सितारे छूना चाहूँ
सितारे छूना चाहूँ
कहानी सितारे छूना चाहूँ पढ़ाई में होशियार नवोदित धाविका सीता के सपने बड़े थे, मगर परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। जूनियर वर्ग की प्रतियोगिताओं में उसके नाम की खूब चर्चा होती थी। पिता उसकी उपलब्धियों से जहांँ खुश तो थे, मगर अपनी आर्थिक हालात को देखते हुए परेशान भी रहते थे कि वे बिटिया के सपनों को उड़ान दें पाने में अस्मर्थ महसूस कर रहे थे। सीता उम्र में अभी छोटी ही थी, मगर माँ की मौत और हालातों ने उसे समझदार बना दिया। उसके पड़ोसी गाँव की एक लड़की चंदा उसकी पक्की सहेली थी।वह भी सीता की सुख-दुख में शामिल रहती थी।एक दिन उसने अपने पिता से सीता के बारे में बताया, तब काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने सीता और उसके पिता को अपने घर बुलाया और सीता को हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया। सीता के पिता उनके कदमों में गिर पड़े, आपका यह अहसान कैसे चुका पाऊँगा। चंदा के पिता ने उन्हें उठाया, ढाँढस बंधाया, चिंता मत कीजिए। चंदा की तरह सीता भी आज से मेरी भी बेटी है है, अब उसे दो पिताओं का संरक्षण मिलेगा। चंदा भी चाहती है कि सीता के लिए मैं कुछ करुँ। उन्होंने सीता के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - तू बिल्कुल चिंता मत कर।तू अपने सितारे छू सके उसके लिए मैं कुछ भी करुँगा, बस तू सितारों के छूने के जिद यत छोड़ना।कल की चिंता छोड़कर मेहनत कर। हम हर हाल में हमेशा तेरे साथ खड़े रहेंगे। कोई जरूरत या परेशानी हो, तो मुझसे कहना बेटा। अब तू और चंदा दोनों मेरी बेटियाँ हों। तुम दोनों की खुशी में ही हमारी खुशी है। अपने पापा की बात सुनकर चंदा चहककर सीता से लिपट गई। सीता के पापा की आँखों में आँसू थे। हाथ जोड़कर उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया। चंदा के पापा ने उन्हें खींचकर कर गले लगाते हुए कहा - अब हम दोनों सीता बेटी के सितारे छूने के पलों का इंतजार करेंगे। इतना सुनते ही सीता के पापा फफककर रो पड़े। सुधीर श्रीवास्तव
