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Vikram Singh

Horror Fantasy Thriller


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Vikram Singh

Horror Fantasy Thriller


कर्ण पिशाचिनी भाग 2

कर्ण पिशाचिनी भाग 2

9 mins 280 9 mins 280

विजयकांत को जब होश आया तब उसने देखा कि वो एक घर के आँगन में लेटा हुआ है। चारों तरफ बहुत सारे जिज्ञासु चेहरे उसे ही देख रहे थे। विजयकांत को होश आते ही वह लोग आपस में बात करने लगे।

" पंडित जी होश आ गया। "

इसके बाद जो बूढ़ा ब्राह्मण पास आकर उसके नाड़ी को जांच करने लगे , उन्हें देखकर विजयकांत आश्चर्य में पड़ गया। क्योंकि यही वो आदमी है जिसके घर विजयकांत आ रहा था।

इनका नाम महानंद आचार्य है। ये विजयकांत के कुल गुरु हैं। अपने पिता के निर्देश से एक जरूरी चिट्ठी पहुंचाने के लिए वह इनके पास आ रहा था।

विजयकांत के उठ कर बैठते ही महानंद जी बोले ,

 " आज आराम करो। कल तुम्हारी सभी बातों को सुनुँगा।

तुम खेत में बेहोश होकर पड़े थे। खेतों में जाने वाले लोगों ने जब तुम्हें देखा तो मेरे पास लेकर आए। मैं उन्हें थोड़ा बहुत औषधि देता हूं इसीलिए मेरे ऊपर वो सभी भरोसा करते हैं। तुम्हारे पूरे शरीर में मिट्टी व कीचड़ लगा था इसीलिए पहले मैं पहचान नहीं पाया। उन्होंने तुम्हारे जेब से एक चिट्ठी निकालकर मुझे दिया। तब मुझे पता चला कि तुम रामदास के लड़के हो। बेटे तुम शायद गलती से श्मशान की तरफ चले गए थे। कल का रात बहुत ही भयानक था। कुशग्रहणी अमावस्या में कोई भी गृहस्थ व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकलता। तुमने बहुत ही बड़ी गलती कर दी थी इस दिन बाहर निकलकर। तुम्हारे ऊपर जरूर ईश्वर की कृपा है वरना इस बार तो बचना मुश्किल था। दो दिन यहीं पर रहो , जब ठीक हो जाओगे तब घर चले जाना। "

बूढ़ी मां की देखरेख से विजयकांत एक दिन में ही ठीक हो गया। केवल दिमाग व मन में जो आतंक था वह समाप्त नहीं हुआ।

अगले दिन सुबह महानंद जी ने विजयकांत से उस रात की पूरी घटना को सुना। सुनने के बाद कुछ देर चुपचाप बैठे रहे फिर बोले,

" उस दिन गोपालेश्वर का कर्ण पिशाचिनी साधना में सिद्धि लाभ नहीं हुआ। जिसका कारण तुम ही हो लेकिन यह तुम्हारे लिए अच्छी बात नहीं है। वह तुम्हें हमेशा मारने की कोशिश करेगा क्योंकि उसके इतने दिनों की साधना खराब हुई है। "

विजयकांत बोला ,

" गुरुदेव , यह कर्ण पिशाचिनी साधना क्या है ? "

" यह एक पिशाच साधना है। इस साधना में शव के अंदर देवी कर्ण पिशाचिनी प्रकट होती हैं। अगर वो संतुष्ट हो गई तो जीवन भर हमेशा साथ रहेंगी। किसी भी व्यक्ति या वस्तु के बारे में साधक को सबसे पहले कर्ण पिशाचिनी कानों में बता देगी। इसे सिद्ध करने वाले साधक किसी का भी भविष्य जान सकते हैं तथा बहुत सारे शक्तिओं को पाते हैं। पिशाच साधना निम्न श्रेणी की साधना है। इस साधना के वक्त वातावरण लाश सड़ने जैसी गंध से भर जाती है। ऐसे साधक नरमांस भी खा सकते हैं। "

