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Dr Priyank Prakhar

Abstract Tragedy Classics


4.0  

Dr Priyank Prakhar

Abstract Tragedy Classics


लाॅकडाउन: रिश्तों की कशमकश

लाॅकडाउन: रिश्तों की कशमकश

8 mins 434 8 mins 434

अरे, वो बड़ी और पापड़ पैक कर लिये कि नहीं या सुबह से बस फिर पेपर पढ़ने के लिए बैठ गए हो, सुधा जी अपने पति दिनेश की ओर देखते हुए बोली। अभी दो दिन बाद निकलना है, कितना सारा काम बाकी है पर तुम से तो यह हो नहीं सकता कि थोड़ा बहुत तो मेरी मदद कर दो, हफ्ते भर से मैं लगातार सब काम में लगी हुई हूं, कभी बड़ी बनाना है कभी पापड़ बनाना है, कभी अचार की पैकिंग है अगर थोड़ा तुम मेरा साथ दे दो तो काम जल्दी हो जाए कहते हुए सुधा जी अपने काम में फिर से लग गई। दिनेश जी को इन सब बातों की आदत हो चुकी थी। उनको पता था कि सुधा जी काम करने भी नहीं देगी और उन्हें चुपचाप बैठने भी नहीं देगी। कुछ ना कुछ कुछ ना कुछ बोलते रहना सुधा जी की आदत में शुमार हो गया था।

और घर में था ही कौन, बात करने को अपना अकेलापन काटने के लिए सुधा जी को बोलते रहने की आदत पड़ गई थी और दिनेश जी के कम बोलने की आदत से भी उन्होंने समझौता कर लिया था इसलिए दिनेश जी की तरफ का जवाब भी खुद ही दे लेती थीं। दोनों एक दूसरे को बाखूबी पहचानते थे, हो भी क्यों ना शादी के ३५ साल बीत चुके थे और वह दोनों पति पत्नी से मां बाप और दादा दादी भी बन चुके थे।

सुधा जी की ये आपाधापी और दौड़ भाग देखने की आदत दिनेश जी को पड़ी हुई थी क्योंकि जब भी उनका बेटी की घर जाने का समय होता तो सुधा जी सुपर एक्टिव हो जाती थीं। इस बार भी वही मौका था और सुधा जी के पैर थम नहीं रहे थे। मां बेटी का रिश्ता ही कुछ ऐसा है। अपने मन की ट्रेन में सवार होकर दिनेश जी ने सफर शुरू ही किया था कि सुधा जी ने आकर ब्रेक पर पैर रख दिए थे।

सुधा जी दिनेश जी के पास आकर उनका हाथ पकड़ कर बोली, अरे उठो भी ना, चलो देखो मैंने तनु के लिए जो स्वेटर बनाया था, वो कैसा लग रहा है उसको पसंद तो आएगा ना। आजकल के बच्चों की तो पसंद ही निराली है, पर पसंद क्यों नहीं आएगा मैंने कितनी मेहनत से बनाया है। दिनेश जी चुहल के अंदाज में बोले, अरे अगर उसको नहीं आएगा ना तो रामू के बेटे को दे देंगे। तुम्हें क्या, मैं दिन भर परेशान होंऊ और करके काम करके खटूं और तुम रामू के बेटे को सब कुछ दे दो। कहीं वह तुम्हारा ही बेटा तो नहीं है सुधा जी दिखावटी गुस्से से बोलीं।

दोनों को एक दूसरे का यह हास परिहास मन में कहीं न कहीं बहुत पसंद था इसलिए दोनों ही एक दूसरे को खिझाने, परेशान करने और फिर उसका मजा लेने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। स्वेटर तो तुमने अच्छा बनाया है सुधा, कभी हमारे लिए भी स्वेटर बना दो, कहते हुए दिनेश जी ने सुधा जी की टांग खींचने की कोशिश की। पलटकर सुधा जी बोली, तू तो पड़ोस वाली स्वीटी भाभी से स्वेटर बनवा लो, तुम्हें तो उनका बनाया खाना उनके के सारे काम बहुत अच्छे लगते हैं। अभी घर में कोई स्वेटर बनाऊंगी तो तुम्हें पहनना तो है नहीं अच्छा चलो बेकार की बातें छोड़ो हमारी ट्रेन का टाइम कितने बजे का है। दोनों अभी भी नव दंपति की तरह एक दूसरे के साथ नोकझोंक प्यार मनुहार करते रहते थे।

