Kallol Mukherjee

Abstract


4.5  

Kallol Mukherjee

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मैं अब इस कैफ़े में नहीं आता

मैं अब इस कैफ़े में नहीं आता

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मैं अब इस कैफ़े में नहीं आता। बीते तीन सालों में बहुत बार परिस्थितियों से भागने के लिए मैं ओल्ड मनाली आया हूँ लेकिन मैंने हमेशा इस कैफ़े से मुँह मोड़ लिया है। आज पता नहीं क्यों लेकिन मैं उसी कैफ़े में, उसी चिरपरिचित टेबल पर बैठकर, लकड़ी की खिड़की से धूप के एक टुकड़े का इंतज़ार कर रहा हूँ।

कैफ़े काफ़ी बदल गया है; इलाके में नए कैफेज़ बन जाने के कारण अब शायद यहाँ लोग कम आते हैं। कैफ़े में बहुत कम लोग होने के बावजूद, एक किनारे से आते इसराएलियों के ठहाकों और जलते चरस की ख़ुशबू ने इसे ज़िंदा रखा हुआ है।

कल रात हुई बर्फ़बारी ने प्रकृति को बर्फ की एक पतली परत से ढक दिया है और इतना शांत कर दिया है कि पास ही गुजरती मनास्तु नदी के साथ बह जाने का भ्रम भी नहीं होता। पहाड़ों पर मौसम बहुत जल्दी बदलता है जैसे मौसम ना हो इंसान हो और इस बदलाव में कुछ रह जाता है तो वो है, पहाड़ – ऊंचे, निडर पहाड़।

खैर, टेबल पर चाय के कप रखने की आवाज़ से मेरा भ्रम टूटता है और मैं देखता हूँ कि मेरा हाथ अब भी धूप का इंतज़ार करते मैग्गी के बाउल के पास है। अब मैग्गी के बाउल से धुआं नहीं उठ रहा; ठंडा पड़ चुका है शायद धूप के इंतज़ार में।

मैं अब मैग्गी खाने के लिए हाथ नहीं उठता और ना ही चाय की एक चुस्की लेने के लिए। मैं चुप चाप चाय के कप से उठते धुएं को देखता रहता हूँ, ठंड को झेलते हुए कि कब तक यह चाय अपने अंदर इस गर्मी को रख पाता है। कितना अजीब है ना?जब तक यह चाय इस ठंड में शरीर को गर्मी पहुँचा सकती है तब तक इसका मूल्य है वर्ना ठंडी चाय कौन ही पियेगा! कभी किसी को ठंडी चाय का स्वाद लेते नहीं देखा है मैंने। ठंडी चाय को हमेशा फेंक दिया जाता है और मुझे पता है कि मेरी चाय का अंजाम भी यही होगा – लेकिन मैं फिर भी इस चाय को नहीं पीता और ठंडा होते देखता हूँ खुद की तरह, धूप के एक टुकड़े के इंतज़ार में।

ठंड में धूप का एक टुकड़ा एक ऐसे सुख की प्राप्ति कराता है जिसे आप कभी खरीद नहीं सकते। यह भी एक तरह का प्रेम है, जिसे सिर्फ पहाड़ों पर ही महसूस किया जा सकता है और मैं अब भी वहीं बैठा उसी सुख का इंतज़ार कर रहा हूँ।

तभी सामने, एक पतली कद काठी का, हिमाचली टोपी और कपड़े पहने बूढ़ा अपनी चाय लेकर मेरे सामने वाली कुर्सी पर आ बैठता है। मैं आस पास देखता हूँ – कैफ़े में सभी कुर्सियाँ लगभग खाली है। मैं हैरान होकर उसकी तरफ देखता हूँ तो वो एकाएक मुझे ही देख रहा है और मुस्कुरा रहा है। मैं भी उसे देख मुस्कुरा देता हूँ। वो ठिठुरते हाथों को जोड़ चाय के कप को पकड़ता है, गर्माहट को महसूस करता है और एक चुस्की लेता है। साथ ही वो जेब से एक बीड़ी निकालता है और जलाता है। खुशबू चरस की है। दो तीन कश लेता ही है कि वो बीड़ी आगे,मेरी तरफ बढ़ा देता है। मैंने सुबह से बैठे बैठे तीन जॉइंट फूंक लिए है लेकिन मैं वहाँ रुक नहीं पाता और उनके हाँथ से बीड़ी लेकर फूंकने लगता हूँ।

वो अब मेरी तरफ़ देखकर दोबारा मुस्कुराते हैं। उनकी चाय खत्म हो चुकी है। मैं उनकी तरफ देखता हूँ और उल्टी कर देता हूँ। शब्दों की उल्टी; अंदर बैठे तीन सालों के दर्द की उल्टी, धूप के उस टुकड़े के इंतज़ार की उल्टी। वो मेरी बातें चुप चाप सुनते रहते हैं जैसे वो एक इंसान नहीं एक मूर्ति हो। इंसान का मूर्ति हो जाना बहुत अच्छा है खासकर उनके लिए जो बहुत से भार साथ मे लिए घूमते हैं।

एक लंबे मोनोलॉग के बाद जब मैंने उस बूढ़े को ध्यान से देखा तब मैंने उसका एक हाँथ टेबल पर पाया जैसे वो भी अब धूप के टुकड़े का इंतज़ार कर रहे हों या फिर सालों पहले छूटा धूप के टुकड़े का सुख उन्हें याद आ गया हो। तभी, धूप का एक टुकड़ा, लकड़ी की पुरानी दीमक लगी खिड़की से अंदर आती है और टेबल पर पड़ती है। बूढ़ा धीरे से अपना हाँथ आगे बढ़ाता है और धूप सेंकते हुए आँखें बंद करता है। मैं अपने हाँथों को टेबल से हटा लेता हूँ और बूढ़े के लिए एक और हाँथ रखने की जगह बना देता हूँ।

बूढ़ा आँखें बंद किये ही दूसरा हाथ आगे करता है और फिर आँखें नहीं खोलता। धूप चली जाती है, लोग उन्हें बुलाते हैं लेकिन अब वो एक धूप बन गया है। वो एक लाश बन गया है। और, मैं शायद एक मूर्ति।


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