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AMIT SAGAR

Comedy


4.8  

AMIT SAGAR

Comedy


लेगपीस

लेगपीस

11 mins 157 11 mins 157

जिस तरह जिन्दगी में प्यार , इश्क और मोहब्बत का महत्व होता है, ठीक वैसे ही शादी- पार्टी में खाने -पीने और मौज -मस्ती का महत्व होता है । प्यार , इश्क और मोहब्त के बिना जिन्दगी रेगिस्तानी बन्जर जमीन सी लगती है । बिना मौज-मस्ती के शादी व्याह भी बच्चो की पेरेन्ट्स मीटिंग सी प्रतीत होती है । जिसमें हमें न्योता तो बहुत इज्जत से जाता है पर खाने पीने को सिर्फ और सिर्फ हवा पानी ही मिलता है , वो भी बच्चो की शिकायती प्लेट में । इसीलियें लोग शादी व्याह में अतिथी का जमकर आदर सत्कार करते हैं । शादी व्याह में उनके लियें अच्छे अच्छे व्यंजन बनाये जाते है , डी. जे. बजवाया जाता है , ताकि वो अतिथी इन मस्ती भरे पलो को हमेशा याद रख सके । आज के इस आधुनिक युग में व्यंजनो का अकार प्रकार और रुप रेखा भी बदल रही है ।

पहले लोग ''रबड़ी-मलाई" को सबसे बहतर व्यंजन समझते थे , उसके बाद दौर चला ''पूरी - कचौरी'' का और आजकल के पैशन और फैशन में चिकन को ही सबसे बहतर व्यंजन समझा जाता है , साथ ही चिकन में लेग पीस का महत्व सर्वोपरि है । बिना लेग पीस के चिकन मतलब, बिना नग के अंगुठी । जब तक दावत में चिकन के साथ लेग पीस ना मिले तब तक ऐसा लगता है जैंसे सूखी प्याज से रोटी खा रहें हैं, या मानो बिना तड़के की दाल से । शादी मे दुल्हे को मोटर साईकिल ना मिलने पर भी इतना दुख नही होता जितना दुख शादी के अगली बार ससुराल में चिकन के साथ लेग पीस ना मिलने पर होता है । दोेस्ती यारी में तो लेग पीस के किस्से आम थे ही पर अब तो बच्चे भी बिना लेग पीस के चिकन को हाथ तक ना लगाते । अजी बस यूँ समझ लिजिये जिस तरह जिन्दगी की गाड़ी बचत और सेलरी के दो पहियों पर घूम रही है वैसे ही एक अच्छी दावत की गाड़ी चिकन और लेग पीस पर चलती है । या फिर कह लो की बिना साचिन के क्रिकेट बिना बच्चन के मुवी और बिना लेग पीस के चिकन अच्छा नहीं लगता । जब हम जातें है शादी में और बैठते हैं खाने के लिये और दावत में हो चिकन तो सबसे पहले हम यही प्रार्थना करते हैं कि है भगवान कम से कम एक लेग पीस तो हमें मिल ही जाये । जितने मंत्रियो को अपने विधायक प्यारे होते है उतने ही हमे दावत में लेग पीस प्यारे होते हैं । तो चलिये तो जिक्र करते हैं एक दावत का -

मैं हूँ आप के जैसा आप सब में से एक और आप सब भी मेरे जैसे ही हो , तो यह किस्सा  हम सभी का है । किस्सा है मेरे किसी परिचित कि लग्न का जिसमें मुझे भी न्योता आया था । लॉकडाउन के कारण शादी , बरात , लग्न या किसी भी दावत  में पचास से ज्यादा अतिथियों को आने की अनुमति नहीं थी । जिसको न्योता आता वो अपने आपको खुदकिस्मत समझता , उसका सीना फूलकर चौड़ा हो जाता और मुछो को ताव जरुर देता । कम अतिथी होने के कारण उनकी खूब खातिर तवज्जो होती है । मुझे तो न्योता मिल ही चुका था तो मेरा मन भी फूले ना समा रहा था । उपर से चिकन बनने के कारण मैं उसकी लग्न में अत्याधिक मग्न था कि चलो आज तो जमकर दावत उडा़येंगे , कम से कम दो या तीन लेग पीस तो आज समेट ही दुंगा ।