कल सुबह 8:00 बजे निकलना है, एक घंटा स्टेशन पहुंचने में लगेगा और 10:00 बजे की ट्रेन है, आधे घंटे पहले पहुंच जाएंगे तो थोड़ा दौड़ भाग कम रहेगी। एक बार डॅली से बात तो कर लो, कहीं कोई और सामान तो नहीं चाहिए उसको, तो अभी आप जाकर बाजार से लेते आओ। सुधा गुड़गांव में सारा सामान मिलता है और वो लखनऊ से बड़ी जगह है। मुझे पता है कि क्या मिलता है और क्या नहीं मिलता है, आपसे ज्यादा बाजार मैं जाती हूं पर देखो मां के हाथ की बनी चीजें किसी बाजार में नहीं मिलती हैं। वो सब चीजें मां को ही बनानी पड़ती है, नहीं तो बेटी क्या कहेगी कि मैं बड़ी हो गई तो मां ने मुझे प्यार करना छोड़ दिया। आपको तो बस कोई काम ना करना पड़े, उसका बहाना ढूंढते हैं,

आपको बाजार नहीं जाना तो कोई बात नहीं, मैं जा कर लेती आऊंगी पर एक बार आप डाॅली से बात कर लो।

डॉली सुधा और दिनेश जी की बड़ी बेटी थी जो कि शादी के बाद अपने पति राहुल के साथ के साथ गुड़गांव जाकर के बस गई थी। राहुल और डाॅली की प्यारी सी छोटी बेटी थी जिसका नाम तनु था। डाॅली गुड़गांव की एक कंपनी में एचआर मैनेजर थी और राहुल एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। राहुल का आना-जाना विदेशों में लगा रहता था, इस वजह से कई बार सुधा और दिनेश जी को तनु का ध्यान रखने को और बेटी की हेल्प के लिए गुड़गांव जाना पड़ता था। सुधा और दिनेश जी तनु से बहुत हिले मिले हुए थे इसलिए जब भी डॉली उन्हें गुड़गांव बुलाती वो तुरंत भागते हुए गुडगांव पहुंच जाते थे। वैसे भी मूलधन ब्याज से ज्यादा प्यारा होता है।

ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन फोन की घंटी बज रही थी, सुधा जी ने दिनेश जी को आवाज दी अरे फोन तो उठाओ। डॉली का है मैं तुमसे कह रही थी कि डॉली को फोन कर लो पर तुम तो सुनते ही नहीं हो। उसको कोई सामान मंगाना होगा या कोई काम होगा पर तुम ना यह कहते हुए सुधा जी फोन उठाने दौड़ी लेकिन तब तक फोन कट गया। सुधा जी ने फोन देखते हुए डॉली को डायल किया उधर से रिंगटोन आना शुरू हो गई, लॉकडाउन की प्रक्रिया इस समय पूरे देश में शुरू हो गई है इस स्थिति में यदि आपको बहुत जरूरी हो तो ही घर से बाहर निकले अन्यथा घर पर रहे और सुरक्षित रहे यह रिंगटोन सुनते ही सुधा जी का दिमाग गुस्से से लाल हो जाता था। जिसको भी फोन करो अब यही बातें सुननी पड़ती हैं, लोगों को जागरूक करने के लिए बता रहे हैं या डराने के लिए। 

हेल्लो मम्मी हैलो मम्मी उधर से आती हुई डोली की आवाज में उनकी सोच के सफर को रोक दिया, कैसी हो बेटा और तुम्हारे लिए बड़ी अचार पापड़ मैंने सब रख लिए हैं और क्या सामान के लिए तुमने फोन किया था, सुधा जी एक सांस में ही सब कुछ बोल पड़ीं।

