Archana kochar Sugandha

Tragedy


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Archana kochar Sugandha

Tragedy


क्या माँ कूड़ादान है---?

क्या माँ कूड़ादान है---?

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        दस वर्ष की अनन्या कल से देख रही थी दादी काफी परेशान थी और बीच-बीच में उनकी आँखों से आँसू बह रहें थे । अनन्या से दादी का दु:ख देखा नहीं गया। बड़े प्यार से दादी की गोदी में जा बैठी और पुचकार कर दादी से दु:ख का कारण पूछने लगी। दादी रूँआसी सी होते हुए बोली, कल सुबह तुम्हारी छोटी बुआ का फोन आया था। कुशलक्षेम के पश्चात उसने बताया कि तुम्हारे फूफा जी का काम अच्छे से नहीं चल रहा है। रोहित भी बहुत तंग करता है। ढंग से पढ़ाई नहीं करता। सारे दुखड़े रो कर बेटी ने अपना मन शांत कर लिया और अपनी घर गृहस्थी में मस्त हो गई। उसने यह नहीं सोचा कि केवल तकलीफ ही तकलीफ बताने से माँ बेटी की चिंता में अंदर ही अंदर कितना घुटती रहीं होगी ।

एक सप्ताह पश्चात् बड़ी बुआ दादी से मिलने घर आ गई। बेटी को देख कर माँ बड़ी खुश हो गई। दोनों मांँ बेटी सारा दिन गले मिल बतियाती रहीं शाम को अनन्या ने देखा दादी फिर से चिंता में थी तथा रो रही थी। पूछने पर उसने बताया कि बुआ अपनी बेटी रागिनी के लिए पाँच-छह जगह रिश्ते के लिए बात कर चुकी है लेकिन कहीं भी बात नहीं बन रहीं हैं । बेटा महंगे कॉलेज से एम बी ए कर रहा है। घर का खर्चा चलाने में बुआ को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा हैं। दामाद जी भी अपनी जिम्मेदारी को बखूबी नहीं समझते हैं। कभी-कभार दारू का सेवन करके घर में हंगामा करते हैं । अनन्या में देखा कि बड़ी बुआ तो बहुत खुश थी। दो दिन में महंगी से महंगी खरीदारी करके घर रवाना हो गई और दादी के जिम्मे केवल दुखड़े छोड़ गई ।

  कुछ दिन बाद अनन्या ने देखा कि मम्मी-पापा दादी पर चिल्ला रहे थे। आप सारी पेंशन के पैसे स्वयं पर खर्च कर देते हो। कुछ तो ध्यान रखा करो। जहाँ रहते-खाते हो, उनके खर्चे पानी के लिए कुछ पैसे बचा कर रखा करो। हमारे भी बच्चे बड़े हो रहे हैं। इस महंगाई के जमाने में बच्चों के इतने महंगे स्कूल और ट्यूशनों की फीसे हैं। दादी भीगी बिल्ली बनी बोल रही थी पिछले महीने पोते राहुल के दाखिले के लिए एक लाख खाते से निकलवा कर दिए थे। अब मैं भी बूढ़ी हो गई हूँ। मेरी भी दवा-दारू का खर्चा होता है ।बेटियों की माँ हूँ। उनका नेग मान करना पड़ता है। दादी जोर-जोर से रोने लगीं। तभी पापा कुछ नर्म पड़ते हुए बोले माँ आपको तो मेरे हालात पता ही हैं। इस महंगाई के युग में कितना भी कमा लो पूरी हीं नहीं पड़ती और दादी की चापलूसी कर हीं-हीं कर हँसने लगे।

 अनन्या घर में रोज दादी के यहीं हालात देखती थी। माँ- पापा, दोनों बुआ अपनी घर गृहस्थी में हँसते-खेलते खिलखिलाते रहते थे। सभी का सुखी संसार था। भगवान की दया से सभी के पास सारी सुख-सुविधाएं थी। लेकिन सभी ने अपने दुखड़े माँ के आगे गाने की आदत बना ली थी। माँ अपने बच्चों के दुखड़े सुन-सुन कर तस्वीर का एक ही पक्ष देखती तथा सबकी सुखी गृहस्थी के लिए भगवान से प्रार्थना करती। कभी अपनी किस्मत को कोसती और कभी घुट-घुट कर रोती।

 घर में छोटे से आयोजन के लिए पूरा परिवार इकट्ठा हुआ। सुबह हवन पूजा हुई। दोपहर को सभी माँ के आगे एकजुट बैठ गए और शुरू हो गया दुखड़ों को रोने का सिलसिला। आज अनन्या से रूका नहीं गया और एकदम से बोल पड़ी"क्या दादी माँ कूड़ा दान है? जो आप लोग उनकी चिंता और घुटन की परवाह किए बिना अपनी परेशानियों के कूड़े-कचरे को उनमें उड़ेल कर बड़े निश्चिंत और बेफिक्र होकर अपने-अपने घरों को चल देते हो।" छोटी सी अनन्या के मुख से इतनी बड़ी बात सुन कर सभी अवाक तथा निरुत्तर उसका मुँह ताकते रहें।



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