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Vijay Erry

Classics Inspirational Others

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Vijay Erry

Classics Inspirational Others

कॉलेज की यादें

कॉलेज की यादें

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कॉलेज की यादें

लेखक: विजय शर्मा एर्री

स्कूल की घंटी बजते ही पूरा मैदान बच्चों से भर जाता था। एक तरफ कक्षाओं की कतारें लग जाती थीं, दूसरी तरफ वो छोटा-सा कमरा जहाँ से हमेशा कोई न कोई खुशबू आती रहती थी—गर्म समोसे की, मीठी चाय की, कभी-कभी फ्रेश ब्रेड-बटर की। हम सब उसे सिर्फ ‘कैन्टीन’ कहते थे। लेकिन वो सिर्फ कैन्टीन नहीं थी। वो हमारी दोपहरों का घर थी, दोस्तों की अड्डा थी, और कई बार तो चुपके-चुपके सपनों का ठिकाना भी।

मेरा नाम अरुण था। आठवीं कक्षा में था जब मैंने पहली बार उस कैन्टीन का दरवाज़ा खोला। माँ ने सुबह-सुबह पाँच रुपये दिए थे और कहा था, “जरूरत पड़े तो खा लेना।” मैंने उस दिन सिर्फ पानी पिया। कैन्टीन वाले अंकल, जिन्हें सब ‘चाचा’ कहते थे, मुस्कुराए और बोले, “पहली बार आया है क्या? आ जा, बैठ। पानी तो मुफ्त है।” उस दिन से चाचा मेरे अनौपचारिक अभिभावक बन गए।

कैन्टीन छोटी थी। तीन लकड़ी की लंबी मेजें, कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ, एक काँच की अलमारी जिसमें बिस्कुट, चिप्स और कभी-कभी आइसक्रीम के पैकेट सजे रहते थे। दीवार पर पुरानी कैलेंडर टंगी थी जिस पर कोई फिल्मी हीरो मुस्कुरा रहा था। पीछे की तरफ एक छोटी सी खिड़की थी जहाँ से चाचा समोसे तलते थे। तेल की गंध, आलू-मसाले की खुशबू और चाय के केतले की फुफकार—ये तीन चीज़ें मिलकर एक ऐसी सुगंध बनाती थीं जो आज भी कभी-कभी सपनों में आ जाती है।

नौवीं कक्षा में हमारा समूह बन गया। राहुल, संजय, नीरज और मैं। चारों की जेबें अक्सर खाली रहती थीं, लेकिन कैन्टीन में बैठने का तरीका ऐसा था मानो हम राजा हों। एक समोसा चार टुकड़ों में बाँट लिया जाता। चाय का गिलास घुमा-घुमा कर पिया जाता। कभी-कभी कोई अमीर बच्चा पूरा पैकेट चिप्स खरीद लेता तो हम सब चुपके से उसके आसपास घूमने लगते। राहुल हमेशा कहता, “यार, एक दिन मैं भी पूरा पैकेट खरीदूँगा और सबको बाँटूँगा।” हम हँसते। उस समय लगता था कि वो दिन कभी आएगा ही नहीं।

दसवीं कक्षा आते-आते कैन्टीन हमारी जिंदगी का केंद्र बन चुकी थी। ब्रेक का समय आते ही हम भागते। कभी-कभी क्लास टीचर के डांट खाने के बाद भी हम वहाँ पहुँच जाते। चाचा हमें देखते ही समझ जाते। “आज फिर किसी ने डांटा?” पूछते। हम सिर हिलाते। वो चुपचाप एक एक्स्ट्रा समोसा रख देते और कहते, “इस बार मेरी तरफ से।” हम विरोध करते, लेकिन वो नहीं मानते। “तुम लोग पढ़ोगे तो आगे जाकर बड़े आदमी बनोगे। तब याद रखना चाचा को।” हम हँसते हुए कहते, “चाचा, आप तो हमेशा याद रहोगे।”

