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Sudhir Srivastava

Abstract

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मधुमास का झोंका

मधुमास का झोंका

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लघुकथा - मधुमास का झोंका         पिछले कई वर्षों के बाद बेटा-बहू घर बसंत पंचमी के समय घर पर थे। चार वर्ष का उनका बेटा वीर दादी को पाकर जैसे निहाल हो गया।दिन भर दादी को दौड़ाता रहता। उम्र के इस पड़ाव पर भी दादी में जैसे नयी उर्जा का संचार हो गया था।       घर के सामने खेत में सरसों के फूल पीली चादर का बोध करा रहे थे। फूलों पर मंडराती तितलियों को पकड़ने की कोशिश में वीर बार-बार खेत में जाता और तितलियों को पकड़ने की कोशिश में भागता रहता।       दादी रोकती रहतीं मगर वो कहाँ मानने वाला था। लेकिन दादी को भी वीर का उछलना कूदना खूब भाता था।               जब बेटा बहू और वीर के जाने का समय आया तो वीर दादी से लिपट कर रोने लगा। मैं नहीं जाऊँगा, मुझे तितलियां पकड़ना है।      दादी ने उसे अपनी बाँहों में समेट कर पुचकारा - तुझे पढ़ना भी तो है न, मैं तेरे पापा को बोल दूंगी, वो तुझे लेकर फिर आ जायेगा। फिर हम दोनों मिलकर तितलियां पकड़ेंगे।         वीर आश्वस्त होते हुए बोला - सच दादी? दादी का स्वर भीग गया - यह कहते हुए कि हाँ मेरे लाल।          तीनों को विदा करते हुए उन्हें ऐसा लगा कि मधुमास एक झोंके की तरह आया और चला गया।  वह अपने आँसू पोंछते हुए अपने बच्चों को देर तक देखती रहीं।            सुधीर श्रीवास्तव  


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