मम्मा आप लोग कैसे हो, लखनऊ में भी कैसे हाल-चाल हैं, डॉली बोली बेटा हम सब तो बिल्कुल ठीक हैं, पर तू बिल्कुल चिंता मत करना, हमारी कल की ट्रेन है और हम शाम तक दिल्ली पहुंच जाएंगे सुधा जी बोलीं।

मम्मा मैंने यही कहने के लिए आपको फोन किया था कि आप लोग मत आओ मैं कुछ मैनेज कर लूंगी, डॉली बोली। बेटा ऐसे कैसे नहीं आए, तू अकेले क्या क्या करेगी और अब तो दामाद जी भी निकल गए हैं तो अकेले कैसे सारा काम संभाल लेगी। कोई बात नहीं मैं कर लूंगी और फिर आप लोगों को भी लॉक डाउन की वजह से यहां आने में दिक्कत होगी परमीशंस वगैरा लेनी पड़ेगी, काफी सारा काम हो जाएगा। डाॅली फिर से बोली उसकी आवाज में एक अलग सी चिंता थी। क्या बात है बेटा कोई दिक्कत तो नहीं है, तुम तो जानती हो पापा को, तुम्हारे पापा सारा अरेंजमेंट कर लेंगे उनके जान पहचान वाले काफी सारे लोग वहां दिल्ली में भी है, चिंता मत करो हम आराम से आ जाएंगे।

नहीं मम्मी आने की जरूरत नहीं है इस बार डाॅली थोड़ा झुंझला कर बोली। सुधा जी की समझ में नहीं आ रहा था की बेटी आने से क्यों मना कर रही है, उन्होंने अपनी हॉस्पिटल की जॉब से भी बड़ी मुश्किल से छुट्टी ली थी। फिर से बेटी से एक बार पूछा कि शायद वो कोई संकोच कर रही हो, बेटा तुम बिल्कुल मत घबराओ हमें कोई दिक्कत नहीं है और अब तो मैंने भी छुट्टी ले ली है और तुम्हारे पापा ने पूरा सामान भी पैक कर लिया है और बस कल की तो बात है। मां, लखनऊ को रेड जोन में डाल दिया है और गुड़गांव अभी भी ग्रीन जोन में है और फिर आप तो हॉस्पिटल में काम करती हो, वहां आती-जाती भी रहती हो। आप और पापा यहां आओगे ना तो हमारा रिस्क बढ़ जाएगा, प्लीज मम्मा समझा करो, हम फिर कभी मिल लेंगे। सुधा जी के हाथ से रिसीवर छूट गया, उनको अपने कानों से सुनी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। फोन पर दूसरी तरफ से टीवी की आवाज आ रही थी, जिस पर प्रधानमंत्री की आवाज गूंज रही थी, मित्रों अगले कुछ महीने भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, हम सभी को बहुत ध्यान रखने की जरूरत है जो लोग ग्रीन जोन में हैं वह लोग रेड जोन वालों से संपर्क कम रखें रररररर।

सुधा जी को सुनाई देना बंद हो रहा था, कमरा घूमता हुआ था मालूम हो रहा था। मन में सवालों का एक भूचाल आ रहा था, अगर वह ग्रीन जोन में होती और बेटी रेड जोन में तो क्या वो भी ऐसा ही करतीं? क्या वह भी अपनी बेटी को घर आने से मना कर देतीं? क्या कोई मां भी इतना प्रैक्टिकल हो सकती है, इतनी सेल्फिश हो सकती है? क्या भावुक होना गलत है? किसकी गलती है? कौन सही है कौन गलत है? क्या रिश्ते बदल गए हैं या समय बदल गया है, या फिर हम नहीं बदल पाए हैं। फोन कट गया था पर पीछे छोड़ गया था कुछ सवाल, एक कशमकश, जिसके जवाब ढूंढना अभी भी बाकी था।


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