मेरा स्कूल
मेरा स्कूल
विजय शर्मा एरी
अजनाला, अमृतसर
मेरा स्कूल
सुबह की पहली किरण जब खिड़की से अंदर घुसी, तो रोहन की आँखें पहले से ही खुली हुई थीं। उसने पूरी रात लगभग नहीं सोई थी। तकिया गीला हो चुका था पसीने से और दिल की धड़कनें ऐसी लग रही थीं जैसे कोई ढोल पीट रहा हो। आज उसका स्कूल का पहला दिन था।
रोहन आठ साल का था। अब तक वह घर पर ही माँ से अक्षर सीखता रहा था। माँ कहती थीं, “बेटा, स्कूल जाने का समय आ गया है। वहाँ तुम्हें नई-नई बातें सीखने को मिलेंगी, नए दोस्त बनेंगे।” लेकिन रोहन के मन में डर बैठ गया था। स्कूल का मतलब था अजनबी चेहरे, बड़ी-बड़ी इमारतें, और वह सख्त आवाज़ वाली मैडम जिसके बारे में पड़ोस के बच्चों ने डराया था।
माँ रसोई से आवाज़ लगा रही थीं, “रोहन! उठ जा बेटा। आज देर मत कर।”
रोहन ने धीरे से कंबल हटाया। ठंडी हवा ने उसे झकझोर दिया। वह बिस्तर पर बैठ गया और दीवार पर टंगे कैलेंडर को देखने लगा। 15 जुलाई 1998। लाल घेरा बना हुआ था उस तारीख पर। माँ ने खुद बनाया था।
पिताजी बाथरूम से निकले। उन्होंने रोहन के सिर पर हाथ फेरा, “डर मत बेटा। हर किसी का पहला दिन ऐसा ही होता है। मैं भी डरता था।”
रोहन ने सिर हिलाया, लेकिन दिल नहीं माना।
नहाने के बाद माँ ने उसे नया नीला हाफ-पैंट और सफेद कमीज़ पहनाई। कॉलर सीधा किया, बटन ठीक से बंद किए। फिर उसने रोहन के बालों में तेल लगाकर कंघी की। शीशे में देखकर रोहन को खुद पर तरस आया। वह कितना छोटा लग रहा था।
माँ ने टiffin बॉक्स में पराठे और अचार रखा, पानी की बोतल भरी और स्कूल बैग में किताबें लगाईं। बैग नया था, नीले रंग का, जिस पर कार्टून की तस्वीर बनी थी। रोहन ने बैग को दोनों हाथों से पकड़ लिया जैसे कोई अनमोल खजाना हो।
स्कूल जाने का समय हो गया। पिताजी स्कूटर निकाल लाए। रोहन पीछे बैठ गया। माँ गेट तक आईं। उनकी आँखों में हल्की नमी थी, लेकिन मुस्कान ओढ़ रखी थी।
“बेटा, ध्यान रखना। मैडम जी की बात मानना। और हाँ… अगर रोना आए तो चुपचाप आँसू पोंछ लेना। कोई नहीं देखेगा।”
रोहन ने सिर हिलाया। स्कूटर चल पड़ा। सड़कें परिचित थीं, लेकिन आज सब कुछ अलग लग रहा था। पेड़, मकान, दुकानें—सब जैसे उसे देख रहे हों और कह रहे हों, “जा रहा है स्कूल!”
स्कूल का गेट दूर से ही दिखाई दिया। ऊँची दीवारें, लोहे का बड़ा गेट, और अंदर हरे-भरे मैदान। गेट पर बड़े-बड़े बच्चे खड़े थे। कुछ हँस रहे थे, कुछ दौड़ रहे थे। रोहन का दिल और जोर से धड़कने लगा।
पिताजी ने स्कूटर रोका। रोहन उतर गया। उसके पैर काँप रहे थे। पिताजी ने उसका हाथ पकड़ा और अंदर ले गए।
प्रिंसिपल महोदया के ऑफिस के बाहर कतार लगी थी। नए बच्चों के माता-पिता खड़े थे। रोहन ने चारों ओर देखा। कुछ बच्चे रो रहे थे, कुछ माँ के आँचल में छिपे हुए थे। एक छोटी लड़की तो जोर-जोर से चिल्ला रही थी, “मैं घर जाऊँगी!”