उस साल एक नई लड़की आई। नाम था अंजलि। शांत, किताबों में डूबी हुई। पहली बार जब वो कैन्टीन आई, हम सब चुप हो गए। राहुल ने फुसफुसाकर कहा, “यार, ये तो बहुत पढ़ाकू लगती है।” संजय ने जोड़ा, “शायद समोसा भी नहीं खाती।” लेकिन अंजलि ने चाचा से एक चाय माँगी और कोने वाली मेज पर बैठ गई। हम सब हैरान। अगले दिन फिर आई। और फिर। धीरे-धीरे वो हमारे समूह का हिस्सा बन गई, हालाँकि कभी ज़्यादा बात नहीं करती थी। बस सुनती थी, मुस्कुराती थी, और कभी-कभी अपनी नोटबुक में कुछ लिख लेती थी।

एक दिन बारिश हो रही थी। स्कूल का मैदान कीचड़ से भर गया था। हम चारों और अंजलि कैन्टीन में बैठे थे। बिजली चली गई। चाचा ने मोमबत्ती जलाई। उस मंद रोशनी में समोसे और चाय का स्वाद और भी गहरा लग रहा था। राहुल ने अचानक कहा, “यार, कभी सोचा है कि दस साल बाद हम कहाँ होंगे?” सब चुप। नीरज बोला, “मैं डॉक्टर बनूँगा।” संजय ने कहा, “मैं बिजनेस करूँगा।” मैंने सोचा और बोला, “मुझे नहीं पता। शायद कुछ लिखूँगा।” अंजलि ने पहली बार लंबी बात की, “मैं टीचर बनूँगी। बच्चों को सिखाऊँगी कि किताबों के अलावा भी दुनिया है।” हम सब हैरान। चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा, “सब बनोगे। बस एक बात याद रखना—दोस्ती मत भूलना।”

उस दिन की बात आज भी याद है। बारिश की आवाज़, मोमबत्ती की लौ, और पाँच दोस्तों की वो छोटी सी दुनिया।

ग्यारहवीं-बारहवीं आते-आते चीजें बदलने लगीं। पढ़ाई का दबाव बढ़ गया। कोचिंग के नाम पर कैन्टीन का समय कम हो गया। फिर भी जब भी मिलते, वहीं बैठते। अब समोसे के साथ-साथ चाय भी दो-दो गिलास पीने लगे थे। कभी-कभी अंजलि अपनी कॉपी से कविताएँ सुनाती। एक कविता आज भी याद है—

“छोटी सी मेज, गर्म सी चाय,

दोस्तों की हँसी, और वो पुरानी सी गाय।

समय जाता रहा, हम बढ़ते गए,

लेकिन कैन्टीन की यादें दिल में बसती रहीं।”

हमने तालियाँ बजाईं। चाचा ने कहा, “बहुत अच्छा लिखा है बेटी।” अंजलि शरमा गई।

बारहवीं के आखिरी दिन कैन्टीन में एक छोटी सी पार्टी हुई। चाचा ने खुद समोसे बनाए, और एक बड़े बर्तन में चाय तैयार की। हम सब इकट्ठे हुए। पुराने दोस्त, नए दोस्त, यहाँ तक कि कुछ टीचर भी आ गए। राहुल ने वादा पूरा किया—उसने पूरा पैकेट चिप्स खरीदा और सबको बाँटा। हमने हँसते-हँसते खाया। फिर सबने मिलकर चाचा को एक छोटा सा गिफ्ट दिया—एक शर्ट और एक कार्ड जिसमें सबके हस्ताक्षर थे। चाचा की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, “तुम लोग जा रहे हो, लेकिन कैन्टीन यहीं रहेगी। जब भी शहर आना, चक्कर लगा लेना।”

उसके बाद जीवन तेज़ी से चला। कॉलेज, जॉब, शहर बदलना। राहुल दिल्ली चला गया। संजय अपना छोटा सा व्यापार शुरू कर दिया। नीरज डॉक्टर बन गया। अंजलि सच में टीचर बनी और किसी छोटे शहर के स्कूल में पढ़ाने लगी। मैंने लिखना शुरू किया—कहानियाँ, लेख, कभी-कभी कविताएँ। लेकिन कैन्टीन की वो गंध कभी नहीं गई।

