किसी का सहारा बनों..।
किसी का सहारा बनों..।
"अगर तुम बेसहारा हो, तो किसी का सहारा बनों।"
ये बात अक्सर मेरे जहन में घूमती रहती है क्योंकि इस वाक्य के पीछे मेरी अपनी कहानी छिपी हुई है। ये संघर्षमय कहानी भी बाकी कहानियों की तरह ही है। बस फर्क इतना सा है कि एक समय सबकुछ होते हुए भी, फिर एक समय कुछ नहीं रहा, या ये कहें कि कुछ भी नहीं रहा,,।
ये बात उस समय की है, जब मैं और मेरा परिवार गाँव में सब साथ रहा करते थे। वहीं मेरा जन्म हुआ, मेरी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण हुई और संगी-साथियों के साथ मौज-मस्ती से भरा, हंसी-खुशी के साथ खुशहाल और जीवन का एक सुखद भाग बीत गया। जहां बचपन से ही मैंने हमारे घर में हर सुख-सुविधा, धन-दौलत, बढ़िया काम-कारोबार और जमीन-जायदाद की कोई कमी नहीं देखी थी।
वहीं बड़े होने पर सबकुछ एक पल में ऐसे बिखर गया, जैसे कभी कुछ था ही नही। जैसे मेरे बचपन का सारा समय तो बस एक सपना था। मैं तो वर्तमान में बस यही सोचता रह गया कि क्या ये भी जीवन का एक भाग होता है? जहां इतने अथाह दुःख और परेशानियां आती हैं और हमारे साथ अपना कहने भर के लिए भी कोई खङा नही होता हैं,,। लेकिन इसमें मेरी गलती कहाँ थी, जो मुझे इतनी दिक्कतो, परेशानियों और मुसीबतों का सामना करना पड़ा। खैर, सबकुछ सहते हुए, किसी से कुछ ना कहते हुए, अपनी उस विषम परिस्थित मैं अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ गया।
जब तक मेरे साथ पिताजी थे, तब तक सबकुछ ठीक था। लेकिन उनके जाने के बाद तो जीवन की सारी काया ही पलट हो गई। पिताजी ने हम तीनो, मैं और मेरी दोनो बहनो को बहुत ही प्यार से पाला और गांव में रहते हुए भी हमारी उच्च शिक्षा की कामना की। क्योंकि पिताजी खुद भी बहुत पढ़ना चाहते थे, कुछ बेहतर करना चाहते थे, पर किसी ने उन्हें मौका ही नही दिया। इसलिए पिताजी ने मुझे पढ़ने के लिए शहर में भेज दिया। जिससे गांव की संकीर्ण बातो से प्रभावित हुए बिना, मैं अपनी पढ़ाई बहुत अच्छे से कर सकूं।
बहनों को भी आठवीं के आगे और पढ़ाना चाहते थे, पर बहनों की ही खुद की इच्छा नहीं थी आगे पढ़ने की। इसलिए पिताजी ने भी उनके साथ कोई जोर जबरदस्ती करना सही नही समझा और बाल्य अवस्था का समय पूर्ण होते ही, उनके लिए सुयोग्य वर ढूंढने की तलाश में लग गए। पिताजी का नौकरी से रिटायरमेंट होने वाला था। इसलिए उससे पहले ही पिताजी ने अपनी दोनों बेटियो का विवाह बहुत ही अच्छे से सम्पन्न कर दिया।
फिर उन्होंने सोचा कि रिटायरमेंट से पहले मेरी देखरेख में कुछ ऐसा काम शुरू किया जाए, जो भविष्य में मेरे बेटे को लाभ दें और उसके आने वाले जीवन में कोई दिक्कत ना आ सके। सबसे सलाह मशबरा करके उन्होने एक ट्रैक खरीदा और एक्सपोर्ट का काम करने का सोचा। लेकिन मैंने इस काम के लिए मना किया, पर पिताजी को मेरा कहना सही नही लगा। खैर, कुछ समय तो ये काम ठीक रहा, लेकिन फिर इस ट्रैक के काम से उन्हें काफी नुकसान होने लगा और धीरे धीरे ये नुकसान घाटे में तब्दील हो गया।
लगातार घाटे की इन खबरों को सुनकर पिताजी दुःखी और निराश रहने लगे और देखते ही देखते वह गम्भीर बीमारी की चपेट मे आ गए। पिताजी की स्थिति के विषय में सुनकर, मैं शहर से अपनी पढ़ाई को आधे में छोड़कर ही लौट आया। जबतक पिताजी की हालत भी बहुत गम्भीर हो चुकी थी। हम सब ने उस समय उन्हे बचाने की बहुत कोशिश की, अस्पताल बदले, डाॅक्टर बदले, दवाईया, लेकिन हम उन्हें बचा ना सके।
