लघु कथा -अनोखा रिश्ता
लघु कथा -अनोखा रिश्ता
लघुकथा - अनोखा रिश्ता साहित्यिक पटलों के माध्यम से संपर्क में आने और महज दो-तीन बार के आभासी संवाद के बाद नीलिमा ने राज को अपने पुस्तक-प्रकाशन की जानकारी दी, तो राज को बड़ी प्रसन्नता हुई। कुछ दिनों बाद ही नीलिमा ने संदेश भेजा, "मैं अपनी पुस्तक के साथ आपके और भाभी के लिए कपड़े भेज रही हूँ।" राज के लिए यह अप्रत्याशित था। उसने मना भी किया, "इसकी क्या ज़रूरत है?" नीलिमा ने उत्तर दिया, "क्यों? आप दोनों मुझे बहन-बेटी जैसा लाड़-प्यार देते हैं। तो क्या मेरा कोई अधिकार नहीं?" उसने अपने पतिदेव से भी बात कराई। उसके बाद तो राज के पास कुछ कहने को शेष ही नहीं बचा। संवाद यदा-कदा ही होते हैं। लेकिन नीलिमा हर दिन राज को 'सुप्रभातम्, प्रणाम' का संदेश ज़रूर भेजती है। राज भी उसके स्नेह को मानकर अपना स्नेह-आशीर्वाद आत्मीय भाव से भेज देता है। थोड़े दिनों में उसका स्नेह-उपहार राज को मिला, जिसे पाकर वह भावुक हो गया। मगर अफसोस भी हुआ कि अति-उत्साह में पुस्तक पैकेट में रखना वह भूल गई। आज भी दोनों अपने रिश्ते को ईश्वर का दिया अनमोल उपहार मानते हैं। खून के रिश्तों से परे, शब्दों से बुना यह बंधन उम्र और दूरी की सीमाओं से आज़ाद है। पुस्तक तो बाद में आ ही गई, पर उससे पहले जो अपनापन आ गया था, वही असली प्रकाशन था — मन के पन्नों पर लिखा एक रिश्ता, जो हर सुप्रभात के साथ और गहरा होता जाता है। सुधीर श्रीवास्तव