पाँच साल बाद जब मैं अपने शहर लौटा, तो सबसे पहले स्कूल गया। मैदान वही था, इमारत थोड़ी नई लग रही थी। कैन्टीन का दरवाज़ा खुला था। अंदर एक नए व्यक्ति ने मुस्कुराकर कहा, “क्या लेंगे?” मैंने पूछा, “चाचा कहाँ हैं?” वो थोड़ा चुप रहा, फिर बोला, “चाचा दो साल पहले चले गए। दिल का दौरा पड़ा था। अब मैं देखता हूँ।”

मैं वहाँ खड़ा रह गया। दीवार पर वही पुरानी कैलेंडर नहीं थी। मेजें नई थीं। लेकिन जब मैंने आँखें बंद कीं, तो वही गंध आई—समोसे की, चाय की, और दोस्तों की हँसी की। मैंने एक चाय मँगवाई और कोने वाली मेज पर बैठ गया। वही मेज जहाँ कभी बारिश वाले दिन हम पाँच बैठे थे।

मैंने अपनी नोटबुक निकाली और लिखने लगा। उसी दिन की बातें, उन्हीं चेहरों की यादें। लिखते-लिखते लगा कि समय थम गया है। बाहर बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं। कोई समोसा माँग रहा था, कोई चिप्स। कैन्टीन जिंदा थी। सिर्फ चेहरे बदल गए थे।

रात को घर आकर मैंने पुराने दोस्तों को मैसेज किया। राहुल ने तुरंत जवाब दिया, “यार, कब मिलते हैं? कैन्टीन वाली बात याद आ गई।” संजय ने कहा, “अगले महीने आ रहा हूँ। तय कर लो।” नीरज ने लिखा, “डॉक्टरी की व्यस्तता में भी वो चाय याद रहती है।” अंजलि का मैसेज सबसे लंबा था—“मैंने अपने छात्रों को आज तुम्हारी वो कविता सुनाई। उन्होंने पूछा, ‘मैडम, क्या सच में ऐसी कैन्टीन होती है?’ मैंने कहा, ‘हाँ, होती है। और वो कभी खत्म नहीं होती।’”

हमने तय किया कि अगले महीने सब मिलेंगे। उसी शहर में, उसी स्कूल के बाहर। शायद नई कैन्टीन में बैठकर पुरानी बातें करेंगे। शायद चाचा की याद में एक समोसा ज़्यादा खाएँगे।

आज जब मैं यह कहानी लिख रहा हूँ, तो सामने चाय का कप रखा है। स्वाद अलग है, लेकिन यादें वही हैं। कैन्टीन सिर्फ एक जगह नहीं थी। वो वो समय था जब हम अभी बड़े नहीं हुए थे, जब जेबें खाली थीं लेकिन दिल भरे हुए थे, जब एक समोसा बाँटने में भी खुशी मिलती थी।

कभी-कभी लगता है कि जीवन की सबसे कीमती चीजें छोटी-छोटी जगहों पर छिपी होती हैं। एक छोटी सी कैन्टीन, तीन मेजें, एक मुस्कुराता हुआ चाचा, और पाँच दोस्त। बस इतना ही काफी था पूरी दुनिया के लिए।

अब जब भी कोई बच्चा समोसा खाते हुए हँसता दिखता है, तो मुझे अपना बचपन याद आ जाता है। और मैं मन ही मन मुस्कुरा लेता हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ—कैन्टीन की यादें कभी पुरानी नहीं होतीं। वो बस थोड़ी देर के लिए दिल के किसी कोने में सो जाती हैं, और जब भी कोई गर्म चाय की फुफकार सुनाई देती है, तो उठकर बैठ जाती हैं।

और तब लगता है कि समय कितना भी आगे बढ़ जाए, कुछ चीजें हमेशा पीछे छूटती हैं—नहीं, छूटती नहीं। बस साथ चलती रहती हैं। चुपचाप, धीरे-धीरे, जैसे कैन्टीन की वो पुरानी खुशबू।

(लगभग 2000 शब्द)

— विजय शर्मा एर्री


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