दावत शुरु हो चुकी थी सभी लोग खाना खाने के लियें नीचे बैठ रहे थे । मेरा मक्सद था पहली कतार में तीसरे या चौथे नम्बर पर पोजिशन हाशिल करना क्योकि पहली कतार में लेग पीस ऊपर ही ऊपर तैरते दिखाई देते है पर दावत में आये इन भूँखे भैंडियो के धक्का मुक्की के कारण जैंसे तैंसे मुझे पहली कतार में ग्यारवा नम्बर मिला , जी तो चाह रहा था इन सबकी जुतो से खबर लूँ , एक- एक को गोली से उड़ा दूँ पर क्या करता मेरी तरह वो भी दावत ही खाने आये थे । वैसे ग्यारवा नम्बर भी इतना बुरा नहीं था अगर सब्जी परोसने वाला चार वार भी इधर से गुजरेगा तो कम से कम दो बार तो लेग पीस हाथ लगेगा ही यह सोचकर मैं थोडा़ सन्तुष्ट था । बैठ तो हम सब चुके ही थे बस अब इन्तेजार था खाना परोसने वालो का , और कुछ ही छणो के बाद वो परोसने वाले भी हाथ मे करछुल और चमचे लेकर चले आ रहे थे उनके चेहरो के अलग ही हाव भाव थे उनको देखकर ऐंसा लग रहा था जैंसे वो जंग पर जा रहे हो , या मानो जैंसे मोदी जी उनको सर्जिकल स्ट्राईक पर भैज रहें हो , खैर उससे हमें मतलब नहीं था , हमे तो मतलब था हमारे पेट मे जाने वाले लेग पीस से कि कब थाली में आये और कब पेट में जाये । परोसने वालो ने भी अपनी अपनी कमान सम्भाल ली और चल दिये परोसने चिकन को, हमारी पंक्ती में सभी की निगाह लाईन में बैठे पहले आदमी पर ऐंसे थी जैंसे वोटिंग खुलते वक्त  उम्मीदवारो की होती है कि उस साईकिल वाले को कितने वोटि मिले है या कमल वाले कितने वोट मिले हैं । तो पहले आदमी को परोसने के लिये जब उसने चमचा बाल्टी में डाला तो सभी की निगाह बाल्टी में घुसने को तैयार कि आखिर बाल्टी में लेग पीस है कि नही है और पहले चमचे में ही एक लेग पीस बाहर निकला जिसे देखकर सभी व्याकुल हो गये कि ऐंसा ही एक हमे भी मिलेगा। जिस पहले आदमी को लेग पीस मिला था वो गन्दे से धोती कुरते में बैठा था और उसके चप्पल भी टुटे थे सच बताऊ तो इसको लेग पीस देने की जरुरत नही थी । पर भगवान की। लीला देखिये पहला लेग पीस उसी को मिला , यह परोसने वाला कहीं पागल तो नही हो गया इस गवार को लेग पीस देने की क्या जरुरत थी अरे लेग पीस तो हमारे जैंसे पढ़े लिखे सामाजिक लोगो के लिये होता है और इस मुर्ख ने इतना किमती लेग पीस इस गवार को दे दिया ।