विजयकांत आश्चर्य होकर सुनता रहा फिर बोला,

" लेकिन क्या वह मुझे छोड़ देंगे? मैंने तो उनकी साधना को भंग किया है। "

" मैं तुम्हें महामृत्युंजय कवच दूंगा , जिससे वह तुम्हें मार नहीं पाएगा। लेकिन बार-बार तुम्हारे सामने विपत्ति आएगा। "

" लेकिन गुरुदेव मैंने तो कुछ भी जानबूझकर नहीं किया।

आखिर वैसे भयानक दृश्य को देखकर कौन नहीं डरेगा।"

" बेटा मैं सब कुछ समझ गया। लेकिन जो पिशाच साधना करते हैं वो अलौकिक सुख के अभिलाषी होते हैं अगर उसमें बाधा पड़ती है तो बहुत ही ज्यादा क्रोध से भर जाते हैं। फिर भी तुम चिंता मत करो , आज रहो और कल कवच लेकर चले जाना। "

अगले दिन हमेशा के लिए अभिशाप व महामृत्युंजय कवच को साथ लेकर विजयकांत बैलगाड़ी में बैठकर स्टेशन की ओर रवाना हुआ।...

उस कुशग्रहणी अमावस्या की रात को श्मशान के आसपास दूर - दूर के कुटी में रहने वाले देवी भक्त व सितारा बजाकर ईश्वर नाम जप करने वालों को एक भयंकर क्रोध हाहाकार की आवाज़ सुनाई दिया।

इसे चिल्लाहट या हुंकार कहें , इस बात को वो सरल डरपोक लोग समझ नहीं पा रहे थे। वो सभी केवल आवाज को सुनकर आँख बंद करके काँपते रहे। माओं ने आतंकित होकर अपने छोटे बच्चों को सीने से लगाए रखा। हुंकार की आवाज़ ऐसी थी मानो बाघ से उसका शिकार किसी ने छीन लिया है अथवा जैसे किसी के आखों में गर्म लोहे की तीली डाल दिया गया है।

सुबह डरते हुए उन्होंने अपने घर वह कुटी से बाहर निकल कर देखा। नहीं कहीं कोई भयानक घटना की चिन्ह नहीं है। केवल जहाँ बड़े - बड़े पेड़ों से घिरे एक जगह पर अक्सर राह चलते साधु अपना डेरा बांध लेते हैं , वहीं पर एक यज्ञ कुंड और एक खोपड़ी तथा कुछ अधजला लकड़ी पड़ा हुआ है। वहीं पास में एक नग्न लड़की का शव भी है।

एक कपड़े से शव को ढककर वो सभी नंद ठाकुर के पास चल पड़े। उनके एकमात्र गुरु महाशय महानन्द आचार्य जिन्हें वो सभी नंद ठाकुर कहकर बुलाते थे। महानंद जी ने उन लोगों से सब कुछ सुना फिर बोले ,

" चलो , मैं एक बार उस जगह को देख लेता हूं। "

सब कुछ देख कर महानंद जी समझ गए कि कोई यहां पर तंत्र साधना कर रहा था। शायद साधना में कोई बाधा उत्पन्न हुई इसीलिए शव के साथ साधना सामग्री भी यहीं पर रखा हुआ है। वहाँ उपस्थित दुसरे लोग थोड़े ज्यादा डरपोक हैं अगर उन्हें सच पता चला तो डर जाएंगे इसीलिए उन्होंने बोला ,

" कल कुशग्रहणी अमावस्या था। पास ही श्मशान है। इस रात को बहुत सारे अशुभ शक्ति जमीन पर आते हैं।

अलौकिक घटनाएं घटती है लेकिन तुम सभी को डरने की कोई जरूरत नहीं। अब इस जगह को नदी के पानी से धो डालो और शव को श्मशान में ले जाकर इसका दाह -संस्कार करके फिर नदी में नहा धोकर घर चले जाओ। मैं हूं डरने की कोई जरूरत नहीं। "

