STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract

4  

Sudhir Srivastava

Abstract

उधार

उधार

2 mins
11

लघुकथा - उधार अपनी मुँहबोली बहन शीला के खाते में रमन ने बिना कुछ कहे जब पचास हजार की धनराशि भेजा तो थोड़ी देर बाद शीला ने फोन करके इस बारे में जानना चाहा। तो रमन ने कहा- ये पैसे तेरे लिए नहीं है, इससे तुझे अपनी उधारी खत्म करनी है बस। म..म..म..म..ग..ग..र..र..र....भैया! आपको कैसे पता चला? मैंने तो कभी आपसे कुछ कहा भी नहीं। क्योंकि मैं बेवकूफ हूँ, मुझे क्या पता है? मगर तू बड़ी सयानी है, खैर...! तुझे बेवजह की चिंता करने की जरूरत नहीं है, मैं हमेशा तेरे साथ हूँ। वो तो ठीक है लेकिन आपकी भी तो......! क्या पता मैं समय से वापस कर भी पाऊँगी या नहीं? मैंने तुझसे पूछा क्या? चुपचाप जो कहा है, करके बताना।कान खोलकर सुन ले, मुझे तुझ पर एक भी रुपए उधारी नहीं चाहिए, बस! मगर भैया मेरी बात भी तो सुनो....! क्या और क्यों सुनूँ? तुम ननद-भौजाई की एक ही समस्या है, सिर्फ अपनी सुनाना, सुनना तो जैसे तुम दोनों के शब्द कोश में है ही नहीं। ऐसा क्यों सोचते हैं? मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि...। मुझे पता है कि तू क्या चाहती है? मगर अभी तो हम दोनों जो चाहते हैं, सिर्फ उतना ही कर, बस। शीला रो पड़ी। किसी तरह उसने खुद को संयत करते हुए भर्राए स्वर में धीरे से कहा - जी भैया। सुधीर श्रीवास्तव


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Abstract