अब बारी थी दुसरे आदमी की उसको चिकन तो परोसा गया  पर लेग पीस नही मिला , अरे क्या इतनी बड़ी बाल्टी मे एक ही लेग पीस था क्या बाकी सारे लेग पीस यह अपने घर ले गया या फिर अपने लिये छिपाकर तो नहीं रख दिये । खैर बारी थी तीसरे नम्बर की उसके हिस्से एक लेग पीस आ गया और मेरे मन को भी थोड़ी तसल्ली मिली कि चलो अभी तो बाल्टी में लेग पीस है । चौथे नम्बर पर एक शराबी बैठा था मेरे मन से अ‍ावाज आयी की इसको लेग पीस नहीं मिलना चाहियें , और सच में उसको लेग पीस नहीं मिला , चलो अच्छा हुआ । पाँचवे नम्बर पर था एक बालक तो मन से फिर आवाज आयी अरे बच्चे तो मन के सच्चे होते हैं इसको लेग पीस जरुर मिलना चाहियें और उसको भी लेग पीस मिल गया , अरे वाह मेरे मन की बात तो पूरी हो रहीं थी यह सोच के अच्छा लगा छठे नम्बर पर एक अकड़ू सा लम्बा चौड़ा आदमी बैठा था मन से फिर आवाज आयी अरे इसको तो लेग पीस मिलना ही है , और नहीं मिला तो भी यह जबरदस्ती ले ही लेगा , पर अबकी बार मेरे मन की आवाज गलत साबित हुई क्योंकि उसे लेग पीस नही मिला । इतना विशालकाय शरीर होने के बाद भी उसने बहुत धीमे से कहा भैया लेग पीस नहीं है क्या ? परोसने वला था हरियाणवी , वो बोला - रे भाई म्हारे घर से कोणा आरया यो , जो मिला वो बाटरया से , थारेको जो परसा वो खराब है के , भाई है तो यो भी चिकन ही , और तने ज्यादा ही लेग पीस का शौक है तो जाके लड़के के बाप से बोल म्हारा दिमाग खराब ना कर । यह कहकर परोसने वाला आगे बढ़ा और सातवे को चिकन के साथ लेग पीस भी परसा । उस हरियाणवी की बात सुन कर मैं थोडा़ सहम सा गया और मन में सोचा अरे कहाँ से लाये हैं इसको यह तो काट खाने को दौड़ता है इस से कुछ कहना मतलब आ बैल मुझे मार । पर मेरे मन की आवाज गलत कैंसे हुई कहीं एेंसा तो नहीं भगवान ने ही कोई अलग पेटर्न बनाया हो लेग पीस मिलने का , औेर फिर मैं भगवान के पेटर्न का हिसाब लगाने लगा , पहले वाले को मिला दुसरे को नहीं मिला तीसरे को मिला चौथे को नहीं मिला पाँचवे को मिला और छठे को नहीं मिला सातवे को मिला यानी विषम मे बैठने वाले को मिल रहा है षम में बैठने वाले को नहीं मिल रहा है । पर मैं तो विषम में बैठा था यानी मुझे लेग पीस मिलेगा , अब मैं भगवान के बनाये हुए पेटर्न से निश्चिन्त औेर खुश था और अपने आजु बाजु वालो के देखकर मेरा मन बोल रहा था अरे मुर्खोे तुम्हे लेग पीस नहीं मिलेगा अब भी वक्त है जगह बदल दो , फायदे में रहोगे ।  पर मुझे क्या पता था कि भगवान मेरे मन की बात सुन रहा है तभी अचानक दसवे नम्बर पर बैठे आदमी को उसके किसी घनिष्ठ परिचित ने आवाज लगाई , अरे भाई साहब वहाँ कहाँ बैठ गये यहाँ हमारे पास आ जाओ जगह बहुत है उसकी बात सुनकर मुझे उसपर गुस्सा भी आया और मैं थोडा़ डर भी गया । गुस्सा इसलियें आया कि 'भाई क्यो किसी भले आदमी को खाने की जगह से उठा रहा है , अच्छा भला तो बैठा है , और यह यारी दोस्ती घर पर करनी चाहियें खाते पीते वक्त काहे की यारी ' और डर इस बात का कि उसके जाते ही मेरा नम्बर षम हो जाता और मुझे लेग पीस नही मिलता । फिर मैनें पास बैठे आदमी की तरफ देखा और मन में बोला भाई देख जाना मत क्या मिलेगा तुझे वहाँ जाकर और तेरा मित्र तो वैसे भी सबसे पीछे बैठा है , कुछ हाथ नही लगेगा तेरे , सिर्फ तरी ही तरी मिलेगी । तभी उस दसवे नम्बर पर बैठे आदमी ने तपाक से जवाब दिया नहीं भाई मै यहीं ठीक हूँ । यह सुनकर मेरा मन झूम उठा , उसका कद मेरी नजरो में बहुत उँचा हो चुका था । वाह क्या आदमी है , उसके कारण ही अब मुझे लेग पीस मिलने वाला था मेरा सीना भी अब मोदी जी के बराबर हो गया था । अब बारी थी आठवे नमंबर वाले की भगवान के बनाये हुए पेटर्न द्वारा उसे तो लेग पीस मिलना ही नहीं था सो नही मिला मिला । उसके बाद नौवे नम्वर को मिलना था सो मिल गया ।

