कुमारी कन्या से प्राप्त शिक्षा-२०
कुमारी कन्या से प्राप्त शिक्षा-२०
अवधूत दत्तात्रेय जी राजा यदु से कहते हैं- "हे राजन् ! एक कुमारी बालिका द्वारा मैंने एकान्तवास की शिक्षा ग्रहण की है। उससे मैंने सीखा कि साधन - भजन करने के लिए एकान्त में निवास करना चाहिए। अधिक लोगों के रहने से आपस में कलह होती है। और दो व्यक्ति भी साथ रहते हैं तो आपस में बातचीत तो होती ही है। इसलिए साधक को अकेले ही विचरना चाहिए।
एक बार किसी कुमारी कन्या के घर उसे वरण करने के लिये कई लोग आये हुए थे। उस दिन उसके घर के लोग कहीं बाहर गये हुए थे। इसलिए उसने स्वयं ही उनका अतिथि सत्कार किया। उनको भोजन कराने के लिये वह घर के भीतर एकांत में धान कूटने लगी।उन अभ्यागतों के भोजन के लिये धान कूटते समय उस कन्या के दोनों हाथों में पड़ी शंख की चूड़ियॉं एक दूसरे से टकराकर तेज़ आवाज़ कर रहीं थीं। उस आवाज़ को उस लड़की ने लज्जास्पद समझा। क्योंकि उससे उसका स्वयं धान कूटना सूचित होता था ,जो कि उसकी दरिद्रता का द्योतक था ।
उस बुद्धिमती बालिका ने अतिथि सत्कार के लिए धान कूटना दरिद्रता का सूचक समझ कर लज्जा का अनुभव करते हुए एक -एक करके सब चूड़ियाँ तोड़ डालीं , और दोनों हाथों में केवल दो -दो चूड़ियाँ रहने दीं।
अब वह फिर धान कूटने लगी ।परन्तु वे दो -दो चूड़ियाँ भी बजने लगीं। तब उसने एक - एक चूड़ी और तोड़ दी। जब दोनों कलाइयों में केवल एक- एक चूड़ी रह गयी ,तब किसी प्रकार की आवाज़ नहीं हुई।"
अवधूत दत्तात्रेय जी राजा यदु को बताते हैं कि उस समय लोगों का आचार -विचार निरखने परखने के लिए दैवयोग से अकेला विचरण करता हुआ इधर -उधर घूमता-घामता मैं भी वहाँ पहुँच गया था। इस घटना को देखकर मैंने उससे यह शिक्षा ग्रहण की कि कुमारी कन्या की चूड़ी के समान अकेले ही विचरना चाहिए।जब तक बहुत लोगों का समूह रहता है, वहॉं वाद- विवाद अवश्य होता है।
अवधूत दत्तात्रेय जी ने कहा कि मैं इस जगत के स्वभाव के बारे में निरन्तर सीखते हुए पृथ्वी भर में विचरण करता हूँ। संसार भर में विचरण करते हुए सतर्क रहकर मैंने उस लड़की से और पहले बताये गये समस्त गुरुओं से स्वयं शिक्षा ग्रहण की है और अपनी यात्रा के दौरान इन उपदेशों को निष्ठापूर्वक सीखा है। इसलिए कुमारी कन्या के कंकण के समान संन्यासी सर्वदा अकेला विचरण करे , उसी प्रकार जैसे सिंह निर्द्वन्द होकर जंगल में अकेले विचरता है, और किसी को साथ न रखे।
