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Ranjana Jaiswal

Tragedy

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Ranjana Jaiswal

Tragedy

क्या मैं पागल हूँ?

क्या मैं पागल हूँ?

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लोग मुझे पागल कहने लगे हैं। क्यों ?बताता हूँ बताता हूँ सब कुछ बताता हूँ सुनकर आप ही निर्णय कीजिए कि क्या मैं सच ही पागल हूँ। दरअसल मेरे एक रिश्ते में कई रिश्ते गड्डमगड्ड हो गए हैं। नहीं समझे ...तो सुनिए ,मैं अपनी पत्नी को बेटी मानने लगा हूँ। अरे नहीं जी ,उसकी उम्र मुझसे एकाध साल ही कम है और हमारा प्रेम-विवाह हुआ था। अब क्या बताऊँ विवाह के इन दो वर्षों में क्या हुआ कि वह मुझे बेटी लगने लगी है। हमारी पहली मुलाक़ात !मत पूछिए ...कितनी मजेदार थी। मैं उसके भाई का मित्र था। एक दिन उसके घर गया। वहाँ पहली बार उसे देखा ...भरी देह वाली सुंदर-सी लड़की। भाई ने उससे कहा- बिन्नी, यही हैं दारा सिंह ...फिर तो जैसे उसको हंसी का दौरा –सा पड़ गया। मैं आवाक और भाई शर्मिंदा। बड़ी देर बाद उसकी हंसी रूकी तो उसने हंसने का कारण बताया ---भैया के मुंह से सुनती रहती थी आपके बारे में कि दारसिंह ने ये किया दारासिंह ने वो किया। मेरे मन में आपके नाम के अनुरूप ही छवि उभरती थी –लंबा-चौड़ा पहलवान टाइप आदमी ,पर आप तो जरूरत से ज्यादा दुबले-पतले हैं। भाई ने उसे डांटा –दरवाजे पर ही खड़ा रखोगी कि भीतर भी आने दोगी। दारा सिंह को कुछ खिलवोगी नहीं।

-अरे, हाँ- हाँ माफ करें,आइये भीतर आइये। फिर तो उसने वो आवभगत की कि मत पूछिए। जब वह मुझे जिद करके खिला रही थी उसकी आँखें बिलकुल मेरी माँ-सी लग रही थीं। कितने रूप हैं इस लड़की के। उस दिन के बाद तो उसके घर आने-जाने का सिलसिला ही निकल पड़ा। वह जब भी कुछ अच्छा पकाती भाई से कहकर मुझे बुला लेती। मुझे पौष्टिक चीजें खिलाने के फिराक में रहती। कई बार मैं कहता भी कि –मेरी दधीचि की हड्डी है इस पर मांस नहीं चढ़ेगा। वह हँस पड़ती। धीरे-धीरे हम करीब आने लगे फिर तो हमारा लंबा अफेयर चला। वह प्रेमिका भी गज़ब की निकली। उसके रोम-रोम से प्रेम की निर्झरिणी –सी बहती। उसकी आवाज में खनक भर गयी थी जब वह बोलती तो जैसे मंदिर की घंटियाँ बजने लगतीं। आँखों में मादकता इतनी कि पुरानी शराब का नशा चढ़ जाए । चेहरे पर ऐसा नूर की जी चाहे कि उसका नाम बदल के नूरेजहान ही रख दूँ। मैं तो उससे जब भी मिलता बस उसे निहारता ही रहता ।वही चटर-पटर बोलती रहती। मुझे नहीं लगता कि वह इतिहास-प्रसिद्ध प्रेमिकाओं में से किसी से कम थी। इतनी जीवंत...इतनी हंसमुख ...इतनी मादक कि मैं उसे पाने के लिए पागल हो उठा ...|