पिताजी की मृत्यु मेरे लिए बहुत ही असहनीय पीङा के समान थी। लेकिन फिर भी खुद को संभालते हुए, मैने मां को सम्भाला और सारी विधियों को पूर्ण किया। पिताजी की मृत्यु के कुछ समय बाद ही हमारे उस ट्रैक का भी एक्सीडेंट हो गया और सबकुछ बिखरने की कगार पर आ पहुंचा। पहले ही ट्रैक को लेने में मां के सब सोने-चांदी के सामान बिक गए थे और अब उसके एक्सीडेंट के बाद सबकुछ ठीक करने में सारी जमीन-जायदाद भी एक-एक करके बिकने लगी।
जो रिश्तेदार और हमारे अपने अब तक हमारे साथ लगे हुए थे या ये कहें कि हमारे पैसों के साथ लगे हुए थे, उन सबने भी अपने हाथ खड़े कर दिए और किसी ने कोई सहायता नही की। दोनों बहनो और बहनोईयों का हाल भी कुछ ऐसा ही था। मैंने तो जैसे-तैसे खुद को संभाल लिया, लेकिन माँ सबके बदलते हुए ये रंग सह नहीं पायी। क्योंकि इस बर्बादी की साज़िश में मेरे अपने सगे रिश्तेदार भी काफी हद तक शामिल थे।
माँ से मैंने कहा भी कि हम दोनों माँ-बेटे यहाँ से कहीं दूर चलते हैं, अपने जीवन की नयी शुरुआत कर, सुख से रहेंगे। लेकिन माँ पिताजी की आखिरी निशानी, उनके द्वारा बनाए उस घर को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। फिर एक दिन पिताजी को याद करते हुए, मां भी मुझे छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं। मैं टूटकर इस कदर बिखर चुका था कि जैसे अब जुड़ने की कोई गुंजाइश नही हैं।
मेरे माँ-बाप मेरे लिए मेरे भगवान थे। जब मेरे भगवान ही इस दुनिया में नहीं रहे तो मैं भी जी कर क्या करूँगा। ये सोचते हुए मैं भी निकल पड़ा अपने जीवन की कहानी को हमेशा हमेशा के लिए खत्म करने, जीवन के एक ऐसे रास्ते पर जहां सिर्फ निराशा ही निराशा और दुःख ही दुःख था। मेरी आंखो से आंसू बह रहे थे। मुझे रह रहकर अपने माता पिता के साथ बिताए, प्यार भरे पलों की बहुत याद आ रही थी। लेकिन कुछ देर उस अनजान रास्ते पर चलते रहने के बाद, मेरे मन में अचानक से पिताजी के कहे हुए शब्द घूमने लगे कि "बेटा अकेला इंसान भी पूरी दुनिया को बदलने की ताकत रखता है और अगर तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो, तुम्हें खुद-ब-खुद सहारा मिल जाएगा।"
पिताजी की कही हुई ये बातें मेरे मन-मस्तिष्क पर इस कदर हावी होने लगी कि मैं एक बार फिर उसी जीवन में वापस लौटने के लिए अपने मन को तैयार करने में लग गया, जहाँ मेरा सब कुछ खत्म हो चुका था। वहां फिर से एक बार जीने की आशा लिए मैं उस ओर चल पङा।
लौटते समय मेरे मन में पिताजी की कही हुई वही बातें घूम रही थीं और मैंने मन ही मन ये प्रण कर लिया कि भले ही आज मैं बेसहारा हो गया हूँ, लेकिन मैं किसी का सहारा अवश्य बनूंगा और ऐसी अच्छी और नेक सोच को सब तक पहुँचाने की कोशिश करूँगा, जिससे उन लोगों का कुछ तो भला हो सके।
क्योंकि जब मेरे पास सब कुछ होते हुए भी, आज मैं बेसहारा हो गया, तो इस संसार में जिनका कोई नहीं हैं, जिनके पास कुछ नहीं है उनका सहारा कौन बनेगा? मैं तो आज अनाथ बना हूं, पर जो बच्चे बचपन में ही अनाथ बन जाते हैं, वो अपना जीवनयापन कैसे करेंगे, उनकी देखभाल कौन करेगा?
इसी विचार ने आज हमारी समाज सेवी संस्था की नींव रखी है। जिसका लक्ष्य बस हर उस बेसहारा, अनाथ, दुःखी और परेशान व्यक्ति तक पहुँचना है, जहाँ जाने से हर कोई कतराता है या उनसे बचना चाहता है।
जिसके लिए कोई नही खड़ा, जिसके लिए कोई नही लङा, उन सबके लिए मैं खड़ा होकर, उनके हक की लिए लड़ाई लडूंगा। इसलिए अब मेरे जीवन का एक मात्र यही उद्देश्य हैं कि एक सभ्य और संस्कारी समाज की स्थापना करना, जहां कोई बेसहारा ना हों, जहां हर कोई एक दूसरे की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहें,,।