यह सुनकर वो सभी दाह के कार्य में लग गए। इसके बाद महानंद जी घर लौट आए। वहाँ एक और घटना , खेत में बेहोश पड़े विजयकांत को किसानों ने उनके घर उठाकर लाया है। होश आने के बाद उसके पास से सभी घटना व तांत्रिक के शरीर गढ़न को सुनकर महानंद जी समझ गए कि यह गोपालेश्वर के अलावा और कोई नहीं हो सकता।

गोपालेश्वर उनके बचपन का साथी है। अब हम गोपालेश्वर के बारे में कुछ जान लेते हैं। ,

गोपालेश्वर इसी गांव के एक गरीब पंडित का लड़का था।

उसके पिता का रामराम मुखर्जी इस टोली में यहाँ के पुजारी थे। योग मार्गदर्शन का अभ्यास करते , तथा वास्तु शास्त्र, ग्रह - नक्षत्र व कुंडली भी देखते थे। वो सात्विक व अच्छे आदमी थे , सरल जीवन यापन में विश्वास रखते। अपने एकमात्र लड़के गोपाल के हाथों की रेखाओं को देखकर उन्हें उसके अशुभ भविष्य का पता चला था।

बचपन से ही गोपाल के मन में भोग देकर शक्ति पाने की इच्छा रहती। जब तक उसकी मां जिंदा थी तब तक उसे सभी गलत रास्ते से दूर रखती थी। लेकिन गोपाल की मां का बुखार से जब देहांत हुआ तब गोपाल केवल 17 साल का था। कुछ दिनों बाद ही वह गांव के बाहर वाले श्मशान में कुछ साधुओं से जाकर मिला। और दिन भर उन साधुओं के साथ समय बिताने लगा। तंत्र विद्या सीखने के लिए उन साधुओं की सेवा करता , इसके बदले उसे गांजा और भांग का प्रसाद भी मिलता। तथा कुछ छोटे - मोटे जादू भी सीख लेता। रामराम के कई बार समझाने पर भी उसके दिमाग से यह बुखार नहीं उतरा।

इसके कुछ दिनों बाद गांव में कुछ घटनाएं होने लगी। गांव में अक्सर ही छोटे पशुओं का मरा हुआ शरीर मिलने लगा। अमानवीय तरीके से उनकी हत्या की जाती थी।

कोई उनके पिछले दोनों पैरों को दो तरफ खींचकर चमड़े व मांस को फाड़ डालता , जिसके कारण पेट के अंग जमीन पर पड़े रहते। गांव के एक कसाई ने ठीक से देख कर बताया कि प्रतिदिन सभी मरे हुए जानवर में कोई न कोई अंग गायब रहता है। ऐसी पशु हत्या कौन कर रहा है यह किसी को पता नहीं चला। गांव के लोग शाम होने से पहले ही अपने मुर्गी , बत्तख , बकरी यहां तक कि कुत्ते - बिल्लियों को भी छोटे - छोटे बाड़े के अंदर बंद रखना शुरू कर दिया। कुछ दिन बाद सब कुछ बंद हो गया। अब लोगों को लगा वो इससे छुटकारा पा चुके हैं।

ऐसे ही एक दिन किसी की गाय घास चरने गई लेकिन लौटकर नहीं आई। बहुत ही खोजबीन के बाद वह कोपाई नदी के किनारे मिली। तब तक उस गाय के आंखों से निकलने वाली आंसू सूख चुकी थी। बीच-बीच में वह किसी दर्द से कांप रही थी। उसके मुँह पर ताज़ा खून लगा हुआ था। सभी आश्चर्य होकर सोच रहे थे कि गाय के मुंह पर खून क्यों लगा है। तभी उस गाय के मालिक ने देखा कि गाय का जीभ किसी ने काट लिया है। ऐसे विभत्स दृश्य को देखकर सभी दौड़ते हुए रामराम पंडित के पास पहुंचे। लेकिन वो तो पंडित हैं कोई पुरोहित व गुरु नहीं इसीलिए उनकी ज्यादा मदद नहीं कर सके।

