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Vijay Erry

Fantasy Inspirational

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Vijay Erry

Fantasy Inspirational

मौन के सुर

मौन के सुर

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शीर्षक: मौन के सुर 

गांव के किनारे एक पुराना बरगद का पेड़ था. उसकी छांव में रोज़ एक वृद्ध व्यक्ति बैठा रहता था. सफेद दाढ़ी, साधारण कपड़े, शांत चेहरा और आंखों में गहरा सागर. लोग उसे "मौन बाबा" कहते थे क्योंकि उन्होंने वर्षों से किसी को अपने मुंह से बोलते नहीं सुना था.

बच्चे उन्हें देखकर हंसते, कुछ लोग प्रणाम करते, कुछ उन्हें पागल समझते. लेकिन मौन बाबा के चेहरे पर कभी कोई शिकायत नहीं आती. वे बस मुस्कुरा देते.

उसी गांव में आरव नाम का एक युवक रहता था. वह पढ़ा-लिखा था, लेकिन भीतर से बेहद बेचैन. नौकरी थी, पैसा था, परिवार था, फिर भी उसे लगता था कि जीवन में कुछ कमी है. वह हर समय लोगों से बहस करता, अपनी बात मनवाने की कोशिश करता और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता.

एक दिन उसकी मां ने कहा, "बेटा, तू हर समय बोलता रहता है. कभी मौन होकर भी अपने मन को सुन."

आरव मुस्कुराया. "मां, बोलने से ही समस्याएं हल होती हैं."

मां ने उत्तर दिया, "हर समस्या शब्दों से नहीं, कुछ समस्याएं मौन से भी हल होती हैं."

अगले दिन आरव बरगद के नीचे पहुंचा. उसने मौन बाबा को प्रणाम किया और पूछा, "बाबा, लोग कहते हैं कि आप बहुत ज्ञानी हैं. अगर सच है तो कुछ बोलिए."

मौन बाबा मुस्कुराए, लेकिन बोले नहीं.

आरव को गुस्सा आ गया. "जब बोलना ही नहीं तो ज्ञान किस काम का?"

इतना कहकर वह चला गया.

कुछ दिन बाद गांव में तेज़ बारिश हुई. नदी उफान पर थी. अचानक खबर आई कि एक बच्चा नदी में गिर गया है.

गांव वाले दौड़ पड़े.

मौन बाबा भी तेज़ कदमों से वहां पहुंचे. उन्होंने बिना एक शब्द बोले रस्सी उठाई, पेड़ से बांधी और नदी में उतर गए. बड़ी मुश्किल से बच्चे को बाहर निकाल लाए.

पूरा गांव तालियां बजा रहा था.

आरव भी वहीं खड़ा था. उसे पहली बार लगा कि बिना बोले भी बहुत कुछ कहा जा सकता है.

उसने मन ही मन सोचा, "आज इनके मौन ने हजार भाषणों से ज्यादा काम किया."

कुछ दिनों बाद आरव फिर बाबा के पास गया.

उसने कागज़ पर लिखा, "क्या मौन बोलने से बड़ा होता है?"

मौन बाबा ने पहली बार उत्तर भी शब्दों से नहीं दिया.

उन्होंने जमीन पर एक छोटा-सा बीज रखा.

फिर पास खड़े विशाल बरगद की ओर इशारा किया.

आरव समझ नहीं पाया.

उसी समय पास बैठे एक किसान ने कहा, "बेटा, बीज कभी शोर नहीं करता, लेकिन मौन रहकर विशाल वृक्ष बन जाता है."

आरव सोच में डूब गया.

उस दिन से उसने मौन बाबा को ध्यान से देखना शुरू कर दिया.

एक दिन दो पड़ोसी ज़मीन के विवाद में लड़ रहे थे. गालियां, धमकियां, मारपीट...

मौन बाबा वहां पहुंचे.

उन्होंने दोनों के बीच एक आईना रख दिया.

दोनों झगड़ते-झगड़ते अपने चेहरे देखने लगे.

चेहरों पर क्रोध, आंखों में नफरत और माथे पर तनाव.

कुछ पल बाद दोनों शांत हो गए.

किसी ने पूछा, "बाबा, आपने क्या किया?"

मौन बाबा मुस्कुराए.

इस बार भी उनका मौन बोल चुका था.

आरव ने समझ लिया कि कई बार आईना उपदेश से बड़ा शिक्षक होता है.

समय बीतता गया.

आरव अब कम बोलने लगा. पहले वह हर बात का उत्तर तुरंत देता था. अब सुनता ज्यादा था.

लोगों ने कहना शुरू किया, "तुम बदल गए हो."

वह मुस्कुरा देता.

एक दिन गांव में एक प्रसिद्ध वक्ता आए. उन्होंने तीन घंटे का प्रवचन दिया.

प्रवचन समाप्त हुआ तो लोगों ने खूब तालियां बजाईं.

