Dr Priyank Prakhar

Inspirational


4.1  

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बदलते एहसास

बदलते एहसास

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हितेश के पिता कस्बे के बड़े कारोबारी थे। कस्बे के मुख्य बाजार में उनका कपड़े का काफी बड़ा काम था, पुराने कारोबारी होने की वजह से उनकी साख भी काफी ज्यादा थी। इसी वजह से आसपास के सारे गांव से दुकानदार उनकी दुकान से सामान ले जा करके अपने यहां बेंचते थे।

उनका स्वभाव मधुर होने की वजह से ग्राहकों से उनके संबंध घर परिवार जैसे ही हो रखे थे। जब भी उनकी दुकान में कोई भी ग्राहक आता तो पिता हितेश को बुला करके उसका परिचय उनसे कराते थे। इस तरह काफी सारे ग्राहक हितेश को भी जानने लग गए थे। 


हितेश पढ़ने में बहुत तेज था और हमेशा अव्वल आता था। कस्बे में पढ़ने की बहुत अच्छी व्यवस्था ना होने की वजह से उसके पिता ने उसको बहुत ही कम उम्र में हॉस्टल भेज दिया था। हालांकि हितेश की मां और बाबा-दादी उसको हॉस्टल भेजने के पक्ष में नहीं थे क्योंकि उस समय हितेश की उम्र केवल नौ बरस की ही थी। हितेश के ताऊजी ने भी उसके पिता को समझाया था कि इकलौता लड़का है, यहां पर रहेगा तो कारोबार में मदद करेगा और घर कारोबार भी आगे बढ़ेगा, बाहर भेज कर और इतना ज्यादा पढ़ा कर क्या फायदा? जब आगे चलकर कारोबार ही संभालना है। हितेश के पिता का सोचना इससे अलग था उनका मानना था कि बच्चों की पढ़ाई उनका मौलिक अधिकार है और जब बच्चे पढ़ लिख कर इस लायक हो जाएं कि वह अपने निर्णय ले सके, तब हमें उनसे पूछना चाहिए कि उनको क्या करना है और कई बार बच्चों के हित के लिए मां-बाप को कड़े फैसले लेने पड़ते हैं और आगे चलकर इन्हीं फैसलों की वजह से बच्चों का भविष्य निर्माण संभव हो पाता है। ऐसा नहीं था कि हितेश के पिताजी को उस का अपने से दूर जाना खलता नहीं था पर ना चाहते हुए भी कई बार बच्चों के भले के लिए ऐसा करना पड़ता है।


हितेश के कई सारे मित्र भी हितेश के साथ ही हॉस्टल पढ़ाई के लिए गए थे पर वहां के माहौल से घबराकर वापस आ गये और अपने-अपने पिता के कामों में हाथ बंटाने लगे थे। हितेश कभी भी छुट्टियों में वापस आता तो भी उसके पिता उसे अपने कारोबार में बहुत ज्यादा हाथ नहीं बंटाने देते थे और उसे समझाते थे कि अगर तुम्हारा मन अगर कारोबार में लग गया तो पढ़ने में नहीं लगेगा। वो उसको समझाते थे कि बेटा, मैं अपनी जिंदगी में तो बहुत कुछ नहीं कर सका पर मैं चाहता हूं तुम कुछ करके अपना अपने कस्बे का अपने परिवार का नाम रोशन करो। यह बात हितेश के दिमाग में अपनी जगह बना चुकी थी और इसी तरह लगन से पढ़ते हुए साल दर साल कई साल बीतते गए और हितेश बारहवीं पास करके प्री-मेडिकल की तैयारी में लग गया था।


प्री-मेडिकल के एग्जाम खत्म करके हितेश घर आ गया था। इस बार बोर्ड एग्जाम और तैयारियों की वजह से हितेश काफी दिन बाद घर आ पाया था, पिता की तबियत भी ठीक नहीं थी इसलिए आजकल उसे दुकान में भी बैठना पड़ता था। पहले भी वह दुकान में बैठता था और पिता ग्राहकों से उसका परिचय कराते रहते थे, इस वजह से उसने दुकान भी बखूबी संभाल ली थी।


इस सबके बीच वह दिन भी आ गया, जिस दिन हितेश का प्री मेडिकल का रिजल्ट आना था। हितेश दुकान में अपने पुराने नौकर भोला के साथ बैठा हुआ था और ग्राहकों को कपड़े दे रहा था तभी उसके पिता के एक पुराने ग्राहक रामदास जी दुकान में आए और हितेश से उनकी बातचीत होने लग गई। बेटा क्या हाल-चाल हैं, बहुत दिन बाद दिखाई दिए, अभी आजकल दुकान में ही रहते हो क्या, पढ़ाई वढ़ाई बंद कर दी क्या? हम तो पहले ही कह रहे थे, मैंने तो तुम्हारे पिता को भी कई दफा समझाया था कि फालतू पैसा बर्बाद करने का कोई फायदा नहीं है पर तुम्हारे पिता को तो दुनियादारी समझ ही नहीं आती, उन्हें तो लगता था कि लड़का पढ़ने में तेज है, अव्वल है, कुछ करके दिखाएगा। हम तो हमेशा ही बोलते थे कि बनिया का लड़का है, कारोबार में लगाओगे चार पैसे कमाएगा, नहीं तो चार पैसे बर्बाद करके ही आयेगा, पर हमारी सुनता ही कौन है, अभी देखो, सब बर्बाद है, इतनी पढ़ाई करके जब कपड़े की दुकान ही चलानी थी तो पढ़ाई कराने का फायदा ही क्या हुआ? वह अपनी रौ में बोले ही चले जा रहे थे, पता नहीं शायद उनकी कुछ अपनी तकलीफ थी। नहीं चाचा जी ऐसी बात नहीं है, वह ऐसा है कि भोला ने भी उनको रोककर कुछ बोलना चाहा पर उसकी बात काट कर के रामदास जी बोले अरे भाई ऐसा वैसा कुछ नहीं होता, कोई बात नहीं, देर आए दुरुस्त आए, अभी भी मन लगाकर कारोबार करोगे तो कारोबार में आगे बढ़ जाओगे। 


