है, बस प्रेम को वक़्त नहीं। कहीं प्रेम उसको सबसे अंत में जगह देने का बदला तो नहीं ले रहा है? वो सोचता है, ऐसा क्यों हैं कि जैसे ही दूरियां बढ़ती हैं उन दोनों के बीच प्रेम कम होने लगता हैं; पीछली बार जब वो टूर पर गया था तब भी उसका एक कॉल नहीं आया था! क्या वो उससे सच में प्रेम करती है ? वो घबरा जाता है और एकदम से काँप उठता हैं। उसके कम्पन से कबूतर उड़ कहीं चला जाता है। वो निराश होकर फ़ोन की तरफ़ देखता हैं।

उसका लॉक खोलता है, दो-चार बार ऊपर नीचे करता है और मन में उस फ़ोन को फेंक देने जैसे गुस्से के उफ़ान के बावजूद, उसे एक किनारे रख देता है। सूरज ढल आया है और उसे आस पास कहीं से कुछ लोगों के बात, हँसी-ठिठोली की अवाज़ आती है। वो इधर-उधर देखता है और पाता है, उसके अपार्टमेंट में ही एक परिवार बालकनी में आकर किसी के साथ वीडियो कॉल में बतिया रहा है। वो सोचता है, तकनीक के इतने आगे निकल जाने के बावजूद भी वो आज खुद को कितना पिछड़ा महसूस कर रहा है। वो यह सब सोचते-सोचते आँखें बंद कर लेता हैं।

कुछ देर बाद, जब अपार्टमेंट में लोगों के घरों में, बालकनी में बल्ब जल उठे हैं, उसकी आँखें, उसके पैर पर कुछ टकराने से खुलती हैं। वह उठता है और देखता है कबूतर दोबारा बालकनी में ठीक उसी जगह बैठा है और एक कागज़ का टुकड़ा ज़मीन पर पड़ा हुआ हैं। वो उसे उठाता है और पढ़ता हैं, “I MISS YOU, LOCKDOWN DAY 10.” वो मुस्कुराता है और झट से अपनी बालकनी के बाहर देखने लगता है। वो ऊपर देखता है और एक लड़की को झांकते पाता हैं. “I am sorry! वो एक कबूतर।।! आह.. I hope you won’t mind anything.” वो उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराता है और बिना कुछ कहे अंगूठा दिखाकर सहमति देता हैं।

वो अब कुछ नहीं सोचता और फैसला लेता हैं कि जिस दिन यह सब ख़त्म होगा, वो सीधे उससे मिलने जाएगा और गले लग जायेगा। चाहे सारा समाज उसे देख रहा हो वो बिल्कुल नहीं घबराएगा और उसका माथा चूम लेगा क्योंकि सब ख़त्म हो जाने के बाद भी अगर कोई चीज़ उसे ज़िंदा रखे हैं, तो वह प्रेम हैं। प्रेम ही है जो समाज को बांधे हुए हैं। प्रेम ही सत्य है।


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