उसी समय किसी ने मौन बाबा की ओर देखा.

वे चुपचाप एक घायल कुत्ते के पैर पर पट्टी बांध रहे थे.

आरव की आंखें भर आईं.

उसे लगा कि तीन घंटे का भाषण और पांच मिनट की करुणा...

दोनों में कितना अंतर है.

कुछ महीनों बाद आरव के पिता का देहांत हो गया.

घर में शोक का वातावरण था.

लोग आते, कहते, "हिम्मत रखो."

"समय सब ठीक कर देगा."

"रोओ मत."

लेकिन इन शब्दों से उसका दर्द कम नहीं हुआ.

शाम को मौन बाबा आए.

उन्होंने कुछ नहीं कहा.

बस आरव के कंधे पर हाथ रखा और उसके पास बैठ गए.

करीब एक घंटा दोनों मौन बैठे रहे.

उस दिन पहली बार आरव खुलकर रोया.

जब मन हल्का हुआ तो उसने महसूस किया कि हजार शब्द भी वह सहारा नहीं दे पाए जो उस मौन ने दिया.

उसे समझ आ गया कि सच्चा साथ हमेशा शब्दों से नहीं मिलता.

कुछ समय बाद गांव में विद्यालय की नई इमारत बनने लगी.

प्रधानाचार्य ने बच्चों से पूछा, "सबसे बड़ी शक्ति क्या है?"

किसी ने कहा धन.

किसी ने कहा शिक्षा.

किसी ने कहा विज्ञान.

आरव ने उत्तर दिया, "सबसे बड़ी शक्ति है सही समय पर मौन रहना और सही समय पर बोलना."

सभी ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा.

उसने कहा, "बहुत बोलना भी नुकसान देता है और हर समय चुप रहना भी. बुद्धिमानी संतुलन में है."

मौन बाबा दूर खड़े मुस्कुरा रहे थे.

कुछ वर्षों बाद मौन बाबा गंभीर रूप से बीमार पड़ गए.

पूरा गांव उनके पास आया.

सब चाहते थे कि जीवन में पहली बार उनकी आवाज़ सुनें.

आरव उनके सिरहाने बैठा था.

उसने धीरे से कहा, "बाबा, अगर आज कुछ कहना चाहें तो कह दीजिए."

मौन बाबा ने बड़ी कठिनाई से आंखें खोलीं.

होंठ हिले.

सभी सांस रोककर सुनने लगे.

उन्होंने केवल दो शब्द कहे—

"सुनना सीखो."

बस इतना कहकर उनकी आंखें सदा के लिए बंद हो गईं.

पूरा गांव रो पड़ा.

उन दो शब्दों ने जैसे हर व्यक्ति के भीतर एक दीप जला दिया.

बरसों बाद उसी बरगद के नीचे अब आरव बैठता था.

लोग अपनी समस्याएं लेकर उसके पास आते.

वह पहले पूरी बात सुनता.

फिर बहुत कम शब्दों में उत्तर देता.

कभी-कभी केवल मुस्कुरा देता.

कई लोग लौटते समय कहते, "आज मन हल्का हो गया."

आरव जानता था कि यह उसके शब्दों का नहीं, सुनने की कला का प्रभाव है.

एक दिन एक छोटा बच्चा उसके पास आया और बोला, "चाचा, क्या मौन की भी कोई आवाज़ होती है?"

आरव ने बच्चे का हाथ पकड़ा, उसे बरगद के नीचे बैठाया.

सुबह की हवा बह रही थी.

पत्ते धीरे-धीरे हिल रहे थे.

दूर मंदिर की घंटी बज रही थी.

एक चिड़िया अपने बच्चों को दाना खिला रही थी.

सूरज की किरणें पत्तों से छनकर धरती पर उतर रही थीं.

कुछ देर बाद आरव ने पूछा, "क्या सुनाई दिया?"

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा, "बहुत कुछ."

आरव ने कहा, "यही मौन की आवाज़ है. जब बाहर का शोर कम होता है, तब भीतर का सत्य सुनाई देने लगता है."

उस दिन बरगद की छांव में बैठे लोगों ने कोई प्रवचन नहीं सुना, कोई भाषण नहीं हुआ, कोई बहस नहीं हुई. फिर भी हर व्यक्ति अपने साथ जीवन का एक नया संदेश लेकर लौटा—कि शब्द रिश्ते बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं, लेकिन संवेदनशील मौन टूटे हुए मन को जोड़ सकता है. मौन भागना नहीं है, बल्कि स्वयं को, दूसरों को और जीवन को गहराई से सुनने की कला है. सच तो यह है कि संसार की सबसे गहरी आवाज़ वही होती है, जो कानों से नहीं, हृदय से सुनी जाती है.

समाप्त.

लेखक: विजय शर्मा ऐरी, अजनाला, अमृतसर.

संपर्क: vijayerry5@gmail.com


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