रोहन ने अपनी आँखें झुका लीं। वह भी रोना चाहता था, लेकिन माँ की बात याद आ गई।
जब उनकी बारी आई, तो प्रिंसिपल महोदया ने मुस्कुराते हुए कहा, “रोहन शर्मा? कक्षा पहली-बी। मैडम सुनीता आपके क्लास टीचर हैं।”
पिताजी ने फॉर्म भरे, फीस जमा की। फिर एक चपरासी रोहन को कक्षा तक छोड़ने आया। पिताजी ने कहा, “बेटा, मैं बाहर इंतज़ार कर रहा हूँ। दोपहर को मिलूँगा।”
रोहन ने पीछे मुड़कर देखा। पिताजी गेट की तरफ जा रहे थे। अचानक रोहन को लगा जैसे कोई उसकी छाती से हवा निकाल रहा हो। आँखें भर आईं। उसने जल्दी से आँसू पोंछ लिए।
कक्षा का कमरा बड़ा था। लकड़ी की बेंचें पंक्तियों में लगी थीं। ब्लैकबोर्ड काला चमक रहा था। मैडम सुनीता खड़ी थीं—साड़ी पहने, बाल बाँधे हुए, चेहरे पर नरम मुस्कान।
“आओ बेटा, इधर बैठो,” उन्होंने रोहन को पहली पंक्ति में जगह दी।
रोहन बैठ गया। बगल में एक लड़का बैठा था। उसका नाम अमन था। अमन ने फुसफुसाकर पूछा, “तू भी नया है?”
रोहन ने सिर हिलाया।
“डर मत। मैं भी डर रहा था सुबह। लेकिन देख, कुछ नहीं हुआ।”
अमन की बात से रोहन को थोड़ी तसल्ली हुई।
मैडम ने रोल कॉल लिया। फिर सबको अपना-अपना परिचय देने को कहा। जब रोहन की बारी आई, तो उसका गला सूख गया। वह खड़ा हुआ, लेकिन शब्द नहीं निकले। कक्षा में सन्नाटा छा गया। कुछ बच्चे हँसने लगे।
मैडम सुनीता पास आईं। उन्होंने रोहन के कंधे पर हाथ रखा, “कोई बात नहीं बेटा। धीरे-धीरे बोलो। तुम्हारा नाम क्या है?”
“रो… रोहन,” उसने फुसफुसाया।
“बहुत अच्छे। बैठ जाओ।”
उस छोटी सी बात ने रोहन का दिल हल्का कर दिया।
पहली घंटी बजने तक कक्षा में अक्षरों की पहचान करवाई गई। रोहन ने ध्यान से सुना। माँ ने जो सिखाया था, वह याद आ रहा था। जब मैडम ने ब्लैकबोर्ड पर ‘अ’ लिखा, तो रोहन को लगा जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो।
रिसेस में सब बच्चे मैदान में दौड़ पड़े। रोहन एक कोने में खड़ा रहा। अमन उसके पास आया।
“चल, मेरे साथ खेल। मैं तुझे स्लाइड पर ले चलता हूँ।”
रोहन हिचकिचाया, फिर मान गया। स्लाइड पर चढ़ते समय उसका दिल जोर से धड़का, लेकिन जब वह नीचे फिसला, तो उसके मुँह से हँसी निकल गई। पहली बार स्कूल में हँसी।
दोपहर का खाना खाते समय रोहन ने अपना टiffin खोला। पराठे ठंडे हो चुके थे, लेकिन माँ का हाथ याद आते ही वह स्वादिष्ट लगने लगा। अमन ने अपना समोसा बाँटा। रोहन ने भी अपना पराठा दिया। दोनों हँसते-हँसते खाते रहे।
आखिरी घंटी बजी। बच्चे भागते हुए गेट की तरफ गए। रोहन ने धीरे-धीरे अपना बैग उठाया। मैडम सुनीता ने उसे बुलाया।
“रोहन, आज तुमने बहुत अच्छा किया। कल फिर आना। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।”
रोहन ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
बाहर पिताजी खड़े थे। रोहन दौड़कर उनके पास गया और उनकी कमर से चिपक गया।
“कैसा रहा बेटा?”
रोहन ने सिर उठाया। आँखों में अब डर नहीं था। हल्की चमक थी।
“अच्छा था पापा। मेरा एक दोस्त भी बन गया। अमन।”
पिताजी हँसे। स्कूटर पर बैठते समय रोहन ने पीछे मुड़कर स्कूल को देखा। इमारत अब डरावनी नहीं लग रही थी। वह लग रही थी जैसे कोई नया घर।
घर पहुँचते ही माँ ने पूछा, “कैसा रहा पहला दिन?”
रोहन ने बैग नीचे रखा और बोला, “माँ, स्कूल में डर लगता है… लेकिन दोस्त बन जाएँ तो डर कम हो जाता है।”
माँ ने उसे गले लगा लिया। उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे।
रात को सोते समय रोहन ने खिड़की से चाँद को देखा। उसने मन ही मन सोचा—कल फिर स्कूल जाना है। और इस बार वह डर के साथ नहीं, बल्कि थोड़ी सी उत्सुकता के साथ जाएगा।
क्योंकि आज उसने सीखा था कि हर शुरुआत डरावनी होती है… लेकिन हर शुरुआत एक नई कहानी की शुरुआत भी होती है।
और उसकी कहानी तो अभी शुरू ही हुई थी।
विजय शर्मा एरी
अजनाला, अमृतसर