पूरे गांव में इस घटना के बाद आतंक ऐसे फैल गया कि लोग रास्ते पर अकेले चलने से भी डरने लगे।

रामराम पंडित के मन में एक संदेह हो चुका था। वो जान चुके थे कि यह कार्य निम्न श्रेणी के तंत्र साधना के क्रियाकलाप का अंश है। कोई प्रथम स्तर के तंत्र साधना से खुद को तैयार कर रहा है। गोपाल के ऊपर उनकी कड़ी नजर थी। वो गोपाल के पास आते ही एक सड़ा हुआ गंध पाते थे। इस वक्त गोपाल के अंदर साफ सुथरा रहने का कोई लक्षण नहीं दिखता , वह तो अपने बाल व दाढ़ी को भी काटना नहीं चाहता। पूरा दिन सोता रहता और शाम होते ही घर से निकल पड़ता। वह रात को लौटकर आता इस बारे में पंडित रामराम को पता ही नहीं चलता। उस दिन गांव के लोगों के जाने के बाद पंडित रामराम अपने बेटे गोपाल के झोपड़ी में गए। गोपाल उस वक्त गहरी नींद में सो रहा था। झोपड़ी में घुसते ही एक अन्य तरह का गंध उनके नाक में गया। अपने नाक को हाथ से दबाकर वह इधर उधर ना जाने क्या ढूंढने लगे।

जल्द ही उन्हें एक कपड़े के झोले में कई प्रकार के पशुओं के अंग मिले। उसी में एक ताज़ा कटा हुआ जीभ भी था शायद उसी गाय की है। यह देख पंडित रामराम कुछ भी बोलने की हालत में नहीं थे। गोपाल के हाथ की रेखाएं उन्हें याद आई , जिसमें उन्होंने देखा था कि यह लड़का बहुत सारे मृत्यु का कारण बनेगा। भोग - लालसा के लिए वह बहुत दूर तक जा सकता है। अपने भाग्य को वो कोसने लगे।

ब्राह्मण परिवार में ये कौन पैदा हो गया। अब वो क्या करें ? सोचते हुए उनका सिर चकराने लगा था , किसी तरह दीवार से खुद को संभाला। लेकिन इस आवाज़ से गोपाल जाग गया।

अपने क्रिया कांड वाले वस्तुओं के सामने पिता को खड़ा देख उसके मुँह से एक क्रूर हंसी निकल आई। वह बोला ,

" आपको जब सब कुछ पता चल ही गया है तो यहां पर और समय मत व्यर्थ कीजिए। "

पंडित रामराम कुछ देर शांत होकर खड़े रहे। इसके बाद कड़क आवाज़ में बोले ,

" तुम अभी इस घर को छोड़कर बाहर निकल जाओ। तुम्हें मैं अपने घर से बेदखल करता हूं। कभी भी इस घर की तरफ मुड़कर भी मत देखना। "

इतना बोलकर पंडित रामराम झोपड़ी से निकलकर गमछा लेकर कोपाई नदी में नहाने चले गए।

बहुत देर तक नदी में नहाने के बाद जब वो घर लौटे , उस वक्त गोपाल जहाँ रहता था वह झोपड़ी खाली हो चुकी थी। अगले दिन पंडित रामराम ने पूरा घर धोकर शुद्धि पूजा समाप्त किया। उसके बाद गांव में होने वाले सभी उपद्रव समाप्त हो गए।

गोपाल अपने भविष्य के पथ पर खो गया। घर से निकालें गोपाल की मृत्यु हुई लेकिन गोपालेश्वर बचा रहा।

सांप जैसे अपने पुराने केंचुल को छोड़कर नए में प्रवेश करता है , गोपालेश्वर ने भी अपने सात्विक ब्राह्मण परिचय को त्यागकर तंत्र साधना के मार्ग में प्रवेश किया।

कहां गया ? क्या कर रहा है ? इस बारे में कभी किसी ने जानना नहीं चाहा।.....


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