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कुल्हड़

कुल्हड़

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मल्टी नेशनल कम्पनी से रिटायर शगुन, चाय वाले को चाय के लिए कह कर वहीं बैंच पर बैठ गयी। सामने एक माँ-बेटी की बातचीत ने उसका ध्यान खींच लिया।

बेटी कुल्हड़ लेने की जिद कर रही थी।

"भैया क्या दो कुल्हड मिलेंगे।" लड़की की माँ ने चाय वाले से पूछा।

"नहीं बहन जी, खाली कुल्हड़ तो नहीं मिल सकता, हाँ चाय पी लीजिए। ये जगह शहर से दूर है और अगर कुल्हड़ खत्म हो जाये तो ग्राहक दुकान से बिना चाय पिये चला जाएगा जो हमारी रोजी के लिए शुभ नहीं।"

"सुन लिया, अब कोई जिद नहीं.........करोगी क्या इस कुल्हड़ का ?" माँ ने मुँह बिचकाते हुए कहा।

" वो........घर जा कर उसमें चाय पिया करूँगी।"

"क्यों ? कप नहीं रहे क्या घर में।" माँ ने दबी जबान में डपटते हुए कहा।

"मैं घर में भी यही वृंदावन वाली फीलिंग लेना चाहती थी।" लड़की ने मन की बात बताई।

चाय वाले ने शगुन के साथ ही उन माँ-बेटी को भी चाय दे दी।

शगुन थोड़ी ठंडी चाय पीती थी, जब उसने चाय पीनी शुरू की, वो दोनों चाय पी चुकी थी।

चाय पीते हुए उसने देखा लड़की ने अपने कुल्हड पानी में धोये और पुराने अखबार में लपेट कर बैग में रख लिए । जैसे ही बैग की चैन बंद कर चेहरे पर संतुष्टि का भाव लाई नजरें शगुन से टकरा गई। लड़की एकदम सकपका गई।

शगुन ने अंगूठा ऊपर करके लड़की का समर्थन किया। अचानक लड़की के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

शगुन भी कुल्हड़ बैग में रख रही थी।


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