तभी हितेश के पिता मेडिकल रिजल्ट का पेपर अपने हाथ में लिए हुए दुकान में आ गए, रामदास जी को देखते ही उन्होंने उनको नमस्कार किया और हितेश को बोले, अरे बेटा तुम्हारी मेहनत सफल हो गई, हम सब की मेहनत सफल हो गई, तुम्हारा सिलेक्शन एमबीबीएस में हो गया है, आज उन सब लोगों के सामने मैं गर्दन ऊंची करके बोल सकता हूं जो कभी मुझसे कहते थे कि बनिया का लड़का तो कारोबार ही करेगा। अरे बेटा चाचाजी के पैर छुओ और इनका आशीर्वाद लो, इन लोगों के आशीर्वाद से ही यह सफलता मिली है। यह सुनकर रामदास जी को जैसे झटका लग गया पर तुरंत ही वह अपने को संयत करके बोले अरे हमने तो पहले ही कहा था लड़का होनहार है, मेहनत करेगा तो बहुत आगे जाएगा, देखो आज, मेहनत कैसे रंग लाई और आज डॉक्टरी में सिलेक्शन पाकर पूरे गांव का नाम रोशन कर दिया, इसे कहते हैं सफलता। उनकी बात सुनकर हितेश को जैसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, वो समझ नहीं पा रहा था कि रामदास जी की कौन सी बात सच्ची है, जो अभी बोला वो या वो जो पहले बोल रहे थे, शायद हितेश के जीवन में खोखली दुनियादारी का ये पहला पाठ था कि कैसे दुनिया समय और परिस्थितियों के साथ अपना रंग बदलती है और इस दुनिया की पुरातनपंथी सोच का सच भी उसके सामने आज पहली बार उजागर हुआ था और इस पाठ के अध्यापक थे, रामदास जी। आज उसे अपने पिता का संघर्ष भी साफ दिखाई दे रहा था। उसकी नज़र में उसके पिता का कद अब पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया था।


हितेश ने मुस्कुराते हुए तुरन्त आगे बढ़ कर के रामदास जी के पैर छुए और बोला सब आपके ही आशीर्वाद का कमाल है चाचा जी और आपकी बातों की प्रेरणा से ही यह सफलता मिली है, नहीं तो बनिया का लड़का बस कारोबार ही करता रहता, यह कहकर हितेश हंस दिया उसको हंसता देख कर के भोला भी हंसने लग गया। हितेश के उनके पैर छूने और ऐसा बोलने पर रामदास जी के चेहरे के भाव देखने ही लायक थे, थोड़ा सकपकाकर वो बोले अच्छा भाई, अभी मैं चलता हूं, मुझे थोड़ा काम है। हितेश के पिता बोले, अरे मिठाई तो खाते जाइए, भाई साहब। नहीं, आप खाइए मुझे कुछ काम है, कहकर रामदास जी वहां से चल दिए। पहले घटित बातों से अनजान हितेश के पिता को रामदास जी का वहां से यूं अचानक चले जाना समझ नहीं आया पर वह अपने बेटे की सफलता से बहुत खुश थे और अभी कुछ और नहीं सोचना चाहते थे क्योंकि आज उनके बेटे ने उनके संघर्ष को सफल बना दिया था इसलिए वह मिठाई का डिब्बा लेकर बाकी पड़ोसियों के साथ अपनी खुशी बांटने के लिए निकल पड़े।


आज हितेश को जहां एक ओर अपने प्री-मेडिकल की सफलता की खुशी थी वहीं दूसरी ओर उसे इस बात का भी एहसास हो रहा था की उसकी पढ़ाई से भी बड़ा संघर्ष उसके पिता रामदास जी जैसे लोगों की पुरातनपंथी सोच के साथ यहां कर रहे थे, जिसके सामने उसका संघर्ष कुछ भी नहीं था। निश्चित रूप से आज हितेश के पिता ने उससे भी ज्यादा बड़ी उपलब्धि हासिल करी थी और उनको उनके हिस्से का आसमान मिल गया था। साथ ही आज रामदास जी ने जाने-अनजाने में हितेश को भी उस खोखली दुनियादारी का वो चेहरा दिखा दिया था जिसको पहचानने की जरूरत उसे आगे आने वाली जिंदगी में सबसे ज्यादा जरूरत पड़ने वाली थी।



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