लोक व्यवहार: प्रेम का रिश्ता
लोक व्यवहार: प्रेम का रिश्ता
फिल्म की शूटिंग चल रही थी। शैली के शूट में अभी समय था। "सुना है बहुत खूबसूरत कस्बा है ये।" शैली ने अपने को-आर्टिस्ट देव को कहा।
"हाँ सुना तो मैंने भी है!" देव शूटिंग देखते हुए बोला।
"तो चलो ना थोड़ा घूम आया जाये।" शैली ने अपना पर्स उठाते हुए कहा।
"हाँ बात तो आपकी सही है पर. ! "
" छोड़ो पर वर... ! हमारी बारी आने तक लौट ही आएंगे।" "ओके चलते है !"
देव ने एकदम से हामी भर दी। शूटिंग ग्राउंड से निकलते ही बायीं ओर को तालाब था और उससे कुछ ही दूरी पर किला ! क़िले को देखने की चाहत में शैली के कदम खुद ब खुद उस ओर बढ़ गए। क़िले के बाहर चाय की दुकान थी। "चलो पहले चाय पी जाए ! "
जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ही वह एक कुरसी पर विराजमान हो कर बैठ गई।
"अदरक की खुशबू बिखेरती चाय और गरम गरम मठ्ठियां लाजवाब स्वाद!!"
चाय पीकर वे क़िले में दाखिल हुए। पर ये क्या!!
अंदर तो सैकड़ों घर बने हुए थे। विस्मय से शैली इधर उधर क़िले के अवशेष ढूँढने की कोशिश करने लगी।
पास से गुजरते एक राहगीर से पूछा तो वह मुस्कुरा दिया। "नाक की सीध में चले जाइए, कुछ अवशेष तो दिख ही जाएंगे।"
लगभग साढ़े तीन सौ घर होंगे वहां। अभी दो कदम ही बढ़ाए होंगे कि आवाज़ आई-
"आप यहाँ शूटिंग के लिए आयें हैं ना....बिना खाना खाये न जाने देंगे।" "जी !!!"
शैली इस निमंत्रण के लिए तैयार न थी। "और चाय हमारे घर!"
दूसरी ओर से आवाज़ आई। "आइए अंदर आइए !" तीसरी आवाज़ सुनाई पड़ी।
"यहाँ के लोग बहुत नेक दिल व मिलनसार हैं। हर आए गए की आवभगत करते हैं। आपको यहाँ बहुत आदर सत्कार मिलेगा!" देव ने बताया।
"और शहरों में तो.....!" शैली धीरे से बुदबुदाई।
"वहां तो कोई सही रास्ता बता दे इतना ही गनीमत है दीदी।
"अचानक तरूण की आवाज़ कानों में सुनाई पड़ी। "
"सच में!!! अगर मैं यहाँ न आती तो बहुत कुछ खो देती।"
शैली की आँखें नम हो आईं।
"और अब आप यहाँ बार बार आना चाहेंगी। क्यूँ है कि नहीं! "
"हाँ बिलकुल!!" शैली भर्राई आवाज़ में इतना ही कह पाई।
"चलें... शूट का वक़्त हो चला है !"
देव के कहने पर शैली जैसे सोयी सी जागी।
"हाँ चलते हैं पर आज मैं एक रिश्ता जोड़े जा रही हूँ इन सब के साथ।
प्रेम का खूबसूरत रिश्ता..!
जिंदगी का सबसे बड़ा उपहार! "