पर जब वह पत्नी बनी तो मुझे उतनी अच्छी नहीं लगी। नहीं नहीं उसमें कोई कमी नहीं थी ,बस मुझे ही ये ठेठ भारतीय बीबियाँ पसंद नहीं। वह अब मुझ पर जरूरत से ज्यादा अधिकार जताती ...हर बात में किच-किच किया करती। उसे सफाई का फोबिया था और मैं ठहरा सादा का आलसी ...लापरवाह और लद्दधड़ -सा आदमी। सफाई से तो मतलब था नहीं, उल्टे गंदगी फैला देता ।मसलन पान की पीक से वाश-बेसिन गंदा कर देता ,कुछ पढ़ता-लिखता तो रद्दी कागजों का ढेर लगाता जाता। अरे, मैं तो अपनी भी सफाई से कतराता हूँ। जाड़े में नहाना मुझे तो पागलपन लगता है। रोज-रोज दाढ़ी बनाना मुझे नहीं सपरता। वह झुँझला जाती। बक-बक करने लगती। जबरन बाथरूम में बंद कर देती कि नहाओ तभी दरवाजा खोलूंगी। मुझे गुस्सा आ जाता। बाथरूम से ही चिल्लाता कि मेरी मास्टरनी मत बनो । भाग जाऊंगा घर छोड़कर ...|पर आखिरकार वही जीतती। अब ये मेरी स्वतन्त्रता का हनन है कि नहीं। यह भी कोई बात हुई कि मनचाहे ढंग से न रह सको ...न खा सको, न जी सको हर बात में नियंत्रण ...हर बात में तानाशाही। ये साला हिटलर मरा नहीं इंडियन बीबियों की आत्मा में समा गया। अब ये भी कोई बात हुई अब पुरूष हूँ,कहीं आते-जाते सुंदरियों पर नजर पड़ ही जाती है ...चेहरा खिल ही जाता है परकीया का आकर्षण भी तो तीब्र होता है ,पर नहीं वहाँ भी इसकी गिद्ध नजर पहुँच जाती है। सारा मजा किरकिरा कर देती है और घर आते ही खाली-पीली चढ़ बैठती है ।और वही घिस पिटा रामायण शुरू–सारे मर्द एक -जैसे होते हैं कुत्ते जैसे राल टपकाने वाले ...|मुझे भी गुस्सा आ जाता ।एक तो ये महारानी नेत्र-सुख भी नहीं लेने देती और ऊपर से पुरुष पुराण लेकर बैठ जाती हैं। अरे भाई शादी किया है इनके नाम का पट्टा तो गले में डाल नहीं रखा है। फिर हममें जमकर लड़ाई होती। नहीं जी,ऐसी भी कोई खास नहीं ...बस वही शिकवा-शिकायतें,जो हर दंपति में होती हैं। वे कहती-तुमसे शादी करके पछता रही हूँ। मैं भी कह देता-मैं भी खुश नहीं हूँ। झगड़ा अंतत:इनके रोने और मेरे मनाने से समाप्त हो जाता। इनकी एक कमजोरी है कि मेरे सीने पर सिर रखकर ही सो पाती हैं वरना रात-भर करवटें बदलती रह जातीं ,इसलिए ज्यादा देर हमारा झगड़ा टिक नहीं पाता था। अब तो यह मैं ही जानता था कि उनके भारी-भरकम सिर के बोझ से मेरे नाजुक सीने की क्या गत होती थी। मैं तब तक नहीं सो पाता ,जब तक वे गहरी नींद में नहीं चली जाती और उनका सिर किसी गेंद की तरह उठाकर तकिए महाराज को सुपूर्त नहीं कर देता।