सबकुछ विधि के विधान से हो रहा था मन बिल्कुल शान्त था कोई हलचल नहीं थी , और एकाग्रता से सिर्फ और सिर्फ लेग पीस का चिन्तन कर रहा था । जो कि अब मुझसे थोड़ी दूरी पर ही था । अब बारी है इस मुर्ख की सॉरी मुर्ख नहीं सज्जन आदमी की इसकी वजह से तो मुझे लेग पीस मिलने वाला ही है अगर यह चला जाता तो कहाँ से मिलता मुझे लेग पीस ।

परोसने वाले ने चमचा बाल्टी में डाला चिकन निकाला और थाली में परोसने ही वाला था कि उस दसवे आदमी ने चिकन लेने से मना कर दिया । तभी मेरा मन जोर से चीखकर बोला यह क्या किया तुने , जब चिकन खाना ही नहीं था तो दावत में क्यो आया ‌‌‌,और आया तो आया मेरे पास क्यों बैठा, मुर्ख , मुर्ख नहीं महामुर्ख । अरे , क्यो बुलाते हो एेसे लोगो को दावत में, जिनको चिकन की कद्र ही नहीं , और ऐसे आदमी को तो काले पानी की सजा होनी चाहियें । हे भगवान यह किस जनम का बदला लिया हैं तुने मुझसे , इस गवाँर को मेरे पास बैठाकर , क्या तुझे मुझपर जरा भी दया नहीं आयी ।

यह है ईन्सान का स्वभाव अभी कुछ दैर पहले जिस आदमी के मैं तारीफो के पूल बाँध रहा था , उसको सज्जन कहकर सम्बोधित कर रहा था , उसको मन से दुआए दे रहा था , और अब उसी आदमी को एक अदना सा लेग पीस ना मिलने के कारण काला पानी की सजा होने की गुहार लगा रहा हूँ । वाह रे लेग पीस तेरी भी अजब माया है ।

खैर अब मेरी बारी थी चिकन मिलने की । वैसे तो भगवान के बनाये पेटर्न के अनुसार मुझे लेग पीस मिलना था , पर इस मनहुश ने चिकन ना लेकर सारा पेटर्न बिगाड़ दिया था । लेकिन फिर भी मैने अपनी आखिरी अर्दास भगवान के चरणो में लगा दी , के है भगवान अब सबकुछ तेरे हाथ में है ।

चिकन परोसने वाला अब मेरे सामने था , मैने उसको स्नेह और फरियाद भरी नजरो से देखा और मन से कहा कि है भाई , मुझ पर दया दिखाना अगर तुने मुझे लेग पीस दिया तो मैं तूझे मरते दम तक दुआऐ दुंगा , पर वो मुझपर क्यों दया दिखाने लगा , उसने एक चमचा चिकन मुझे परोसा पर उसमे लेग पीस नहीं था । मैने उस से दबी आवाज में कहा "थोड़ा और" , उसने एक चमचा और डाल दिया पर उसमे भी लेग पीस नहीं था । अब मैं हार मान चुका था , और समझ गया था कि मेरे नसीब मे लेग पीस नहीं है । पर फिर भी मैंने एक आखिरी कोशिश की ।

मैंने कहा "भाई लेग पीस नहीं है" ,

वो बोला - "लेग पीस चाहियें"

मैंने कहा - "हाँ"

वो कड़क अवाज में‌ बोला - "ले म्हारी टाँग काट ले । जिसे देखो लेग पीस चाहियें , लेग पीस चाहियें , लेग पीस चाहियें । अरे तुम लोग दावत खाने आये हो या लेग पीस का शिकार करने आये हो , शर्म करो भाई शर्म करो "।

और इस तरह वो परोसने वाला मुझपर अपने शब्दो के बाण छोड़ता हुआ आगे चला गया , और मै लेग पीस के लियें यूँ ही तरसता और भटकता हुआ रह गया ‌।

  

  


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