जी हाँ... जी हाँ ,अब उसी बात पर आ रहा हूँ ...|हुआ यह कि एक बार यह बहुत बुरी तरह बीमार पड़ गयी ...बचने की उम्मीद कम ही थी फिर तो मेरे होश उड़ गए। घर का सारा काम-धाम मेरे ही सिर पर था ,वैसे भी घर में हम दो -ही तो मुर्गी थे। अब मैं जिम्मेदार हो गया था। बहुत अच्छी तरह उसकी देखभाल करता ।उसको समय से दवाई देता। घर को साफ सुथरा भी रखता।वह उस समय बिलकुल छोटी-सी बच्ची की तरह दिखती। गोल-मोल गुड़िया –सी। बिटिर-बिटिर ताकती।बोलती कम|सोती तो उसके होंठ नन्ही बच्ची की तरह बिदुर से जाते। नन्हें ...गुलाबी मासूम और पवित्र होंठ जैसे खिलने को आकुल कली की नन्ही पंखुरी हो। मैं पागल की तरह उन्हें चूमने लगता तो वह कुनमुनाती जैसे छोटी बच्ची नींद में कुनमुनाती है...फिर वह गठरी -सी बन जाती। मैं उसके सुंदर गोल सुडौल पैरों को चूमता रहता। वह इतनी प्यारी लगने लगी थी कि क्या बताऊँ। सबसे अच्छी लगती थीं उसकी आँखें कमल की कली- सी निर्मल, सुंदर और अधखिली हुई। जब वह सो रही होती तो मैं उसकी आँखों पर अपने होंठ रख देता। वह आँखें फड़फड़ाती और उसे खोल कर मुस्काती। मुझे बहुत अच्छा लगता। इसीलिए मैंने उसकी आँखों को नया नाम दिया-कुलकुल। ।आँखों ही क्यों मैंने तो उसके ज़्यादातर अंगों का नामकरण कर रखा था। उसके होंठ मिष्ठुन थे ,गाल छोटा गुलगुल ,पेट बड़ा गुलगुल ,पैर गुटुक ।मेरे लिए वह माऊ थी गिल्लू थी और बाबू तो थी ही। याद नहीं आता ऐसे कितने नाम मैंने उसको दे रखे थे। एक बात बताऊं उसकी बीमारी के दिनों में उसे चूमते या प्यार करते मेरे मन में कोई विकार नहीं आता था । मैं एक पिता की तरह उसे प्यार करता था। कभी-कभी उसी की देह बेकाबू हो जाती तो भी मैं उसे थपथपाकर सुला देता। जब तक वह बीमार रही उसे भी बच्ची की तरह प्यार किया जाना बुरा नहीं लगा बल्कि वह आँखें बंद कर उसका आनंद लेती रही ।खूब जिद करती रही अपनी जायज-नाजायज बातें मनवाती रही ।पर जब वह पूरी तरह ठीक हो गयी तो खुद को बच्ची कहे जाने पर चिढ़ने लगी और पहले की तरह पति का प्यार चाहने लगी। सही भी था आखिर वह एक जवान और खूबसूरत औरत थी। उसकी भी अपनी जरूरतें थीं पर मैं भी क्या करता !मैं तो सच ही उसे बेटी मानने लगा था।

मैं भाव-स्तर पर वहाँ से हट ही नहीं पा रहा हूँ। मैं उसकी यौवन को पति की नज़र से नहीं देख पाता, चाहकर भी। मैं किसी भी कीमत पर उसे पत्नी की तरह प्यार नहीं कर सकता।

उसे चिंता हुई ।उसने मुझे बहुत समझाया पर मैं जब भी उसे छूने को हाथ बढ़ाता मेरे हाथ काँपने लगते और मैं उस जगह से भाग खड़ा होता। मेरी बीमारी इतनी बढ़ गयी है कि अक्सर मैं उसकी शादी के बारे में सोचता हूँ। किसी अच्छे लड़के की तलाश में हूँ जो उसी की तरह सुंदर और योग्य हो। मैं तो किसी भी तरह उसके काबिल नहीं हूँ। छुहारे जैसी शक्ल और रर्हेठे जैसी देह। हाँ,पिता के लिए ठीक हूँ। वह उदास रहती है मैं उससे कहता हूँ –मेरी राजकुमारी किसी राजकुमार के लिए उदास है न ...|मैं जाने कैसे उसे मिल गया ।पता नहीं मन में क्या सोचती होगी?|बेचारी मुझसे बंध गयी है ।मैं उसे मुक्त कर दूँगा और खुद उसकी शादी किसी राजकुमार से कराऊंगा।

वह रूठकर अपनी माँ के घर चली गयी है। फोन करता हूँ-मेरा बाबू कैसा है?तो फोन काट देती है। धीरे-धीरे बात चारों तरफ फैल रही है ।सब मुझपर हंस रहे हैं मुझे पागल कह रहे हैं।

क्या सच ही मैं पागल हूँ ?



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